नई दिल्ली : फीफा वर्ल्ड कप 2026 अब अपने अंतिम और निर्णायक चरण में पहुंच चुका है, जहां हर मैच के साथ रोमांच बढ़ता जा रहा है। इसी बीच रेफरी के फैसले भी चर्चा का विषय बन गए हैं। अर्जेंटीना और मिस्र के बीच खेले गए रोमांचक प्री-क्वार्टर फाइनल मुकाबले के बाद रेफरी चयन को लेकर नया विवाद सामने आया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह विवाद सिर्फ मैदान पर दिए गए फैसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे अर्जेंटीना और इंग्लैंड के बीच 1982 में हुए फॉकलैंड युद्ध का ऐतिहासिक संबंध भी जोड़ा जा रहा है। इस वजह से क्वार्टर फाइनल मुकाबले से पहले माहौल और भी गर्म हो गया है।
यही वजह है कि अगर लियोनेल मेसी की कप्तानी वाली अर्जेंटीना की टीम फाइनल तक पहुंचती है तो इंग्लैंड के रेफरी को उस मुकाबले में नियुक्त नहीं किया जा सकेगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार फीफा बड़े मुकाबलों के लिए रेफरी का चयन कई मानकों के आधार पर करता है, जिसमें निष्पक्षता, अनुभव, प्रदर्शन और टीमों से जुड़े संभावित हितों का ध्यान रखा जाता है। ऐसे में 44 साल पुराने फॉकलैंड युद्ध का इतिहास भी इस मामले में चर्चा का हिस्सा बन गया है। आखिर फीफा रेफरी की नियुक्ति किस प्रक्रिया के तहत करता है और अर्जेंटीना-इंग्लैंड के बीच पुराने विवाद का इससे क्या संबंध है, आइए जानते हैं।
फीफा रेफरी नियुक्ति में किन बातों का रखता है ध्यान?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, फीफा नॉकआउट मुकाबलों के लिए रेफरी की नियुक्ति कई मानकों के आधार पर करता है। इसमें रेफरी का प्रदर्शन, अनुभव, फिटनेस और सबसे अहम तटस्थता (Neutrality) को प्राथमिकता दी जाती है। कोशिश की जाती है कि किसी भी मैच में ऐसा रेफरी नियुक्त न हो, जिसके देश का किसी टीम से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित जुड़ा हो। नॉकआउट चरण में यह प्रक्रिया और भी सख्त हो जाती है। फीफा सिर्फ मौजूदा मुकाबले को ही नहीं, बल्कि पूरे नॉकआउट ब्रैकेट को ध्यान में रखकर रेफरी तय करता है। इसका मतलब है कि यदि किसी रेफरी के देश की टीम आगे चलकर किसी संभावित चरण में खेलने वाली है या किसी अन्य वजह से हितों का टकराव माना जा सकता है तो उसे उस हिस्से के मुकाबलों से दूर रखा जाता है।
अर्जेंटीना की राह बनी इंग्लिश रेफरी के लिए मुश्किल
अगर अर्जेंटीना क्वार्टर फाइनल में स्विट्जरलैंड को हराकर सेमीफाइनल और फिर फाइनल में पहुंचता है तो इंग्लैंड के रेफरी माइकल ओलिवर और एंथनी टेलर को उन मुकाबलों में नियुक्त नहीं किया जाएगा। दिलचस्प यह है कि माइकल ओलिवर इस विश्व कप में अब तक सात मैचों में रेफरी की भूमिका निभा चुके हैं, लेकिन अर्जेंटीना के फाइनल में पहुंचने की स्थिति में उनके लिए 19 जुलाई को न्यू जर्सी के मेटलाइफ स्टेडियम में होने वाले फाइनल में रेफरी बनने का रास्ता लगभग बंद हो जाएगा। इसी तरह यदि इंग्लैंड आगे बढ़ता है तो अर्जेंटीना के रेफरी फाकुंडो टेलो भी इंग्लैंड से जुड़े मुकाबलों में नियुक्त नहीं किए जा सकते।
44 साल पुराना फॉकलैंड युद्ध फिर क्यों आया चर्चा में?
