नई दिल्ली : जन्म से सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) जैसी शारीरिक चुनौती का सामना करने वाले अरुणाचल प्रदेश के 21 वर्षीय पैरा धावक तिनगोंग वांगपन ने तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने सपनों का पीछा नहीं छोड़ा। उनके पिता चाहते थे कि वह पढ़ाई पर ध्यान दें, जबकि दोस्त भी उनकी मेहनत पर सवाल उठाते हुए कहते थे कि इसका कोई फायदा नहीं होगा। लेकिन उनकी मां ने हमेशा उनके सपने को जिंदा रखा। वह चोरी-छिपे करीब 1000 रुपये के जूते खरीदकर उन्हें देती थीं, ताकि वह अपनी ट्रेनिंग जारी रख सकें। परिवार की परिस्थितियों और लोगों की बातों के बावजूद तिनगोंग ने मेहनत जारी रखी और अपनी चुनौतियों को सफलता की राह में बाधा नहीं बनने दिया।
सड़क पर अकेले दौड़कर शुरुआत करने वाले तिनगोंग आज भारत के उन उभरते पैरा एथलीटों में शामिल हैं, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जिन्होंने मेक्सिको में आयोजित वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रां प्री 2026 की पुरुष 200 मीटर टी37 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। विदेश में उनका यह पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट था। अरुणाचल प्रदेश से भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (NCOE), गांधीनगर पहुंचने वाले पहले पैरा एथलीट तिनगोंग ने जनसत्ता से विशेष बातचीत में अपने संघर्ष, परिवार के त्याग, ट्रेनिंग, अंतरराष्ट्रीय सफलता और पैरालंपिक तक पहुंचने के सपने पर खुलकर बात की।
कैसे हुई पैरा स्पोर्ट्स में तिनगोंग की एंट्री
पैरा एथलेटिक्स में कैसे हुई शुरुआत?
सबसे पहले मैं यह अवसर देने के लिए धन्यवाद देना चाहूंगा। बचपन में मैं थोड़ी-बहुत खेलकूद की गतिविधियां करता था, लेकिन मुझे इसमें बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। मेरी शारीरिक विकलांगता के बावजूद मेरी मां हमेशा मेरा सपोर्ट करती थीं। वह मुझे सुबह-सुबह वॉक पर ले जाती थीं और मुझे एक्टिव रखती थीं। जब मैं 12वीं क्लास में था, तब मुझे एक भैया से पता चला कि पैरा स्पोर्ट्स (Para Sports) भी होते हैं। उसके बाद मैंने अकेले ही सुबह-शाम दौड़ना शुरू कर दिया। मैं रास्ते पर ही दौड़ता रहता था।
मुझे ट्रेनिंग को मैनेज करना नहीं आता था। बाद में अरुणाचल पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन से सेठी सर ने मेरी मदद की। मैंने 7वीं ‘इंडियन ओपन नेशनल चैंपियनशिप’ में हिस्सा लिया। वहां खेलने के बाद डॉ. गगन सेठी सर ने मुझे चुना और मुझे साई (SAI) गांधीनगर ले आए। अभी मैं नितिन सर की कोचिंग और मार्गदर्शन में अभ्यास कर रहा हूं। बता दें कि डॉ. गगन सेठी अभी गांधी नगर स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) में हाई परफॉर्मेंस एनालिस्ट (फिजियोथेरेपी और क्लासिफायर व TIDC सदस्य पैरा एथलेटिक्स) हैं।
शारीरिक चुनौती से सफलता तक का सफर
तिनगोंग की विकलांगता किस प्रकार की है? क्या यह जन्मजात है?
जी हां, मेरी विकलांगता जन्म से ही है। मेरे शरीर का बायां हिस्सा (Left side) काफी कमजोर है। बाएं हाथ और पैर से काम करने में बहुत दिक्कत होती है। यह नर्वस सिस्टम का एक डिसऑर्डर है, जिसे सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) कहते हैं। पैरा स्पोर्ट्स में मेरी कैटेगरी T37 है।
तिनगोंग की पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघर्ष की कहानी
तिनगोंग के परिवार में कौन-कौन हैं, क्या करते हैं माता-पिता?
