मुंबई. भारत की महिला क्रिकेट टीम लगातार तीसरे विश्व कप में वही गलती दोहरा रही है— दबाव झेलने में नाकामी। 2017 के वनडे विश्व कप और 2020 के टी20 विश्व कप में टीम खिताब के करीब पहुंचकर फिसली थी, और 2025 के टूर्नामेंट में भी वही कहानी दोहराई जा रही है। इंग्लैंड के खिलाफ चार रन की हार ने भारत का सेमीफाइनल सफर मुश्किल बना दिया है। अब सिर्फ एक जगह बची है, और उस पर चार टीमें दावेदार हैं। हरमनप्रीत कौर और कोच अमोल मजूमदार की अगुवाई में टीम ने कई मौकों पर मजबूत स्थिति हासिल की, लेकिन निर्णायक क्षणों में मैच हाथ से निकल गया। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पर्थ वनडे इसका हालिया उदाहरण है, जहां भारत 35 ओवर तक नियंत्रण में था, लेकिन अचानक सात विकेट खोकर मुकाबला हार गया।

लगातार हार के पीछे एक ही वजह – मानसिक दबाव
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े मुकाबले सिर्फ मानसिक दबाव के कारण गंवाए हैं। मुंबई, पर्थ और दिल्ली में टीम लक्ष्य के करीब पहुंचकर बिखर गई। वानखेड़े टेस्ट में सिर्फ 38 रन बाकी थे, ऋचा घोष 96 पर आउट हुईं, और टीम तीन रन से हार गई। दिल्ली में 413 रन का पीछा करते हुए टीम ने 369 तक पहुंचकर उम्मीद जगाई, लेकिन आखिरी 15 रन पर तीन विकेट गिर गए। इन हारों ने यह साफ कर दिया है कि भारत को सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती की भी जरूरत है। बड़े मौकों पर धैर्य और संयम की कमी टीम को बार-बार नुकसान पहुंचा रही है।

WPL से मिली सीख, पर अभी बाकी है सफर
महिला प्रीमियर लीग (WPL) ने खिलाड़ियों को बड़ी भीड़ और दबाव वाले माहौल में खेलने का अनुभव दिया है। यही वजह है कि क्रांति गौड़ और एन श्री चरणी जैसी नई खिलाड़ी सीधे विश्व कप टीम तक पहुंचीं। गौड़ ने घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन किया, जबकि चरणी अपनी सटीक गेंदबाज़ी से प्रभावित कर रही हैं। WPL के कारण इन खिलाड़ियों को मंच और पहचान मिली, लेकिन अभी भी टीम के सामूहिक प्रदर्शन में स्थिरता की कमी है। टीम को जीत के वक्त ठंडे दिमाग से फैसले लेने की आदत डालनी होगी।
तकनीकी तैयारी से ज़्यादा ज़रूरी है मानसिक मजबूती
बीसीसीआई का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और घरेलू क्रिकेट संरचना अब विश्वस्तरीय है। फिर भी, विश्व कप जैसी परिस्थितियों से निपटने का अनुभव सिर्फ मैदान पर ही आता है। भारत ने 2024 के टी20 विश्व कप से पहले खेल मनोवैज्ञानिक मुघ्दा बवार के साथ सत्र किए थे। हरमनप्रीत कौर ने उस समय स्वीकार किया था कि मानसिक प्रशिक्षण से उन्हें दबाव संभालने में मदद मिली।टीम की युवा खिलाड़ी प्रतिका रावल, जो खुद मनोविज्ञान की छात्रा हैं, ने कहा था कि “जब आप खुद को समझने लगते हैं, तो तनाव कम होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।” इस सोच को पूरी टीम में अपनाने की जरूरत है।
टीम में प्रयोगों से बढ़ा असंतुलन
इंदौर मैच में भारत ने अपने भरोसेमंद संयोजन से हटकर बदलाव किए। टीम ने छह बल्लेबाजों और पांच गेंदबाजों के बजाय संतुलन बिगाड़ दिया। परिणाम यह रहा कि मध्यक्रम संभल नहीं पाया और गेंदबाजी में भी धार की कमी दिखी। न्यूजीलैंड के खिलाफ अगले मैच से पहले टीम संयोजन में फिर फेरबदल कर सकती है। कोचिंग स्टाफ के सामने चुनौती है कि सही समय पर सही खिलाड़ियों पर भरोसा जताएं। दबाव के क्षणों में टीम का संतुलन और रणनीति ही मैच का रुख तय करेगी।
न्यूज़ीलैंड से मुकाबले में ‘फाइनल जैसी’ स्थिति
भारत के लिए राहत की बात यह है कि उसके बाकी सभी मैच, जिसमें सेमीफाइनल भी शामिल हो सकता है, डी.वाई. पाटिल स्टेडियम, नवी मुंबई में होंगे। वहां टीम का रिकॉर्ड बेहतर है। लेकिन अब हर मैच करो या मरो जैसा है। न्यूजीलैंड के खिलाफ जीत नहीं मिली तो भारत का विश्व कप सफर यहीं थम सकता है। टीम के लिए यह सिर्फ एक मुकाबला नहीं, बल्कि मानसिक परीक्षा है। अगर हरमनप्रीत एंड कंपनी इस बार दबाव पर काबू पा गई, तो नवी मुंबई 2025 भारतीय क्रिकेट इतिहास का यादगार मोड़ बन सकता है।

