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Friday, March 13, 2026

आज ही के दिन 12 अगस्त 1932 का ऐतिहासिक टैरिफ

(NST News) भोपाल. लॉस एंजिल्स ओलंपिक खेलों में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद और उनके छोटे भाई कप्तान रूप सिंह ने अमेरिका के खिलाफ वह करिश्मा किया था, जो आज भी ओलंपिक हॉकी के मैदान पर अजेय कीर्तिमान के रूप में कायम है। उस दिन दोनों भाइयों ने मिलकर 24 गोल ठोककर मेजबान अमेरिका को धराशायी कर दिया था। यह वह “टैरिफ” था, जो 93 वर्षों में कोई दूसरा देश किसी भी देश पर नहीं लगा सका। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत को बार-बार “टैरिफ” के नाम से डराने की कोशिश करते हैं, लेकिन शायद भूल जाते हैं कि यह वही देश है, जिसके खिलाड़ियों ने 1932 में उनकी धरती पर उनके घमंड को तोड़कर यह रिकॉर्ड बनाया था।

1932 का दौर, आर्थिक मंदी और भारत की चुनौती

उस समय पूरी दुनिया आर्थिक मंदी से गुजर रही थी। अमेरिका अपनी आर्थिक बादशाहत बनाए रखने के लिए दूसरे देशों के साथ दोहरे मापदंड अपना रहा था। कई देशों ने विरोध में 1932 ओलंपिक का बहिष्कार किया, पर भारत ने हॉकी में भाग लेने का निर्णय लिया। भारतीय हॉकी संघ के सामने भारी आर्थिक संकट था। टीम भेजने के लिए पंजाब नेशनल बैंक से ऋण लेना पड़ा और खिलाड़ी पानी के जहाज से रवाना हुए।जब टीम जापान के कोबे तट पर पहुंची, तो उनका स्वागत कोई और नहीं बल्कि निर्वासन में रह रहे क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने किया। यह अंग्रेजी शासन में एक साहसिक घटना थी, क्योंकि निर्वासित क्रांतिकारी से मिलना सजा-ए-मौत के बराबर था। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था, जिसने विदेशी धरती पर आजादी की मांग को मजबूती दी।

मैदान पर चमत्कार

9 अगस्त 1932 को भारत ने जापान को 11–1 से हराकर अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। अमेरिकी अखबार विज्ञापन छाप रहे थे कि जो खिलाड़ी भारत के किसी भी खिलाड़ी को तीन गोल करने से रोक लेगा, उसे नकद इनाम दिया जाएगा। 12 अगस्त को घरेलू दर्शकों से खचाखच भरे मैदान में गुलाम भारत की टीम, जो ऋण लेकर ओलंपिक में खेलने आई थी, मैदान में उतरी। खेल शुरू होते ही ध्यानचंद और रूप सिंह ने जैसे गोलों की बारिश कर दी। हर ढाई-तीन मिनट में एक गोल होता गया और 70 मिनट में 24 गोलों का इतिहास रच दिया गया।

आज तक अटूट रिकॉर्ड

1932 में अमेरिका पर लगा यह हॉकी का “टैरिफ” आज भी जस का तस कायम है। न कोई इसे हटा सका, न हरा सका। यह केवल खेल की जीत नहीं थी, बल्कि आत्मसम्मान और साहस की मिसाल थी।

सरकार की बेरुखी और विडंबना

अफसोस है कि आज भी मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने में सरकारें टालमटोल करती हैं, और कप्तान रूप सिंह को तो उनके हिस्से का सम्मान भी नहीं मिला। हमारे यहां योग्यता का सम्मान अक्सर राजनीति या प्रचार के आगे दब जाता है। यही वजह है कि अमेरिका भारत को आंखें दिखाने का दुस्साहस करता है। जिस दिन हमारा देश और सरकारें योग्यता का सही मूल्य समझ लेंगी, उस दिन न “टैरिफ” का डर रहेगा और न ही घमंड। क्योंकि यह वही देश है जिसकी नींव नैतिकता, ईमानदारी और सच्चाई पर बनी है — और जिसकी शान हैं मेजर ध्यानचंद और कप्तान रूप सिंह।

-हेमंत चंद्र दुबे “बबलू”

बैतूल (मध्य प्रदेश)

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