परिवार में मेरे माता-पिता, एक छोटी बहन और एक छोटा भाई है। मैं घर में सबसे बड़ा हूं। मेरे पिता आर्मी में हैं और मेरी मां हाउसवाइफ हैं। मैं अरुणाचल प्रदेश के लोंगडिंग (Longding) जिले का रहने वाला हूं।
एथलेटिक्स की शुरुआत पर तिनगोंग के अपनों ने क्या कहा?
शुरुआत में दोस्त कहते थे कि ‘इतनी मेहनत मत करो, कुछ नहीं होने वाला।’ पापा चाहते थे कि मैं सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दूं। पढ़ाई मुजे ज्यादा पसंद नहीं है, लेकिन मेरी मां ने मेरा बहुत साथ दिया। जब पापा सपोर्ट नहीं करते थे, तब मम्मी छुप-छुप कर मुझे जूते दिलाती थीं। उन्होंने मुझे 1000 रुपये वाले जूते दिलाए थे। वे जूते हाईवे पर दौड़ने के लिए सही नहीं थे और पैरों के लिए ठीक नहीं थे, लेकिन उनका सपोर्ट मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। आर्थिक समस्याएं भी थीं। बाद में पापा को मुझे सपोर्ट करने के लिए लोन (ऋण) भी लेना पड़ा था।
शिक्षा और भविष्य के लक्ष्य
तिनगोंग की शिक्षा और पढ़ाई का सफर
मैं अभी राजीव गांधी यूनिवर्सिटी से संबद्ध कॉलेज से बीए सोशियोलॉजी/समाजशास्त्र (ऑनर्स) कर रहा हूं। एशियन गेम्स के ट्रायल्स के कारण मैंने अपने छठे सेमेस्टर को फिलहाल होल्ड (ब्रेक) पर रखा हुआ है।
आपके अगले लक्ष्य क्या हैं?
मेरा अगला पहला लक्ष्य एशियन गेम्स (पैरा) के लिए क्वालिफाई करना है। उसके बाद मैं अगले साल होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप और फिर पैरालंपिक के लिए तैयारी करना चाहता हूं।
SAI NCOE ने बदला तिनगोंग का खेल और ट्रेनिंग का अंदाज
NCOE में आने के बाद ट्रेनिंग को मिली नई दिशा
यहां आने से पहले मुझे ट्रेनिंग, डाइट या रिकवरी के बारे में कुछ नहीं पता था। मैं बस बिना सोचे-समझे मेहनत करता रहता था, लेकिन यहां ट्रेनिंग का एक प्रॉपर स्ट्रक्चर (उचित ढांचा) है। यहां बताया जाता है कि किस समय ट्रेनिंग करनी है। कब रिकवरी लेनी है। कैसी डाइट लेनी है और फिजियो, मसाजर व साइकोलॉजिस्ट जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
मेक्सिको का अनुभव और अंतरराष्ट्रीय मंच
मेक्सिको में कैसा रहा तिनगोंग वांगपन का प्रदर्शन?
मेक्सिको में मेरा पहला क्लासिफिकेशन था (मेरी विकलांगता की केटेगरी तय करने के लिए), जिसमें मैं सफलतापूर्वक क्वालिफाई हो गया हूं। वहां मैंने देश के लिए गोल्ड मेडल जीता। जब मैंने पोडियम पर खड़े होकर अपना राष्ट्रगान सुना तो मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ और बहुत खुशी हुई।
नए पैरा एथलीटों के लिए क्या बोले तिनगोंग?
युवा खिलाड़ियों को तिनगोंग की क्या सलाह है?
मैं बस यही कहना चाहूंगा कि मन लगाकर मेहनत करो और अपने लक्ष्य पर पूरा ध्यान केंद्रित रखो। जो लोग आपको हतोत्साहित करते हैं या नकारात्मक बातें कहते हैं, उनकी बातों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है। अपने ऊपर भरोसा रखिए, लगातार मेहनत करते रहिए और अपने सपने को हासिल करने के लिए पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ते रहिए।


