संघर्ष से सफलता तक: पोलियो से लड़कर कॉमनवेल्थ गेम्स तक पहुंचे झंडू कुमार

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नई दिल्ली : हौसले और मेहनत के दम पर बड़ी से बड़ी मुश्किलों को भी हराया जा सकता है। इसका जीता-जागता उदाहरण बिहार के नालंदा निवासी पैरा एथलीट झंडू कुमार हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उनका शुरुआती जीवन आर्थिक तंगी और कठिन संघर्षों से भरा रहा। परिवार का गुजारा चलाने के लिए उन्होंने कभी ई-रिक्शा चलाया तो कभी सब्जियां बेचकर मेहनत की। तमाम चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों का साथ नहीं छोड़ा। अब यही खिलाड़ी ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार है, जो उनके संघर्ष और दृढ़ संकल्प की प्रेरणादायक मिसाल है।

झंडू कुमार ने 5 साल की उम्र में ही अपने दोनों पैरों की ताकत गंवा दी थी। पोलियो के कारण बचपन से ही झंडू बैसाखी का सहारा ले रहे थे। इसके बाद भी उनका जीवन सुधरा नहीं और गरीबी ने उनके परिवार को जकड़ लिया। उनके परिवार का काम था सब्जी बेचने का। एक वक्त झंडू ने भी सब्जी बेची थी। फिर कोरोना काल में उन्होंने ई-रिक्शा चलाकर गुजारा किया।

आर्थिक तंगी का दौर इतना कठिन था कि झंडू कुमार के परिवार को अपना ई-रिक्शा भी बेचना पड़ गया। तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य की ओर लगातार बढ़ते रहे। कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए रवाना होने से पहले बुधवार (15 जुलाई) को उन्होंने मीडिया से बातचीत में अपने संघर्ष भरे सफर को साझा किया। इस दौरान उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्होंने गोला फेंक, भाला फेंक और चक्का फेंक जैसी स्पर्धाओं में हाथ आजमाया, लेकिन बाद में पैरा पावरलिफ्टिंग को अपना मुख्य खेल चुना। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने यह भी बताया कि इसी फैसले ने उनके करियर को नई दिशा दी और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का अवसर मिला।

कैसे पैरा एथलीट बने झंडू कुमार?

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार झंडू ने कहा,”मैंने शुरुआती जीवन में कई बुरे दिन व्यतीत किए हैं, जहां आलू, प्याज बेचने से कोरोना काल में ई-रिक्शान चलाने तक के संघर्ष शामिल हैं।” उन्होंने 2010 से 2012 के बीच जिम जाना शुरू कर दिया था। इसके बाद उन्होंने गोला फेंक, चक्का फेंक और भाला फेंक में हाथ आजमाया। फिर इसी सफर को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने एक खास सलाह के बाद पैरा पॉवरलिफ्टिंग में अपना करियर चुना।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने बताया,”मैंने लिफ्टिंग बेल्ट के साथ ट्रेनिंग शुरू की। मैं 100 किलो से अधिक वजन उठाने लगा था। मेरे कोच ने मुझे प्रोत्साहित किया और 2018 में बिहार स्टेट गेम्स में हिस्सा दिलाया। मुझे प्रतियोगिता में हिस्सा लेने और बिहार का नाम ऊंचा करने में मजा आने लगा था।” हालांकि, उनका संघर्ष यहां थमा नहीं था और असली परीक्षा शुरू हुई जब जिम से बाहर की दुनिया में वह आगे बढ़े।

परिवार का पेट भरने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। जीवन यापन के लिए उन्होंने सब्जियां बेचीं और अपनी व्हीलचेयर पर 20 किलोमीटर का सफर तय करते हुए सब्जियां बेचते थे। इसके बाद कोरोना काल आया और उनका यह काम ठप होने लगा। फिर उन्होंने दोस्त से पैसे उधार लिए और ई-रिक्शा खरीदा। जैसे-तैसे उनका गुजारा शुरू हुआ और साथ ही साथ वह खेल में भी अपना हाथ आजमाते रहे।

कैसे मिला झंडू कुमार को पैरा पावरलिफ्टिंग का रास्ता?

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बातचीत के दौरान जब झंडू कुमार से पूछा गया कि उन्होंने गोला फेंक, भाला फेंक और चक्का फेंक जैसी स्पर्धाओं को छोड़कर पैरा पावरलिफ्टिंग का रास्ता क्यों चुना, तो उन्होंने बताया कि उन खेलों की तैयारी के दौरान जिम में बाइसेप्स और ट्राइसेप्स की अधिक एक्सरसाइज करने से उनके कंधे पूरी तरह खुल नहीं पाते थे। इसी दौरान बिहार के एक खेल पदाधिकारी ने उनकी शारीरिक क्षमता और ताकत को देखते हुए उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग अपनाने की सलाह दी। झंडू ने बताया कि उन्होंने उस सलाह पर अमल किया और यही फैसला उनके खेल करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार झंडू कुमार ने आगे बताया, “मैंने उनसे पूछा कि सर, पावरलिफ्टिंग कैसे और कहां खेली जाती है? तब उन्होंने बताया कि 2022 में कोलकाता में राष्ट्रीय चैंपियनशिप होने वाली है। उस समय मेरी तैयारी भी अच्छी चल रही थी और मैं 100 से 110 किलोग्राम तक वजन उठा रहा था। इसके बाद मैंने उस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और कांस्य पदक जीतने में सफल रहा।” यहीं से झंडू कुमार के पैरा पावरलिफ्टिंग करियर की शुरुआत हुई। इसके बाद उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी और मार्च 2025 में 206 किलोग्राम वजन उठाकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। अब ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में उनसे भारत के लिए पदक जीतने की उम्मीदें हैं।

रजिंदर सिंह रहेलू ने बदली झंडू कुमार की जिंदगी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार झंडू कुमार ने बताया कि पैरा पावरलिफ्टिंग में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपना ई-रिक्शा बेच दिया और बेहतर प्रशिक्षण की तलाश में दिल्ली पहुंच गए। यहां उनकी मुलाकात पैरा पावरलिफ्टिंग के दिग्गज और कोच रजिंदर सिंह रहेलू से हुई। शुरुआत आसान नहीं रही और वह अपने शुरुआती प्रयासों में तीन बार वजन उठाने में असफल रहे। इसके बावजूद रजिंदर सिंह रहेलू ने उन पर भरोसा बनाए रखा और लगातार उनका मार्गदर्शन किया। झंडू के अनुसार, आज वह जिस मुकाम पर हैं, उसमें अपने कोच के विश्वास, सहयोग और प्रशिक्षण की सबसे बड़ी भूमिका रही है।

साल 2023 में झंडू कुमार को गांधीनगर स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र में प्रशिक्षण का अवसर मिला, जिसने उनके करियर को नई दिशा दी। लगातार मेहनत और कड़े अभ्यास का नतीजा यह रहा कि 2025 में उन्होंने 206 किलोग्राम वजन उठाकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। अब झंडू ग्लास्गो में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं और देश के लिए पदक जीतने के इरादे से मैदान में उतरेंगे।

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