नई दिल्ली : पिछले 12 वर्षों में दूसरी बार स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में इस बार राष्ट्रमंडल खेल यानी कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन होने जा रहा है। हालांकि एक समय इस आयोजन को लेकर भी गंभीर सवाल उठने लगे थे, जिससे इसकी तैयारियों और भविष्य पर अनिश्चितता के बादल छा गए थे। दरअसल, 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन की दावेदारी या बिड पहले ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य ने हासिल की थी. लेकिन इन खेलों के आयोजन की बढ़ती लागत के चलते बाद में उसने अपने हाथ पीछे खींच लिए और कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन से इनकार कर दिया.
इसके बाद जब ग्लासगो शहर ने खेलों के आयोजन के लिए सहमति दी, तब जाकर राष्ट्रमंडल आयोजन समिति ने राहत की सांस ली। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लेकिन विक्टोरिया द्वारा आयोजन से इनकार किए जाने के बाद मीडिया में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या 21वीं सदी में कॉमनवेल्थ गेम्स की प्रासंगिकता अब भी बनी हुई है। इसी बहस के बीच अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या कॉमनवेल्थ गेम्स को जारी रखना चाहिए या फिर इसे बंद करने का समय आ गया है, और इसी विषय पर दुनिया जहान में इस सप्ताह विस्तार से चर्चा की जा रही है।
इनकार
अप्रैल 2022 में ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य ने कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन की दावेदारी हासिल कर ली थी. ऑस्ट्रेलिया के पास कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन का भरपूर अनुभव था क्योंकि वह इससे पहले पांच बार इन खेलों का आयोजन कर चुका था. लगभग 20 साल पहले विक्टोरिया राज्य की राजधानी मेलबर्न में भी कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हुआ था. यूके की ऑक्सफोर्ड ब्रूक्स यूनिवर्सिटी में स्पोर्ट्स के सीनियर लेक्चरर स्टुअर्ट विंगहैम कहते हैं कि विक्टोरिया सरकार 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन राज्य के कई हिस्सों में करना चाहती थी. मेलबर्न शहर कई बड़ी खेल प्रतियोगिताएं आयोजित कर चुका है इसलिए वहां इसका अनुभव और कौशल दोनों है.
मगर विक्टोरिया सरकार चाहती थी कि खेल से होने वाले सांस्कृतिक और व्यापारिक लाभ को पूरे क्षेत्र के लिए उपलब्ध कराया जाए ताकि मेलबर्न के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी खेल की सुविधाएं विकसित की जा सकें और निवेश आकर्षित किया जा सके. मगर इसमें शुरुआत से ही समस्याएं आने लगी थीं.
ऑस्ट्रेलिया पहले से ही छह साल बाद 2032 में ब्रिसबेन में होने वाले ओलंपिक खेलों के आयोजन की तैयारी में जुटा हुआ था जिसके लिए केंद्र सरकार ने अरबों डॉलर आवंटित किए थे. मगर कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए केंद्र सरकार से विक्टोरिया राज्य को कोई धन नहीं दिया गया था. विपक्षी दल कॉमनवेल्थ गेम्स में भारी निवेश का विरोध कर रहे थे. उसके बाद कोरोना महामारी के चलते आयोजन के लिए आवश्यक सामग्री की सप्लाई भी बाधित हो गई और आयोजन का ख़र्च दोगुना बढ़ गया.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नतीजतन जुलाई 2023 में विक्टोरिया राज्य सरकार के प्रमुख डैनियल एंड्रूस ने राज्य में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन रद्द करने की घोषणा करते हुए कहा कि इतनी बड़ी लागत पर खेलों का आयोजन करने का कोई फ़ायदा नहीं है. डॉक्टर स्टुअर्ट विंगहैम कहते हैं कि शुरुआत से ही खेलों के आयोजन की लागत कम आंकी गयी थी. विक्टोरिया सरकार को अहसास हुआ कि लागत का अनुमान लगाने में ग़लती हुई है और आयोजन का ख़र्च नियंत्रण से बाहर चला गया है इसलिए अब इसका आयोजन संभव नहीं होगा.
