नई दिल्ली : इरादा, जज्बा और मजबूत हौसला हो तो इंसान किसी भी चुनौती को मात देकर सफलता की नई कहानी लिख सकता है। भारतीय पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी प्रमोद भगत इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बचपन में पोलियो के कारण उनका बायां पैर प्रभावित हो गया, लेकिन उन्होंने इसे कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। अपनी मेहनत, लगन और असाधारण प्रतिभा के दम पर उन्होंने बैडमिंटन की दुनिया में ऐसा मुकाम हासिल किया, जहां तक पहुंचना आसान नहीं होता।
शारीरिक चुनौती के बावजूद प्रमोद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और देश को कई बड़ी प्रतियोगिताओं में गौरवान्वित किया। टोक्यो पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मजबूत इच्छाशक्ति और निरंतर मेहनत से हर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। उनका सफर न केवल खेल जगत के लिए, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किलों के बावजूद अपने सपनों को साकार करना चाहता है।
पोलियो से प्रभावित हुआ पैर, पर हौसलों से प्रमोद भगत ने रचा इतिहास
प्रमोद भगत का जन्म 4 जून 1988 को बिहार के वैशाली जिले में हुआ था। जब वह मात्र चार-पांच वर्ष के थे, तब पोलियो के कारण उनका बायां पैर प्रभावित हो गया। जीवन की शुरुआती दहलीज पर ही दिव्यांगता का सामना करने वाले प्रमोद ने इसे कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। आर्थिक परिस्थितियों और बेहतर देखभाल के लिए वे ओडिशा चले गए और अपने रिश्तेदार/बुआ के पास अटाबीरा (बरगढ़ जिला) में रहकर पले-बढ़े। बचपन में जब वे अपने आसपास के बच्चों को खेलते देखते थे, तो उनमें भी बैडमिंटन के प्रति आकर्षण जगा।
आर्थिक तंगी में बीता प्रमोद भगत का बचपन, मेहनत के दम पर बने चैंपियन
प्रमोद के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद सामान्य थी, जिस कारण उनके पास खुद का रैकेट या आवश्यक खेल सामग्री खरीदने के पैसे नहीं होते थे। शुरुआती दिनों में वे केवल कोर्ट की सफाई करने और दूसरों से मिले उधार के रैकेट से अभ्यास करके खेल की बारिकियां सीखते थे। प्रमोद भगत के खेल सफर की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने शुरुआत में दिव्यांग खिलाड़ियों के बजाए शारीरिक रूप से सक्षम खिलाड़ियों के साथ मुकाबला किया। उन्होंने स्थानीय क्लबों में सामान्य खिलाड़ियों के खिलाफ खेलकर अपनी गति, फुटवर्क और रणनीति को निखारा।
15 की उम्र में शुरू हुआ सफर, प्रमोद भगत ने स्वर्ण पदक तक बनाई पहचान
प्रमोद जब शारीरिक रूप से सक्षम खिलाड़ियों को हराने लगे, तो कोचों और स्थानीय वरिष्ठों ने उनकी अद्वितीय प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पैरा-बैडमिंटन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 2006 में उन्होंने अपनी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पैरा-बैडमिंटन यात्रा की दिशा में गंभीर प्रयास शुरू किए और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 15 साल की उम्र में बैडमिंटन थामने वाले प्रमोद के करियर का सबसे बेहतरीन पल टोक्यो 2020 पैरालंपिक खेलों (जो 2021 में आयोजित हुए) में आया जब उन्होंने पुरुषों की सिंगल्स प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता। यह पहला मौका था जब बैडमिंटन को पैरालंपिक खेलों में आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया था।
टोक्यो पैरालंपिक 2020 में प्रमोद भगत ने जीता स्वर्ण पदक, रचा इतिहास
प्रमोद टोक्यो 2020 पैरालंपिक खेलों की पुरुष एकल बैडमिंटन प्रतियोगिता में मुख्य दावेदार के रूप में उतरे थे और उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए फाइनल में ब्रिटेन के डैनियल बेथेल को सीधे सेटों (21-14, 21-17) में हराकर स्वर्ण पदक जीता। इस जीत के साथ वे पैरालंपिक में बैडमिंटन का स्वर्ण पदक जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी बने और इतिहास के पन्नों में अपना नाम अमर कर दिया। यही नहीं प्रमोद ने विश्व चैंपियनशिप की सिंगल्स और डबल्स प्रतियोगिताओं में कई स्वर्ण और रजत पदक जीते हैं साथ ही वे 5 से अधिक बार (6 बार) विश्व चैंपियन का खिताब भी हासिल कर चुके हैं। प्रमोद का सफर अब भी जारी है और वो देश का नाम हर जगह रोशन कर रहे हैं।


