नई दिल्ली: वानी मूडली अपने बेटे को प्यार से “फ्रीडम बेबी” कहकर पुकारती हैं, क्योंकि उसका जन्म 1994 में उस समय हुआ था जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की समाप्ति हुई थी। रविवार, 23 नवंबर 2025 को जैसे ही सेनुरन मुथुसामी ने अपनी मातृभूमि के लिए एक ऐतिहासिक मुकाम की ओर कदम बढ़ाया, वानी मूडली गर्व से भर उठीं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने तुरंत अपनी व्हाट्सऐप प्रोफ़ाइल फोटो बदलकर उसमें अपने बेटे के इस जश्न भरे पल को शामिल कर लिया।
गुवाहाटी में भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच टेस्ट मुकाबले के दूसरे दिन जैसे ही सेनुरन अपना शतक नजदीक पहुंचने लगे, वानी मूडली घाना से डरबन वापस लौट रही थीं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वह बताती हैं, “मैंने उसे पिछले दिन स्टंप्स तक बल्लेबाजी करते देखा था और सुबह करीब 2:30 बजे (भारतीय समय) मैं घाना से उड़ान में थी।”
डरबन पहुंचते-पहुंचते वानी की बेचैनी और बढ़ चुकी थी। दूसरी ओर उनका शांत, संतुलित और जिम्मेदार बेटा मैदान पर धैर्य के साथ दक्षिण अफ्रीका को मजबूत स्थिति में पहुंचा रहा था। सेनुरन ने 206 गेंदों में 109 रन की बेहतरीन पारी खेलकर टीम को 201/5 की नाज़ुक हालत से उबारते हुए पहली पारी में 489 के बड़े स्कोर तक पहुंचाया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वानी मुस्कुराते हुए कहती हैं, “मैं एयरपोर्ट लाउंज में लगातार लोगों से चैनल बदलने की गुजारिश कर रही थी।” लेकिन जैसे ही सेनुरन ने मोहम्मद सिराज की गेंद को कवर दिशा में खेलकर अपना पहला टेस्ट शतक पूरा किया, उस पल उसकी मां वानी डरबन स्थित अपने घर में टीवी स्क्रीन के सामने खड़ी थीं—भावनाओं से भरी हुई।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वानी मुस्कराते हुए बताती हैं, “मैं तो जैसे पागल हो गई थी… रास्ते भर तेज़ी से ड्राइव कर रही थी कि किसी तरह समय रहते घर पहुँच जाऊं। किस्मत अच्छी थी कि मैं ठीक उसी वक्त पहुंची जब उसने अपना शतक पूरा किया।” कुछ ही मिनटों बाद उनके व्हाट्सऐप प्रोफ़ाइल पर दक्षिण अफ्रीका की सफेद जर्सी में शतक का जश्न मनाते हुए सेनुरन की तस्वीर दिख रही थी। फोटो के साथ एक छोटा-सा कैप्शन भी था—“गुवाहाटी स्टेडियम का पहला शतकवीर।” ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत बनाम साउथ अफ्रीका की यह भिड़ंत गुवाहाटी के बरसापारा स्टेडियम में खेला जाने वाला पहला अंतरराष्ट्रीय टेस्ट मुकाबला है।
पूरे गांव का सपना साकार हुआ: वानी मूडली
वानी के लिए यह क्षण अत्यंत भावुक और यादगार था। करीब 20 साल पुराना ‘पूरे गांव का सपना’ आखिरकार सच हो गया था। उस समय सेनुरन सिर्फ 11 साल के थे। डरबन के पूर्वी तट पर बसे उनके परिवार ने वर्षों तक भेदभाव झेला, लेकिन उसी परिवार में ऐसे दौर में सेनुरन का जन्म हुआ जब दक्षिण अफ्रीका अपार्थाइड के अंत के बाद नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ रहा था।
