Athletes Coach: कई अर्जुनों के लिए द्रोणाचार्य बन चुके पंजाब के सरबजीत सिंह की कहानी

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नई दिल्ली: भारत में महाभारत और रामायण के समय से ही शिष्य के जीवन में गुरु की भूमिका को काफी अहम बताया गया है। बीते युगों में शिक्षा हासिल करने के लिए गुरु के घर या गुरुकुल जाने की परंपरा थी। कलयुग में यह परंपरा यूं तो खत्म हो गई है, लेकिन आज भी कुछ ऐसे गुरु हैं जो अपने शिष्यों की कामयाबी के लिए न सिर्फ उनकी काबिलियत को निखारने की जिम्मेदारी लेते हैं बल्कि गुरुकुल की ही तरह उनकी परेशानियों को भी अपनी परेशानी मानते हैं। कई अर्जुनों के लिए द्रोणाचार्य बन चुके पंजाब के सरबजीत सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। अपने निजी फायदे, सफलता को छोड़कर यह शख्स खेल की दुनिया में पंजाब को उसकी खोई हुई पहचान दिलाने में जुटा हुआ है।

हाल ही में भुवनेश्वर में हुए नेशनल फेडरेशन कप के 100 मीटर का गोल्ड पंजाब के गुरविंदरवीर सिंह ने जीता। इसी इवेंट का ब्रॉन्ज मेडल भी हरजीत सिंह के नाम रहा। ये दोनों ही खिलाड़ी सरबजीत के शिष्य हैं जो कि वर्षों से पंजाब से एथलीट्स की एक नई खेप तैयार करने की कोशिश में लगे हैं।

खुद एक समय पर एथलीट रह चुके सरबजीत के कोचिंग करियर की शुरुआत एक हादसे के साथ हुई। फिरोजबाद के एक्सीडेंट में हमारे कोच का निधन हो गया था। मैं उस समय चोटिल था। मुझे कुछ एथलीट्स ने कहा कि मैं उन्हें ट्रेनिंग करा दूं और मैं कराने लगा। तब मेरे पास कोई प्रोफेशनल अनुभव नहीं था, न ही मैंने कोई कोर्स किया था।’

सरबजीत ने बताया, ‘इसके बावजूद मेडल आने लगे। इसी तरह एक-एक बच्चे के साथ मेरे साथ लगाव जुड़ता रहा। साल 2008 में मैंने 8 हजार रुपये की नौकरी के साथ खेल मंत्रालय में काम करना शुरू किया। मेरे प्रदर्शन को देखकर यह नौकरी मुझे दी गई। साल 2023 तक मैं महज 10 हजार रुपये की सैलरी में काम करता था। अब जाकर यह बढ़कर 20 हजार रुपए हुई है।’

सरबजीत के सफर में उनकी हमसफर हर मौके पर खड़ी नजर आई। कोच ने बताया कि पत्नी की सैलरी से खर्चे पूरे होते हैं। खिलाड़ियों के लिए सरबजीत ने न सिर्फ अपने घर के दरवाजे खोले बल्कि कई जगहों पर नुकसान भी उठाया। उन्होंने बताया, ‘मेरी पत्नी की मुझसे ज्यादा सैलरी है। वह महीने में 50 से 60 हजार रुपये कमाती हैं, जबकि मैं केवल 8 हजार रुपये कमाता था।’

उन्होंने बताया, ‘कोरोना के समय ये सभी बच्चे मेरे घर पर रहे। श्रीमतीजी की सैलरी से काफी मदद मिलती थी। मेरी कुछ ऐसी प्रॉपर्टी है जिसे किराये पर देने से मुझे महीने के 60-70 हजार रुपए मिल सकते हैं, लेकिन मैंने उस जगह को अपने एथलीट्स की सहूलियत का ध्यान रखते हुए जिम और कंडीशनिंग सेंटर में बदल दिया है।’

सरबजीत अपने शिष्यों की हर मुश्किल को अपना मानते हैं। यही कारण है कि कोरोना के समय जब सबकुछ बंद था तब उन्होंने कई अधिकारियों को पत्र लिखा कि ट्रेनिंग करने के लिए ट्रैक दिया जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारतीय टीम इजाजत लेकर अभ्यास कर रही थी, लेकिन सरबजीत और उनके एथलीट्स ऐसा नहीं कर सकते थे। उस दौरान वह सभी किसी तरह छुप-छुपकर पार्क में अभ्यास करते थे। उसी दौरान गुरविंदर नेशनल रिकॉर्ड तोड़ने से चूक गए थे।

सरबजीत बाकी कोच से अलग हैं। अपने शिष्यों को लेकर उनकी जिम्मेदारी केवल गेट सेट गो और फिनशिंग लाइन के बीच तक सीमित नहीं है। खिलाड़ियों के लिए प्रतियोगिता का चुनाव, सफर का प्लान, रुकने और खाने का ठिकाना ढूंढने से लेकर इन सब कामों के लिए पैसे का इंतजाम भी सरबजीत करते हैं।

आर्थिक तंगी के कारण आ रही परेशानियों के बारे में सरबजीत ने बताया, ‘सबसे पहले टिकट बुक कराने में मुश्किल होती है। हमें कई बार अलग-अलग टिकट बुक करने पड़ते हैं। जैसे-जैसे पैसे का इंतजाम होता है उसी हिसाब से टिकट बुक कराते हैं। स्टेशन पर उतरने के बाद होटल देखना होता है। इसमें कई बार 2 से 3 घंटे लग जाते हैं। कम पैसे में अच्छा होटल ढूंढना होता है, ताकि खिलाड़ी रिकवर हो पाएं. खराब होटल में रहने के कारण एक बार हमारे बड़े एथलीट को एलर्जी हो गई थी।’

फेडरेशन कप के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘इस बार हमने सोचा कि अच्छे होटल में रहेंगे। होटल के खर्चे को बैंलेंस करने के लिए खाना के पैसे में कटौती करनी पड़ती है। एथलीट्स ठेले से पूरी और इडली खाकर रिकवरी कर रहे थे। कोई जान-पहचान वाला घर पर खाने के लिए बुला लेता है तो लगता है कि चलो आज के खाने के पैसे बच गए।’

सरबजीत ने बताया, ‘एक कोच की तौर पर मुझे बहुत बुरा लगता है जब मैं आर्थिक तौर पर खिलाड़ियों की मदद नहीं कर पाता। एक प्रतियोगिता खत्म होती है तो अगले की चिंता शुरू हो जाती है। मैं इन खिलाड़ियों के लिए कभी दोस्तों तो कभी किसी और से पैसे मांगता हूं लेकिन कोई कब तक मदद करेगा। जितनी प्रतिभा इन खिलाड़ियों में है वे स्पॉन्सर के हकदार हैं। आर्थिक परेशानी दूर होने पर ये एथलीट्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकते हैं।’

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