संघर्ष से स्वर्ण तक मोना का सफर, पोलियो को दी मात और एशियाड में चमकीं

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नई दिल्ली : राजस्थान के सीकर में जन्मी मोना अग्रवाल ने अपनी मेहनत, लगन और मजबूत हौसले से साबित कर दिया है कि मुश्किल परिस्थितियां भी सपनों की राह नहीं रोक सकतीं। महज नौ महीने की उम्र में पोलियो से प्रभावित होने के बाद उनके जीवन में कई चुनौतियां आईं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। मोना ने खेलों को अपनी पहचान बनाने का माध्यम बनाया और निशानेबाजी से पहले पैरा एथलेटिक्स, पावरलिफ्टिंग तथा सिटिंग वॉलीबॉल में भी अपनी प्रतिभा आजमाई। इसके बाद उन्होंने निशानेबाजी को अपना लक्ष्य बनाया और लगातार मेहनत से इस खेल में मुकाम हासिल किया।

अब 2026 के एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर मोना ने अपनी प्रेरणादायक यात्रा में एक और सुनहरा अध्याय जोड़ दिया है। उनकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयास से बड़ी से बड़ी चुनौती को पार किया जा सकता है। महिला 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 फाइनल में मोना ने 250.0 अंक हासिल किए। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने भारत की ही अवनि लेखरा को महज 0.4 अंक से पीछे छोड़कर स्वर्ण पदक जीता। अवनि को 249.6 अंकों के साथ रजत पदक मिला। इस तरह दोनों भारतीय निशानेबाजों ने स्पर्धा में शीर्ष दो स्थान हासिल किए।

नौ महीने की उम्र में पोलियो ने घेरा, लेकिन मोना ने नहीं मानी हार

मोना का जन्म आठ नवंबर 1987 को राजस्थान के सीकर में हुआ था। नौ महीने की उम्र में पोलियो से उनके दोनों पैर प्रभावित हुए। इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और कला विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की। जीवन में आत्मनिर्भर बनने के लिए उन्होंने नौकरी भी की और मानव संसाधन तथा मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में काम किया। मोना की खेल यात्रा निशानेबाजी से शुरू नहीं हुई थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में शॉट पुट, डिस्कस थ्रो और जैवलिन थ्रो जैसी स्पर्धाओं में हिस्सा लिया। इसके अलावा उन्होंने पैरा पावरलिफ्टिंग में भी अपनी क्षमता दिखाई। हालांकि, उनकी खेल यात्रा का एक अहम अध्याय सिटिंग वॉलीबॉल रहा।

वॉलीबॉल में भी मोना का जलवा, राजस्थान के लिए जीता स्वर्ण

मोना ने सिटिंग वॉलीबॉल में भी अपनी पहचान बनाई। 2019 में उन्होंने राष्ट्रीय सिटिंग वॉलीबॉल चैंपियनशिप में राजस्थान की टीम की कप्तानी की। उनकी अगुआई में टीम ने स्वर्ण पदक जीता। इस उपलब्धि ने दिखाया कि वह सिर्फ व्यक्तिगत स्पर्धाओं में ही नहीं, बल्कि टीम खेल में भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसके बाद उन्होंने दिसंबर 2021 में निशानेबाजी को अपना करियर बनाने का फैसला किया। एक नए खेल में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था, लेकिन मोना ने लगातार मेहनत की। कम समय में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।

तीन साल से भी कम समय में पैरालंपिक पदक तक पहुंचीं मोना

मोना की मेहनत का असर जल्द दिखने लगा। 2023 में उन्होंने विश्व पैरा शूटिंग विश्व कप में पदक जीता। उसी साल उन्होंने दक्षिण कोरिया के चांगवोन में आयोजित विश्व कप में महिला 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा का स्वर्ण पदक अपने नाम किया। मार्च 2024 में नई दिल्ली में हुए विश्व कप में उन्होंने 250.7 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक जीता और एशियाई रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद मोना ने पेरिस पैरालंपिक 2024 में महिला 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसी उपलब्धि और अन्य प्रदर्शन के लिए उन्हें 2024 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

मां की जिम्मेदारियों के बीच मोना की स्वर्णिम उड़ान

दो बच्चों की मां मोना ने पारिवारिक और खेल संबंधी जिम्मेदारियों के बीच अपने लक्ष्य पर पूरा ध्यान बनाए रखते हुए सफलता की नई मिसाल पेश की है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उनकी कहानी बताती है कि खेलों में बड़ी उपलब्धि हासिल करने के लिए प्रतिभा के साथ निरंतर मेहनत, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास भी जरूरी है। एशियाई पैरा खेलों में मोना ने क्वालिफिकेशन दौर में शानदार प्रदर्शन करते हुए 629.1 अंक हासिल किए और शीर्ष स्थान के साथ फाइनल में प्रवेश किया। इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने एशियाई पैरा खेलों का क्वालिफिकेशन रिकॉर्ड भी बनाया। इसके बाद फाइनल में अवनि लेखरा के साथ उनकी आखिरी तक रोमांचक प्रतिस्पर्धा देखने को मिली।

मोना ने 250.0 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया और अपनी मेहनत, लगन तथा हौसले को सुनहरी कामयाबी में बदल दिया। सीकर से शुरू हुआ मोना का सफर अब अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर नई पहचान बना चुका है। पोलियो से प्रभावित होने, अलग-अलग खेलों में खुद को आजमाने और फिर निशानेबाजी में सफलता हासिल करने तक उनकी यात्रा बताती है कि सपनों को पूरा करने के लिए देर से शुरुआत करना कोई बाधा नहीं है। मोना अग्रवाल अब सिर्फ एक स्वर्ण पदक विजेता नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो मुश्किलों के बावजूद अपने लक्ष्य तक पहुंचना चाहते हैं।

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