बदले में विक्टोरिया सरकार राष्ट्रमंडल खेल संघ को 25 करोड़ डॉलर का भुगतान करने को राज़ी हो गयी. मगर यह पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले दक्षिण अफ़्रीका के डरबन शहर ने आयोजन की दावेदारी जीतने के बाद आर्थिक कारणों से बाद में हाथ पीछे खींच लिए थे. बहरहाल स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर ने यह ज़िम्मेदारी स्वीकार की. इसकी कई वजह हैं. एक तो यह कि ग्लासगो कुछ सालों पहले ही यह खेल आयोजित कर चुका था और दूसरे विक्टोरिया राज्य से मिली हर्जाने की राशि का हिस्सा भी उसे सौंप दिया गया.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टर स्टुअर्ट विंगहैम ने कहा, “स्कॉटलैंड में कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन के लिए यूके की केंद्र सरकार और स्कॉटलैंड की सरकार के बीच दस करोड़ पाउंड के निवेश पर सहमति हो गई. राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति की दलील थी कि ग्लासगो में खेलों के आयोजन के लिए ढांचा और सुविधाएं पहले से मौजूद हैं इसलिए आयोजन की लागत कम रहेगी.” फ़िलहाल तो ग्लासगो ने कॉमनवेल्थ गेम्स को संकट से ऊबार लिया है मगर कई चुनौतियां अब भी बरक़रार हैं.
खेल, राजनीति और इतिहास
कॉमनवेल्थ ऑफ़ नेशंस 58 स्वतंत्र देशों की संस्था है जिसके अधिकांश सदस्य पहले ब्रितानी साम्राज्य के उपनिवेश थे. 1920 के दशक तक ब्रिटेन विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य था. भारत, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, अफ़्रीका के बड़े हिस्से सहित मध्य पूर्व के कई क्षेत्र उसके अधीन थे.
पहले महायुद्ध के बाद आर्थिक संकटों और उपनिवेशों में स्वतंत्रता संघर्षों के बाद ब्रितानी साम्राज्य ढहता चला गया और इसी की पृष्ठभूमि में राष्ट्रमंडल खेलों की कल्पना को साकार किया गया. हमारे दूसरे एक्सपर्ट डॉक्टर मैथ्यू मैकडोवेल यूके की एडिनबरा यूनिवर्सिटी में स्पोर्ट्स पॉलिसी और मैनेजमेंट के लेक्चरर हैं. वह याद दिलाते हैं कि किस प्रकार कनाडा के हैमिल्टन शहर में पहले राष्ट्रमंडल खेलों या कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हुआ था.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वह कहते हैं, “ब्रिटेन से कनाडा जाकर बसे रूढ़ीवादी निवासियों ने उन खेलों का आयोजन ब्रितानी साम्राज्य को गौरवान्वित करने के लिए किया था.” साथ ही वे कनाडा में बेसबॉल जैसे अमेरिकी खेलों के बढ़ते प्रभाव को भी कम करना चाहते थे और अमेरिका में खेलों में भाग लेने वाले कनाडा के एथलीट को भी आकर्षित करना चाहते थे. कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में एक समस्या यह थी कि इसे ब्रितानी साम्राज्य से कैसे जोड़ा जाए और बदलती राजनीति के दौर में ओलंपिक जैसे बड़े खेलों के सामने इसके महत्व को कैसे बरक़रार रखा जाए?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टर मैथ्यू मैकडोवेल ने कहा कि पहले कॉमनवेल्थ गेम्स ब्रितानी साम्राज्य को गौरवान्वित करते दिखे थे जबकि ओलंपिक खेलों की मूल भावना राष्ट्रवाद को बढ़ावा नहीं देती थी. हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी एथलीट और भाग लेने वाले देश इससे सहमत थे.
हालांकि इन खेलों के स्वरूप में बदलाव की आवश्यकता थी. कई बार इस प्रतियोगिता का नाम भी बदला गया और आख़िर में 1978 में इसका नाम कॉमनवेल्थ गेम्स हो गया. लेकिन तब एक और समस्या खड़ी हो गयी थी. इसका कारण था दक्षिण अफ़्रीका और उसके पड़ोसी देश जिसका नाम उस समय रोडेशिया था- उन्हें कॉमनवेल्थ में शामिल किया गया था.