सेनुरन के पूर्वज 1900 के दशक में वेल्लोर से साउथ अफ्रीका गए थे
वानी बताती हैं, ‘हमारे पूर्वज 1900 के शुरुआती दशक में वेल्लोर (तमिलनाडु) से बतौर गिरमिटिया मजदूर यहां आए थे। मेरे पितामह एक जहाज में छुपकर आए थे। मेरा जन्म उस समय हुआ जब अपार्थाइड चरम पर था। हम अलग-अलग कॉलोनियों में रहते थे। मैं यूनिवर्सिटी नहीं जा सकती थी और पढ़ाई के लिए मुझे काम करना पड़ता था। मैं उस समय एक युवा एक्टिविस्ट के रूप में एंटी-अपार्थाइड (रंगभेद-रोधी) आंदोलन का हिस्सा भी बनी।’
सेनुरन में क्रिकेट का बीज बोया गया दादा और पिता ने
वानी को याद है कि उनके दादा रविवार को भी काम करते थे और अपनी कमाई का कुछ हिस्सा समुदाय में स्कूल बनवाने के लिए दान कर देते थे। सेनुरन के दादा पुन्नतम्बरण मुथुस्वामी भी क्रिकेट खेलते थे, लेकिन रंगभेद की वजह से उन्हें आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वानी कहती हैं, ‘मेरे बेटे के समय में हालात बदल गए थे। वह एक बहुसांस्कृतिक समुदाय में पला और उसके दादा-पिता ने उसके भीतर क्रिकेट का बीज बोया।’
11 साल की उम्र में पिता को खोने का दुख
सेनुरन बचपन से ही अपने पिता के साथ क्रिकेट के करीब थे, लेकिन 11 साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वानी बताती हैं, “तब से वह खुद खड़ा होकर पूरी किट पहनकर अपने पिता के साथ थ्रोडाउन करता था। पिता के जाने के बाद मुझे खुद क्रिकेट सीखना पड़ा ताकि मैं उसे थ्रोडाउन दे सकूं।” इन मेहनतों का फल मिला। सेनुरन ने 14 साल की उम्र में प्रोफेशनल क्रिकेट की तरफ पहला कदम रखा। सेनुरन ने 2013 में बाएं हाथ के स्पिनर और ऑलराउंडर के रूप में फर्स्ट क्लास क्रिकेट में डेब्यू किया। उन्होंने 2019 में भारत के खिलाफ विशाखापत्तनम में पहला टेस्ट खेला।
रविवार की पारी उनके करियर का पहला टेस्ट शतक भी थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वानी कहती हैं, ‘मैं आज वहां होना चाहती थी और अगर उसे अगले महीने वनडे शृंखला में चुना जाता है तो मैं उससे मिलने आती। मैं अपने भारतीय मूल की धरती पर सिर्फ दो बार (1998 में अपनी बहन के साथ और फिर 2019 में सेनुरन के टेस्ट डेब्यू के दौरान) गई हूं।’ वानी हंसते हुए बताती हैं, “वह बहुत प्रतिस्पर्धी और समझदार छात्र था। मुझे कभी वह परेशानियां नहीं झेलनी पड़ीं जो अन्य माताएं अपने किशोर बच्चों के साथ झेलती हैं। हर शुक्रवार रात वह जल्दी सो जाता था क्योंकि शनिवार सुबह उसका क्रिकेट मैच होता था।”
वानी के लिए गर्व का पल: प्रोटियाज की जर्सी पहनने वाला बेटा
भारत से गहरा लगाव होने के बावजूद, वानी और उनके बेटे सेनुरन दक्षिण अफ्रीका की जर्सी में प्रोटियाज का प्रतीक पहनकर गर्व महसूस करते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वानी कहती हैं, “यह वही देश है जिसमें हमने जन्म लिया और पला-बढ़ा। भारत जाते समय हमें अपनापन नहीं मिलता, लेकिन यहां हम अपने हैं। प्रोटियाज का राष्ट्रीय प्रतीक पहनना हमारे लिए गर्व और खुशी का क्षण है।”

