संघर्ष भरे बचपन से एशियाई चैंपियन बनने तक, लवलीना की कहानी

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नई दिल्ली : एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन के घूंसों में सिर्फ पंच की ताकत नहीं, बल्कि एक अधूरी थाली का संघर्ष भी छिपा है। बचपन में लवलीना के लिए भरपेट भोजन मिलना किसी जीत से कम नहीं था। हालांकि, आज वही मुक्केबाज अपनी थाली में मौजूद हर निवाले के पोषण का पूरा हिसाब रखती हैं। असम के गोलाघाट जिले के बरमुखिया गांव से निकलकर ओलंपिक पदक और एशियन गेम्स का स्वर्ण जीतने वाली लवलीना के लिए भोजन अब सिर्फ भूख मिटाने का जरिया नहीं, बल्कि उनके खेल और जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लवलीना बोरगोहेन बताती हैं कि उनके बचपन में परिवार का मुख्य भोजन भात ही था और परिवार के लिए जीवन-यापन आसान नहीं था। कई बार उन्हें भरपेट भोजन मिल जाता था, तो कभी भोजन की कमी का सामना करना पड़ता था। खेल की दुनिया में कदम रखने के बाद उन्हें समझ आया कि एक खिलाड़ी के लिए सिर्फ पेट भरना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि भोजन में प्रोटीन, फाइबर और अन्य जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आज लवलीना न केवल अपनी डाइट को लेकर बेहद सजग हैं, बल्कि गांव के बच्चों को भी स्थानीय और आसानी से उपलब्ध भोजन के जरिए संतुलित पोषण की अहमियत समझाने की कोशिश कर रही हैं।

कभी भात से ही मिटती थी भूख

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लवलीना बोरगोहेन बताती हैं, उस समय भोजन ही प्रिय था। जो मिलता खा लेते। परिवार में जीवनयापन ही कठिन था। कभी भरपेट मिलता था, कभी नहीं। मुख्य भोजन सिर्फ भात था, लेकिन शरीर को पुष्ट करने वाले तत्व नहीं थे। जब खेलना शुरू किया तो तब पता चला कि स्वस्थ जीवन के लिए आहार कितना जरूरी है। आज भी गांव में बहुत लोगों के लिए आहार का मतलब है कि बस कोई भी खाना मिल जाए, जिससे ऊर्जा मिल जाए।

बच्चों को समझा रहीं पौष्टिक थाली का महत्व

ओलंपिक पदक जीतने के बाद लवलीना बोरगोहेन ने अपने गांव में प्रशिक्षणशाला शुरू की। मकसद सिर्फ मुक्केबाजी के साथ-साथ सही खाने के बारे में सिखाना था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लवलीना बोरगोहेन ने कहा, ‘‘हम पूर्वोत्तर के भोजन को हटा नहीं सकते, लेकिन उसमें से क्या उचित है (जैसे कितना अनाज, कितना प्रोटीन, कितना रेशा (फाइबर) देना है), उसे सही रूप में देने की कोशिश कर रहे हैं। मैं बच्चों को सिखाती हूं कि जब थाली लो तो देखो कि प्रोटीन किसमें है, शर्करा किसमें है, फाइबर किसमें है।’’ लवलीना बोरगोहेन मानती हैं कि भारत में हर दस किलोमीटर पर खान-पान बदल जाता है, इसलिए स्थानीय भोजन में ही संतुलित पोषण की समझ जरूरी है, ताकि भविष्य के चैंपियनों को भूख से नहीं लड़ना पड़े।

यात्रा में भी डाइट से समझौता नहीं करतीं लवलीना

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लवलीना बोरगोहेन ने बताया, ‘‘सबसे पहले हमारे साथ न्यूट्रिशनिस्ट होते हैं। यात्रा के दौरान वह टीम के साथ रहते हैं या जरूरत पड़ने पर फोन के जरिए हमसे संपर्क में रहते हैं। मैं मांसाहारी हूं, इसलिए प्रोटीन की जरूरत पूरी करना मेरे लिए थोड़ा आसान हो जाता है। विदेशों में नॉन-वेज भोजन भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है, जिससे डाइट को संतुलित बनाए रखने में ज्यादा परेशानी नहीं होती।’’

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार एक कार्यक्रम में बोलते हुए लवलीना बोरगोहेन ने कहा, ‘‘हम कोशिश करते हैं कि जिस जगह जाएं, वहीं के खाने को ही अपनाएं। खाना स्किप नहीं कर सकते, यही अनुशासन है। कैंप में तो मैं अपना खाना खुद कुक करती हूं। बैग में घर के लड्डू हमेशा रखती हूं। साथ में प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन के सप्लीमेंट लेती हूं, क्योंकि एथलीट को बहुत पसीना आता है और सिर्फ सामान्य खाने से जरूरत पूरी नहीं होती।’’लवलीना बोरगोहेन ने चीट मील (मनपसंद खाना) पर कहा, ‘‘चीट मील तो रहता ही है। दिल्ली आकर छोले-भटूरे और गोलगप्पे खाने का बहुत मन हो रहा था। कभी-कभी ट्रीट जरूरी है। मन खुश रहता है तो हम कुछ भी कर जाते हैं।’’

लवलीना की मांग- स्कूल से शुरू हो पोषण की पढ़ाई

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लवलीना बोरगोहेन ने कहा, ‘‘शहरों में लोग न्यूट्रिशन के बारे में जानते हैं, लेकिन गांव-गांव तक इसकी सही जानकारी अभी नहीं पहुंची है। अगर सरकार स्कूल के पाठ्यक्रम में पोषण से जुड़ी सही और जरूरी जानकारी शामिल करती है, तो इसका सबसे बड़ा असर देखने को मिलेगा। बच्चा स्कूल में सीखेगा और घर जाकर अपने माता-पिता को भी बताएगा कि उसकी थाली में प्रोटीन जैसे जरूरी पोषक तत्वों की कमी है। कई अभिभावकों को खुद इसकी जानकारी नहीं होती, लेकिन जब बच्चे उन्हें समझाएंगे तो धीरे-धीरे बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।’’

लवलीना बोरगोहेन की उपलब्धियां और सम्मान
  • ओलंपिक: कांस्य पदक- टोक्यो 2020
  • एशियाई खेल: स्वर्ण पदक- आइची नागोया 2026, रजत पदक- हांगझू 2022
  • विश्व चैंपियनशिप: स्वर्ण पदक- नई दिल्ली 2023, कांस्य पदक- 2018, 2019
  • राष्ट्रमंडल खेल: रजत पदक- ग्लासगो 2026
  • एशियाई चैंपियनशिप: स्वर्ण पदक- 2022, कांस्य पदक- 2017, 2021
  • सम्मान: अर्जुन अवार्ड 2020, खेल रत्न 2021

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