नई दिल्ली: भारत की स्टार एथलीट शीतल देवी इन दिनों पैरालंपिक खेलों में कमाल कर रही हैं। उन्होंने शुक्रवार को पैरालंपिक खेलों में विश्व रिकॉर्ड तोड़ा, लेकिन फिर एक अंक से किसी और एथलीट ने उनका रिकॉर्ड तोड़ दिया। इस तरह वह पहले राउंड में दूसरे स्थान पर रही थीं और अंतिम-16 में पहुंचने में कामयाब रही थीं। जम्मू-कश्मीर की शीतल ने हांगझोऊ पैरा एशियाई खेलों में दो स्वर्ण और एक रजत जीते थे। शीतल ने गुरुवार को क्वालिफाइंग रैंकिंग राउंड में 720 में से 703 का स्कोर किया। रैंकिंग राउंड का 698 अंकों के साथ पिछला विश्व रिकॉर्ड ग्रेट ब्रिटेन की फोएबे पीटरसन के नाम था, जिसे शीतल ने पीछे छोड़ दिया। हालांकि, तुर्किये की ओजनूर गिर्डी ने 704 अंकों के साथ नया विश्व रिकॉर्ड बनाया और शीर्ष स्थान पर रहकर अंतिम-16 में पहुंचीं। शीतल कुमारी दुनिया की पहली महिला तीरंदाज हैं, जो हाथ नहीं होने के बावजूद तीरंदाजी में कमाल कर रही हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 16 साल की शीतल की मासूमियत झलक रही थी। शीतल ने बताया कि वह बचपन से ही हर काम पैर से करती हैं। बचपन में वह अपने भाई बहनों के साथ फुटबॉल भी खेलती थीं और बाकी खेलों में भी व्यस्त रहती थीं। चंचल स्वभाव की शीतल कभी शांत नहीं बैठती थीं। वह दोस्तों के साथ मिलकर लकड़ी का धनुष बनाती थीं और उसके साथ भी खेलती रहती थीं। लकड़ी का धनुष बहुत हल्का होता था और उसे उठाना भी बेहद आसान होता था।
शीतल अपने दोस्तों के साथ पेड़ पर भी चढ़ जाती थीं। वह सामान्य बच्चों की तरह ही पेड़ पर चढ़ जाती थीं, जबकि बचपन से उनके दोनों हाथ नहीं हैं। उनका गांव पहाड़ी इलाके में है और पेड़ से गिरने पर गंभीर चोट लगने का खतरा रहता है, लेकिन उन्हें खुद पर इतना भरोसा है कि वह आसानी से पेड़ पर चढ़ जाती हैं। शीतल का एक वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें वह पैर से पानी की बोतल को उछालती हैं और एकदम सीधे खड़ी कर देती हैं। वहीं, उनके दोस्त हाथ से उछालने पर भी बोतल को सीधे नहीं खड़ा कर पाते।
शीतल ने हाल ही में पिछले साल एशियाई पैरा खेलों में दो स्वर्ण सहित तीन पदक जीते थे। वह साल 2023 की सर्वश्रेष्ठ एशियाई युवा एथलीट भी चुनी गई हैं। 16 साल की शीतल का निशाना कमाल का है और आने वाले समय में उनसे कई पदकों की उम्मीद है। शीतल ने बताया कि जब उन्होंने तीरंदाजी में अपना करियर बनाने का फैसला किया तो शुरुआत में उन्हें धनुष उठाने में बहुत परेशानी होती थी, क्योंकि इसका वजन काफी ज्यादा होता है। हालांकि, जब उनके कोच को यह पता चला कि शीतल पैर से ही पेड़ पर चढ़ जाती हैं तो उन्हें यकीन हो गया कि यह लड़की कुछ भी कर सकती हैं। कोच ने शीतल को मेहनत करने के लिए प्रेरित किया और अब वह देश के लिए कमाल कर रही हैं।
जन्म से ही दोनों बाजू नहीं होने के चलते पैरों को ही अपने हाथ बनाने वाली शीतल देवी ने जिंदगी की हर कठिनाई को वरदान समझकर अपनाया। बचपन में यह भी कहा गया कि इसके तो दोनों हाथ नहीं हैं, ये कुछ नहीं कर पाएगी, लेकिन उसी शीतल ने अपने जज्बे से दुनिया को अपनी ओर झुका लिया। एक समय वह था जब माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड अकादमी में उनसे धनुष नहीं संभाला जा रहा था। शीतल टूट सी गई थीं। उनके मन में यही था कि, मुझसे नहीं हो पाएगा, लेकिन गुरु कुलदीप वेदवान, अभिलाषा चौधरी के शब्दों उनमें ऐसी प्रेरणा भरी की उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। दोनों ने शीतल से यही कहा कि हिम्मत नहीं हारनी है।
शीतल बताती हैं कि उन्हें बचपन में स्कूल जाना बहुत पसंद था और खेलना भी अच्छा लगता था। उनका पहला सपना टीचर बनना था, लेकिन यह सपना बाद में बदल गया और वह तीरंदाज बन गईं। जब वह तीरंदाजी अकादमी में गईं तो दूसरों का निशाना लगता था और उनका निशाना चूक जाता था। उस दौरान दिमाग में यही चलता रहता था कि मैं कर भी पाऊंगी। तब कोच कुलदीप ने कहा कि तुम कर पाओगी, लेकिन हिम्मत नहीं हारनी है। एनजीओ में काम करने वाली बंगलूरू की प्रीति ने शीतल की बहुत मदद की। उन्होंने उन्हें खेलों की ओर प्रेरित किया और प्रोस्थेटिक भी लगवाए। उस दौरान शीतल को लगा कि अब जिंदगी आसान हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रोस्थेटिक उन्हें भारी लगने लगे और उन्होंने इसे उतारकर रख दिया। लकड़ी का धनुष बनाकर उसे पैरों से चलाती थीं, उन्हें नहीं मालूम था कि बाद में यही खेल उनकी जिंदगी बन जाएगा।
पहले उनके तीर निशाने पर नहीं लगे, लेकिन बाद में जब तीर निशाने पर लगने लगे तो उनमें हौसला आया। उनका आत्मविश्वास राष्ट्रीय चैंपियनशिप में रजत जीतकर बढ़ा। शीतल कहती हैं कि यहां से मुझे लगा कि उन्हें और मेहनत करनी है। उसके बाद तो इतने मेडल आ गए हैं कि उन्हें लगने लगा है कि वह अब स्टार बन गई हैं। शीतल के पिता मान सिंह और मां शक्ति देवी भी कार्यक्रम में मौजूूद थे। शीतल बताती हैं कि उनके मम्मी पापा ने कभी यह नहीं सोचा कि उनकी बेटी कुछ नहीं कर पाएगी। आज वे बहुत खुश हैं। वे उन्हें मेडल जीतकर देखकर खुश होते हैं। लोग कहते थे कि शीतल के दोनों हाथ नहीं हैं ये कुछ नहीं कर पाएगी, लेकिन लोगों को ये नहीं पता है अगर किसी को कुछ समस्या है तो उसमें कुछ कर पाने का भी हौसला होता है। शीतल कहती हैं कि मेरे जैसे बहुत भाई बहन होंगे। अगर वे स्पोट्र्स अपनाएं तो वे भी स्टार बन जाएंगे। बस हिम्मत नहीं हारनी है और मां-बाप का साथ चाहिए।