नई दिल्ली. क्रिकेट जगत ने एक युग का अंत देख लिया है। दुनिया के सबसे चर्चित और लोकप्रिय अंपायरों में गिने जाने वाले हेरोल्ड “डिकी” बर्ड का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। अपनी ईमानदारी, अनुशासन और अनोखी आदतों के कारण बर्ड केवल अंपायर ही नहीं बल्कि क्रिकेट प्रेमियों के दिलों के प्रिय पात्र भी रहे। बर्ड ने 1970 में अंपायरिंग की शुरुआत की और अगले तीन दशकों तक मैदान पर अपनी मौजूदगी से खेल को नई पहचान दी। उन्होंने 66 टेस्ट, 69 वनडे और तीन विश्व कप फाइनल में अंपायरिंग की। वह LBW पर कम उंगली उठाने के लिए मशहूर थे और खिलाड़ियों को अक्सर संदेह का लाभ देते थे। उनकी इस शैली ने उन्हें खिलाड़ियों के बीच खास बनाया।
खिलाड़ी के रूप में उनका सफर बहुत लंबा नहीं चला। उन्होंने 1956 में यॉर्कशायर से बल्लेबाज के रूप में करियर शुरू किया और 93 प्रथम श्रेणी मैच खेले। 20.71 की औसत से 2 शतक भी बनाए, जिसमें 1959 में ग्लैमॉर्गन के खिलाफ नाबाद 181 रन उनकी सर्वश्रेष्ठ पारी रही। लेकिन घुटने की चोट ने उनका खेल का करियर छोटा कर दिया। यही चोट उन्हें अंपायरिंग के रास्ते पर ले गई, जहां उन्होंने एक नई दुनिया रच दी। बर्ड के करियर की कई दिलचस्प कहानियां आज भी चर्चा में रहती हैं। वह समय की पाबंदी के इतने पक्के थे कि एक बार सुबह 11 बजे शुरू होने वाले मैच के लिए सुबह 6 बजे ही मैदान पर पहुंच गए। 1995 में ओल्ड ट्रैफर्ड टेस्ट में उन्होंने धूप की दिशा बदलने के कारण खेल रोक दिया था। वहीं एक अन्य मौके पर गेंदों की गिनती के लिए जेब में रखे कंचे गिरा दिए, जिसे देखकर खिलाड़ी भी हंस पड़े।
इयान बॉथम और एलन लैम्ब जैसे खिलाड़ियों के साथ उनकी नोकझोंक भी मशहूर रही। एक बार लैम्ब मैदान पर मोबाइल लेकर आ गए तो बर्ड ने उसे अपनी जेब में छिपा लिया। इसके बाद बॉथम ने उसी फोन पर मैदान पर उन्हें कॉल किया। अपने अंतिम टेस्ट मैच में जब लॉर्ड्स में खिलाड़ियों ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया तो बर्ड भावुक होकर रो पड़े। मैच के पहले ही ओवर में उन्होंने इंग्लैंड के बल्लेबाज माइक एथरटन को LBW आउट दे दिया। क्रिकेट में योगदान के लिए उन्हें 1986 में MBE और 2012 में OBE सम्मान मिला। मैदान से बाहर उनकी सादगी और हास्यप्रेम भी उतना ही चर्चित रहा। क्रिकेट जगत आज उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर कह रहा है कि खेल ने अपना सबसे न्यायप्रिय और यादगार अंपायर खो दिया।


