Harvinder Singh डॉक्टर का इलाज बना अभिशाप, अब पैरालंपिक में रच दिया इतिहास

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नई दिल्ली: भारत के पैरालंपिक तीरंदाज हरविंदर सिंह ने बुधवार को इतिहास रच दिया। पेरिस पैरालंपिक में उन्होंने ओपन रिकर्व पुरुष इवेंट में गोल्ड मेडल जीता। यह भारत का पैरालंपिक या ओलंपिक में देश का पहला गोल्ड मेडल है। हरविंदर सिंह ने टोक्यो में भी ऐतिहासिक मेडल जीता था। साल दर साल भारत के लिए ऐतिहासिक मेडल जीतने वाले हरविंदर का खेलों का सफर बहुत लंबा नहीं है लेकिन उनकी कामयाबी उन्हें दिग्गजो की फेहरिस्त में शामिल करती है।

डॉक्टर ने कुछ गलत इंजेक्शन बना अभिशाप

हरविंदर सिंह में जन्म के समय किसी भी तरह कोई शारीरिक कमी नहीं थी। 1992 में जब वह महज 18 साल के थे तब वह बीमार पड़े। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें डेंगू है। इसका इलाज शुरू हुआ। हालांकि यह इलाज हरविंदर के लिए अभिशाप बन गया। डॉक्टर ने कुछ गलत इंजेक्शन का इस्तेमाल किया। इस कारण हरविंदर सिंह के बाएं पैरा की ताकत खत्म हो गई।

पढ़ाई में है हरविंदर की दिलचस्पी

जब हरविंदर बड़े हुए तो उनका सारा ध्यान पढ़ाई पर होता था। वह परफेक्ट स्कोर हासिल करने की कोशिश में लगे रहते थे। वह पैरालंपिक मेडलिस्ट होने के बावजूद भी पंजाब यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे हैं। खेल के बीच जब भी वह स्ट्रेस में होते हैं तो किताबे ही उन्हें शांति देती हैं। साल 2012 में पैरालंपिक खेल देखकर उन्हें आर्चरी में दिलचस्पी आ गई। पटियाला यूनिवर्सिटी में ही उन्हें जिवनजोत सिंह मिले। उनके और गौरव शर्मा कोच के साथ वह ट्रेनिंग करने लगे। शुरुआत में वह कंपाउंड इवेंट में हिस्सा लेते थे।

वह भारत के पूर्व वर्ल्ड चैंपियन अभिषेक शर्मा के इस्तेमाल किए गए तीरों से अभ्यास करते थे। 2015 में उन्होंने रिकर्व में जाने का फैसला किया। रिकर्व में आना हरविंदर सिंह के लिए आसान नहीं था। इस फॉर्मेट में बाएं पैर पर 60 प्रतिशत वजन होता है। हालांकि हरविंदर के इसी पैर में ताकत नहीं है। इसी कारण पहले हरविंदर को दाएं पैर पर वजन डालकर अभ्यास कराया गया। यह आसान नहीं था लेकिन हरविंदर की मेहनत से यह भी मुमकिन हो गया।

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