1948 से दक्षिण अफ़्रीका की अपार्टाइड या नस्लवादी सरकार के अपार्टाइड क़ानून की वजह से केवल श्वेत एथलीट ही अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व कर सकते थे. उसी प्रकार रोडेशिया ने भी काले एथलीट की शिरकत पर कड़े नियंत्रण लगा रखे थे. हालांकि 1980 में ज़िम्बाब्वे के गठन के बाद इसमें बदलाव आया. 1962 से 1990 के दशक तक दक्षिण अफ़्रीका के अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा हुआ था. 1994 में राजनीतिक और खेल नीतियों में सुधार के बाद यह प्रतिबंध हट गया. हालांकि, इससे विवाद ख़त्म नहीं हुए.
एक मुद्दा यह है कि ब्रिटेन के किंग चार्ल्स अब भी औपचारिक तौर पर राष्ट्रमंडल के प्रमुख हैं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टर मैथ्यू मैकडोवेल ने कहा, “कुछ देशों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि राष्ट्रमंडल का नेतृत्व ब्रिटेन के चंद लोगों के शाही परिवार के पास क्यों रहे? कॉमनवेल्थ गेम्स का अभी तक तो अंत नहीं हुआ है लेकिन भविष्य में ऐसा ज़रूर हो सकता है.”
इन विवादों के अलावा एक बड़ा सवाल यह है कि क्या इन खेलों के आयोजन का ख़र्च उठाना आगे भी संभव होगा?
2022 में बर्मिंघम में आयोजित हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में एक अरब डॉलर ख़र्च हुए और उनसे यूके की अर्थव्यवस्था में 1.5 अरब डॉलर का योगदान आया. यानी कुछ आर्थिक लाभ ज़रूर हुआ. लेकिन भविष्य में आयोजक यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि खेलों के आयोजन से आर्थिक नुक़सान ना हो.
इस बारे में हमने बात की डॉक्टर वेरिटी पॉसलव्हाइट से, जो यूके की लाफ़्ब्रा यूनिवर्सिटी में स्ट्रैटेजिक इवेंट मैनेजमेंट की लेक्चरर हैं. उनके अनुसार किसी भी बड़ी खेल प्रतियोगिता के आयोजन की दावेदारी पेश करने के लिए आवश्यक सुविधाएं आदि की योजना बनाने और आकलन करने में भी काफ़ी पैसे खर्च होते हैं. बाद में कॉमनवेल्थ खेल आयोजन समिति इस योजना का आकलन करती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हर प्रकार से इन खेलों का आयोजन संभव है या नहीं.
लेकिन क्या कुछ आयोजक शहर यह भी सोचते हैं कि कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन से उनकी ओलंपिक खेलों के आयोजन की दावेदारी और तैयारी अधिक पुख़्ता हो सकती है?
डॉक्टर वेरिटी पॉसलव्हाइट ने इसके जवाब में कहा कि 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स के सौ साल पूरे हो जाएंगे. अब तक कई शहरों ने कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन किया है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उनका कहना है, “उन सभी का इरादा रहा है कि इन खेलों के आयोजन के ज़रिए अपनी खेल सुविधाओं को मज़बूत किया जाए. फिर इस क्षमता और अनुभव के बल पर ओलंपिक खेलों के आयोजन के लिए दावेदारी पेश की जाए.”
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसका एक उदाहरण लंदन है जिसने 1934 में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन करने के बाद 1948 में ओलंपिक खेलों का आयोजन किया था. लेकिन यह हमेशा नहीं हो पाया है. डॉक्टर वेरिटी पॉसलव्हाइट ने याद दिलाया, “दिल्ली में 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हुआ था. मगर ओलंपिक खेलों के आयोजन की उसकी आकांक्षा अभी पूरी नहीं हो पाई है. हालांकि गुजरात में 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन होने के बाद उसकी इस आकांक्षा को ज़रूर बल मिलेगा.”
मगर क्या कॉमनवेल्थ के कुछ सदस्यों को ‘कॉमनवेल्थ’ नाम से भी आपत्ति हो सकती है. डॉक्टर पॉसलव्हाइट मानती हैं कि कॉमनवेल्थ शब्द का ब्रितानी साम्राज्यवाद से गहरा संबंध रहा है. वह कहती हैं कि यह खेल सौहार्द और मित्रता बढ़ाने का महत्वपूर्ण ज़रिया रहे हैं इसलिए इस मुद्दे से कोई समस्या आने की आशंका नहीं है. आइए अब नज़र डालते हैं 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स की ओर.
