Sumit Antil के पैरालंपिक में स्वर्ण जीतने के पीछे बलिदानों की लंबी दास्तां, रात-रात भर मैदान पर बहाया पसीना

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पेरिस: भारत के स्टार भाला फेंक पैरा एथलीट सुमित अंतिल ने सोमवार को दमदार प्रदर्शन के साथ भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। पेरिस पैरालंपिक में सुमित ने पुरुष भाला फेंक एफ64 वर्ग स्पर्धा में अपने दूसरे प्रयास में 70.59 मीटर के सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ सोना जीता। 26 वर्षीय एथलीट के लिए इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं रहा। उन्होंने तमाम संघर्षों के बाद एक बार फिर पैरालंपिक में देश का मान बढ़ाया। पदक जीतने के बाद सुमित ने अपनी कहानी सुनाई।

पिछले एक दशक से अधिक समय से पीठ की चोट से जूझ रहे भालाफेंक खिलाड़ी सुमित के पैरालंपिक में स्वर्ण जीतने के पीछे बलिदानों की लंबी दास्तां है। इसमें तेजी से बढ़ते वजन के कारण मीठा खाना छोड़ना और रातों को जगना शामिल है। फिजियो की सलाह पर उन्होंने मिठाई से तौबा की और सख्त प्रशिक्षण के बाद सिर्फ दो महीनों में 12 किलोग्राम वजन कम कर लिया।

सुमित की यह मेहनत बीते दिन रंग लाई जब वह पेरिस में तिरंगा लहराने में कामयाब हुए। इसी के साथ पर पैरालंपिक में खिताब का बचाव करने वाले पहले भारतीय पुरुष और दूसरे भारतीय बने। इससे पहले अवनि लेखरा ने अपने पदक का बचाव किया था। पेरिस से पहले टोक्यो में सुमित ने 68.55 मीटर के सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ स्वर्ण जीता था।

पदक जीतने के बाद सुमित ने कहा- मैंने करीब 10-12 किलो वजन कम किया है। मेरे फिजियो विपिन भाई ने मुझे बताया कि वजन मेरी रीढ़ की हड्डी पर दबाव डाल रहा है। इसलिए, मैंने मिठाई खाना छोड़ दिया, जो मेरी पसंदीदा है और सही खाने पर ध्यान केंद्रित किया। इस दौरान उन्होंने बताया कि वह स्वदेश लौटने के बाद पर्याप्त आराम करेंगे। सुमित ने कहा- मैं 100 प्रतिशत फिट नहीं था। मुझे थ्रो से पहले पेनकिलर लेनी पड़ी और ट्रेनिंग के दौरान भी मैं अपनी सर्वश्रेष्ठ स्थिति में नहीं था। पहली प्राथमिकता भारत लौटने के बाद अपनी पीठ को ठीक करना है क्योंकि जिस तरह की चोट मुझे लगी है, उसमें आराम बहुत जरूरी है।

सुमित ने अपने कोच (अरुण कुमार) का भी धन्यवाद किया जिन्होंने हमेशा उनकी जरूरतों को समझा, उनका शेड्यूल बनाने के लिए रात-रात भर जागते रहे और बहुत मेहनत की। उन्होंने कहा कि उनके कोच ने उनसे भी ज्यादा मेहनत की है। सुमित ने कहा- मैंने क्रॉसफिट वर्कआउट, स्प्रिंट करना भी शुरू कर दिया और कड़ी ट्रेनिंग की। मेरे कोच के साथ दो साल हो गए हैं और वह मेरे लिए बड़े भाई की तरह हैं। वह अच्छी तरह से जानते हैं कि मुझे क्या चाहिए और कब चाहिए। मैंने उन्हें मेरा शेड्यूल बनाने के लिए रात भर जागते देखा है। मेरी टीम ने मेरे लिए बहुत मेहनत की है और मैं उनके साथ होने पर वास्तव में धन्य महसूस करता हूं।

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