इसकी जड़ें 1982 के फॉकलैंड युद्ध में हैं। दो अप्रैल 1982 को अर्जेंटीना ने दक्षिण अटलांटिक महासागर में स्थित फॉकलैंड द्वीप समूह पर कब्जा करने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया था। ब्रिटेन ने इसका जवाब सैन्य कार्रवाई से दिया और करीब 74 दिन तक युद्ध चला। जून 1982 में अर्जेंटीना के आत्मसमर्पण के साथ युद्ध समाप्त हुआ। इस संघर्ष में 649 अर्जेंटीनी सैनिक, 255 ब्रिटिश सैनिक और फॉकलैंड द्वीप के तीन नागरिकों की जान गई थी। दोनों देशों के बीच इस युद्ध की ऐतिहासिक संवेदनशीलता आज भी बनी हुई है और फीफा रेफरी चयन के दौरान ऐसे भू-राजनीतिक पहलुओं को भी ध्यान में रखता है।
अर्जेंटीना की जीत के बाद रेफरी विवाद ने पकड़ा तूल
अर्जेंटीना ने राउंड ऑफ 16 में मिस्र को 3-2 से हराया, लेकिन मुकाबले के बाद सबसे ज्यादा चर्चा फ्रांस के रेफरी फ्रांस्वा लेटेक्सियर की हुई। मैच में कई फैसलों पर सवाल उठे। मिस्र के कोच होसाम हसन ने रेफरी के कई निर्णयों पर कड़ी आपत्ति जताई। होसाम हसन का आरोप था कि जब उनकी टीम 2-0 से आगे थी, तब VAR समीक्षा के बाद एक गोल रद्द कर दिया गया। अगर गोल रद्द नहीं किया जाता तो स्कोर 3-0 होता। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसके अलावा उन्होंने दावा किया कि मैच के अंतिम क्षणों में पेनल्टी बॉक्स के अंदर हुए एक संभावित फाउल की भी समीक्षा नहीं की गई। होसाम हसन ने मैच शुरू होने से पहले भी लेटेक्सियर की नियुक्ति पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि फ्रांसीसी रेफरी की पृष्ठभूमि को लेकर उन्हें आपत्ति है। मैच के दौरान इस विरोध के कारण उन्हें पीला कार्ड भी दिखाया गया।
फ्रांस-मोरक्को मैच में भी उठे सवाल
विवाद यहीं नहीं थमा। फ्रांस और मोरक्को के बीच खेले गए क्वार्टर फाइनल मुकाबले के लिए अर्जेंटीना के रेफरी फाकुंडो टेलो की अगुआई में पूरी अर्जेंटीनी ऑफिशियल टीम की नियुक्ति किए जाने पर भी सवाल उठे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आलोचकों का मानना था कि इतने बड़े और हाई-प्रोफाइल मुकाबलों में किसी भी तरह के संभावित विवाद या पक्षपात की आशंका से बचने के लिए पूरी तरह निष्पक्ष रेफरी और ऑफिशियल्स की नियुक्ति होनी चाहिए। इसी कारण फीफा के इस फैसले को लेकर फुटबॉल जगत में व्यापक बहस छिड़ गई।
भरोसा ही रेफरी की सबसे बड़ी पहचान
फुटबॉल जैसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में रेफरी का हर फैसला मैच का रुख बदलने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि फीफा रेफरी की तकनीकी योग्यता के साथ-साथ उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार विश्व कप जैसे बड़े मंच पर किसी भी तरह के हितों के टकराव या पक्षपात की आशंका से बचने के लिए संगठन सिर्फ प्रदर्शन ही नहीं, बल्कि देशों के आपसी संबंध, भू-राजनीतिक परिस्थितियों और संभावित नॉकआउट मुकाबलों का भी गहन आकलन करता है। यही वजह है कि 44 वर्ष पुराना फॉकलैंड युद्ध आज भी विश्व कप में रेफरी चयन को लेकर होने वाली चर्चाओं और फैसलों में प्रभाव डालता हुआ नजर आता है।