सौहार्द और सहयोग की ताक़त
कॉमनवेल्थ गेम्स का किंग्स बैटन रिले 1 जुलाई को ग्लासगो पहुंचेगा और महीने के आख़िर में खेल शुरू होंगे. वेस्ट स्कॉटलैंड यूनिवर्सिटी में लेगसी एंड कम्यूनिटी इंगेजमेंट फ़ॉर कॉमनवेल्थ गेम्स की डायरेक्टर प्रोफ़ेसर गेल मैकफ़र्सन का कहना है कि ग्लासगो शहर में कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर काफ़ी उत्साह है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, “स्पष्ट संदेश यह दिया गया है कि इन खेलों का आयोजन पिछले खेलों से अलग होना चाहिए. आयोजन के लिए अधिक धन नहीं है जिसके चलते इसे किफ़ायती तरीके से आयोजित करना ज़रूरी है. साथ ही इससे यह संदेश भी जाएगा कि भविष्य में छोटे देश भी कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन के बारे मे सोच सकते हैं.”
इसके लिए आयोजन का एक नया मॉडल बनाना ज़रूरी है. इन खेलों की सभी स्पर्धाएं आठ किलोमीटर के दायरे में आयोजित होंगी. प्रोफ़ेसर गेल मैकफ़र्सन ने बताया कि सभी खेल पहले से मौजूद चार जगहों पर होंगे. वहां स्टेडियम और मैदानों को ठीक करने और अपग्रेड करने के लिए कुछ धन उपलब्ध है. बाद में इन सुविधाओं का इस्तेमाल क्षेत्र में खेल के विकास के लिए हो पाएगा. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने यह भी कहा, “इस आयोजन में सार्वजनिक धन का कोई इस्तेमाल नहीं होगा. कोशिश यह होगी कि इन खेलों से आर्थिक नुक़सान ना हो. हो सकता है इनसे कुछ मुनाफ़ा भी कमाया जा सकेगा.”
बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में 19 खेल थे लेकिन 2026 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में केवल 10 खेल और 6 पैरा स्पोर्ट्स इवेंट्स होंगे. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कॉमनवेल्थ संघ का कहना है कि इन खेलों के बारे में नए सिरे से सोच कर बदलाव करने की ज़रूरत को ध्यान में रख कर यह फ़ैसला किया गया है. उसे उम्मीद है कि इससे कई अन्य देशों को इन खेलों के आयोजन या उसकी दावेदारी के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा.
कॉमनवेल्थ गेम्स का एक उद्देश्य यह भी है कि इसमें भाग लेने वाले देश अपनी संस्कृति और खेल क्षमता को विश्व के सामने पेश कर सकें. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार प्रोफ़ेसर गेल मैकफ़र्सन ने कहा, “यह क्षमताएं हर देश की सॉफ़्ट पावर का हिस्सा हैं जिन्हें उन देशों के नेता एक विश्व मंच पर पेश कर सकते हैं. दूसरी बात यह कि खेलों के ज़रिए सौहार्द और सांस्कृतिक आदान प्रदान भी बढ़ता है. सभी देशों को यह अवसर मिलना चाहिए.”
अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर-क्या कॉमनवेल्थ गेम्स को बंद करने का समय आ गया है?
इन खेलों के आयोजन से ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य के हाथ पीछे खींचने और उसके बाद में इसे ग्लासगो में आयोजित करने की प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े हुए हैं. खेलों के आयोजन की बढ़ती लागत और समकालीन राजनीति में इसकी सार्थकता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं. इनके जवाब में राष्ट्रमंडल संघ ने खेलों के स्वरूप मे बदलाव करके उन्हें किफ़ायती बनाने की कोशिश की है ताकि उनका आयोजन करने वाली सरकारें उसका आर्थिक बोझ उठा सकें. साथ ही राष्ट्रमंडल संघ इन खेलों को बंद करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कॉमनवेल्थ गेम्स के शताब्दी वर्ष में यानी 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन भारत के अहमदाबाद शहर में होना तय है. प्रोफ़ेसर गेल मैकफ़र्सन कहती हैं कि खेलों के आयोजन और स्वरूप में बदलाव ज़रूरी था ताकि अन्य देशों को भी इसके आयोजन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. अब नाइजीरिया भी 2034 के कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन करने के लिए उत्सुक है.


