नई दिल्ली : भारत और श्रीलंका के बीच खेली जा रही दो मैचों की टेस्ट सीरीज में कूकाबूरा गेंद का इस्तेमाल किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया में तैयार होने वाली कूकाबूरा गेंद का उपयोग दुनिया के ज्यादातर टेस्ट खेलने वाले देशों में किया जाता है। हालांकि, इंग्लैंड, वेस्टइंडीज और भारत में अलग-अलग गेंदों का इस्तेमाल होता है। इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में ड्यूक की गेंद से टेस्ट मुकाबले खेले जाते हैं, जबकि भारत में एसजी गेंद का इस्तेमाल किया जाता है। इन तीनों गेंदों की बनावट, सीम और स्विंग की प्रकृति में अंतर होने के कारण इनके व्यवहार में भी फर्क देखने को मिलता है।
ड्यूक और एसजी दोनों गेंदें हाथ से सिली जाती हैं। दोनों ज्यादा देर तक गेंदबाजों की मदद करती हैं। इसके उलट कूकाबूरा गेंद मशीन सिली जाती है। कुछ समय बाद इसकी सीम चपटी हो जाती है। इससे यह बल्लेबाजी के लिए आसान हो जाती है। कूकाबूरा की गेंद से 25 ओवर के बाद गेंदबाजों को मदद नहीं मिलती। इसका उदाहरण गॉल में खेले जा रहे भारत-श्रीलंका टेस्ट में देखने को मिला।
नई कूकाबूरा गेंद बनी हथियार, शुरुआत में विकेट निकालना आसान
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार श्रीलंका ने पहले सत्र में 90 पर 5 विकेट गंवा दिए थे। इसके बाद निरोशन डिकवेला और सोनल दिनुशा ने पूरे सत्र में विकेट नहीं गिरने दिया। पहले सत्र में कहर बरपाने वाले भारतीय गेंदबाज दूसरे सत्र में बेबस दिखे। विकेट ही नहीं ले पाए। भारत की पहली पारी में भी ऐसा देखने को मिला था। दूसरी नई गेंद मिलते ही श्रीलंकाई गेंदबाजों को विकेट मिलने लगा था।
कैसे बनती है कूकाबूरा गेंद
चमड़े की मोटाई कम से कम 3.5 मिलीमीटर होती है। सीम मशीन से सिले होते हैं। इसीलिए कूकाबूरा की सीम सपाट होती है। शुरुआती ओवरों में तेज गेंदबाजों को अच्छी स्विंग और सीम मिलती है। लेकिन सीम दबते ही गेंदबाज बेअसर हो जाते हैं, क्योंकि गेंद नरम हो जाती है। पतली सीम की वजह से फिंगर स्पिनर्स के लिए गेंद को ग्रिप करना मुश्किल होता है, जबकि रिस्ट स्पिनर्स के लिए यह बेहतर रहता है। स्विंग और सीम मूवमेंट न होने पर तेज गेंदबाज आमतौर पर गेंद को पटककर (hit the deck) फेंकते हैं। मशीन से सिली होने के कारण यह ऊपर की तरफ थोड़ी चपटी होती है।
कूकाबूरा की गेंद में बदलाव
2020 के बाद कूकाबूरा की गेंद में बदलाव हुआ। पहले गेंद की सीम चपटी होने पर गेंद नरम हो जाती थी। गेंद ज्यादा देर तक सख्त रहने के लिए उस पर एक्स्ट्रा लैकर(पॉलिश) लगाया जाने लगा। इससे सीम से ज्यादा देर तक मूवमेंट मिलती थी। ज्यादा मूवमेंट की वजह सीम के नीचे बनी एक उभार है। यह उभार गेंद के सेंटर को दो प्लास्टिक कप में रखकर बनाया गया है। दोंनों सीम के नीचे मिलते हैं और वहां उभरे हुए होते हैं।
गेंद का आकार नहीं होता खराब
सीम की सिलाई के नीचे मौजूद यह उभार गेंद को ज्यादा देर तक सही आकार में बनाए रखने में मदद करता है। पहले यह लगभग 15वें ओवर तक चपटी हो जाती थी। अगर कोई तेज गेंदबाज सीम के साथ पिच पर गेंद पटकता है, तो गेंद के पहले के मुकाबले ज्यादा हरकत करने की संभावना रहती है। यही कारण है कि अब गेंद लगभग एक सत्र बल्लेबाजों को परेशान करती है।
एसजी की गेंद
एसजी की गेंद बनाने के लिए 3.5 मिलीमीटर चमड़ी का इस्तेमाल होता है। इसकी सिलाई हाथ से की जाती है। एसजी बॉल की सीम ज्यादा उभरी हुई और सीधी होती है। यह पूरे दिन के खेल के दौरान बनी रहती है। इसकी उभरी हुई सीम लगभग 90 ओवर तक टिकी रहती है। शुरुआत में बॉल स्विंग नहीं करती, लेकिन जब एक तरफ से बॉल को चमकाना शुरू किया जाता है, तो यह हवा में हरकत करने लगती है। जब बॉल सीमर के हाथ से छूटती है, तो इसकी उभरी हुई सीम सीधी रहती है, जिससे सीम और स्विंग पर बेहतर कंट्रोल मिलता है। स्पिनर्स को बॉल पर मजबूत पकड़ मिलती है। इससे ज्यादा टर्न और बाउंस मिलता है। स्पिनर्स को ड्रिफ्ट भी मिलती है। एसजी बॉल चमक जल्दी खो देती है, जिससे कुछ समय बाद पारंपरिक स्विंग कम हो जाता है। हालांकि, इसकी सीधी सीम रिवर्स स्विंग को मुमकिन बनाती है।
ड्यूक की गेंद
ड्यूक गेंद को तैयार करने के लिए 4 से 4.5 मिलीमीटर मोटी चमड़ी को दबाकर करीब 3.5 मिलीमीटर का किया जाता है। इसकी सिलाई हाथ से की जाती है और धागे की छह लाइनें गेंद के कॉर्क को मजबूती से जोड़कर रखती हैं। यही वजह है कि गेंद लंबे समय तक अपना आकार बनाए रखती है और करीब 80 ओवर तक इसकी सीम बरकरार रह सकती है, जिसके बाद दूसरी नई गेंद ली जाती है। ड्यूक गेंद की यही विशेषता उसे स्विंग गेंदबाजों के लिए खास बनाती है। गेंद की चमड़ी पर सिंथेटिक ग्रीस से पॉलिश की जाती है, जिससे वह ज्यादा पानी सोखने से बचती है और गेंद के प्रदर्शन पर मौसम का असर कुछ हद तक कम होता है।


