शीतल देवी और पैरा तीरंदाजी के कोच कुलदीप वेदवान की प्रेरणादायक सफलता यात्रा

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शीतल देवी दुनिया की पहली और एकमात्र ऐसी महिला पैरा-तीरंदाज हैं जिसके दोनों हाथ नहीं है। लेकिन उसने अपने पैरों से तीरंदाजी करते हुए विश्व स्तर पर ऐसी शानदार उपलब्धियां प्राप्त की, जिससे विश्व तीरंदाजी ने शीतल को 'साल 2025 की सर्वश्रेष्ठ पैरा तीरंदाज' चुना है।

(NST) जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के लोइधार गांव की धरा पर 10 जनवरी, 2007 जन्म लेने वाली 19 साल की शीतल देवी ने अपनी शारीरिक विकलांगता को धत्ता बताते हुए जिस तरह से देश का नाम विश्व पटल पर अपनी श्रेष्ठ तीरंदाजी से सुनहरे अक्षरों में अंकित किया है। उसके बाद हर खेल प्रेमी की जुबान पर ही नहीं देश के हर नागरिक का दिल उन्हें सुपरब, अद्भुत शीतल कह कर धन्यवाद दे रहा है। यह धन्यवाद इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि शीतल देवी दुनिया की पहली और एकमात्र ऐसी महिला पैरा-तीरंदाज हैं जिसके दोनों हाथ नहीं है।

लेकिन उसने अपने पैरों से तीरंदाजी करते हुए विश्व स्तर पर ऐसी शानदार उपलब्धियां प्राप्त की, जिससे विश्व तीरंदाजी एसोसिएशन ने शीतल को ‘साल 2025 की सर्वश्रेष्ठ पैरा तीरंदाज’ चुना है। शीतल की इस उपलब्धि ने न केवल उसे बल्कि उसके प्रदेश जम्मू-कश्मीर और पूरे भारत को गौरवान्वित किया है। इस अद्भुत उपलब्धि पर शीतल ने सोशल मीडिया पर लिखा, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पैरा तीरंदाजों के साथ नामांकन मिलना और अब विश्व तीरंदाजी द्वारा सर्वश्रेष्ठ पैरा तीरंदाज चुना जाना… इस सफर में जो भी मिला, उसके लिए मेरा दिल कृतज्ञता और भावनाओं से भरा हुआ है।

इसके अलावा शीतल को 2023 में ‘वर्ल्ड आर्चरी पैरा वुमन ऑफ द ईयर’ और एशियाई पैरालंपिक समिति की सर्वश्रेष्ठ युवा एथलीट के रूप में भी सम्मान मिल चुका है। साल 2024 में उन्हें साल 2023 के ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। 2025 में ‘बीबीसी इमर्जिंग एथलीट ऑफ द ईयर’ पुरस्कार जीतने वाली पहली भारतीय पैरा तीरंदाज बनी। यह सम्मान उन्हें पेरिस 2024 पैरालंपिक गेम्स में राकेश कुमार के साथ मिश्रित टीम में कांस्य पदक जीतने के बाद मिला।शीतल देवी का जन्म फोकोमेलिया नामक एक दुर्लभ चिकित्सीय कमी के साथ हुआ था, जिससे उनके बिना हाथों का जन्म हुआ था। वो दुनिया की बिना ऊपरी अंगों वाली पहली और एकमात्र महिला अंतरराष्ट्रीय पैरा-तीरंदाज हैं। अपनी इस शारीरिक कमी के बाद भी जिस तरह की जिजीविषा व हिम्मत से शीतल ने हाथों की कमी के बाद भी अपने पैरों को हाथों के रूप में ढालकर धनुष की कमान पर तीर चढ़ाकर सटीक निशानेबाजी से राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार उपलब्धियां प्राप्त की हैं वह हर किसी के लिए प्रेरणा है कि अगर आपके दिल में कुछ करने का जज्बा है तो कितनी भी बड़ी बाधा क्यों ना हो, आप उस बाधा को अपनी हिम्मत से सफलता में बदल सकते हैं।

शीतल देवी की पैरा तीरंदाजी में उनके द्वारा अब तक जो उपलब्धियां प्राप्त की गई हैं वह संख्या में भले ही कम हों, लेकिन इन कम उपलब्धियों को हाथों की बजाय शीतल देवी ने अपने पैरों के साथ प्राप्त की हैं। वो जो तीरंदाज हाथों के सहारे प्राप्त करते हैं उससे कई गुना ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इनकी असाधारण उपलब्धियों में ऐतिहासिक विश्व चैंपियनशिप का खिताब शामिल है। जो उन्होंने पिछले साल दक्षिण कोरिया के ग्वांग्जू में महिला कंपाउंड व्यक्तिगत वर्ग में जीता था। यही नहीं वह विश्व चैंपियनशिप में महिला टीम में रजत पदक और मिश्रित टीम में कांस्य पदक भी जीत चुकी हैं।

शीतल देवी ने अपनी सटीक तीरंदाजी से 2022 एशियाई पैरा खेलों में 2 स्वर्ण और 1 रजत पदक देश के नाम किया। वही 2023 में विश्व चैंपियनशिप में व्यक्तिगत स्पर्धा में रजत पदक व एशियाई चैंपियनशिप में टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक और व्यक्तिगत स्पर्धा में रजत पदक जीता। जीत का यह विजयी रथ उन्होंने 2024 में जारी रखा जब पेरिस 2024 पैरालंपिक गेम्स में राकेश कुमार के साथ मिश्रित टीम में कांस्य पदक जीता। सबसे बड़ी उपलब्धि शीतल ने पिछले साल 2025 में विश्व चैंपियनशिप में प्राप्त जब उसने व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक, युगल में रजत पदक और टीम स्पर्धा में कांस्य पदक सहित 3 पदक देश के नाम करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। शीतल देवी की इसी उपलब्धि ने उसे पिछले साल दुनिया की सर्वश्रेष्ठ पैरा तीरंदाज का उपहार दिलवाया है।

शीतल को आज ‘भारत की बेटी’ और दृढ़-संकल्प के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। शीतल ने 2019 में अपने गृह जिले किश्तवाड़ में एक युवा कार्यक्रम में भाग लिया, यहां शीतल को जब भारतीय सेना की राष्ट्रीय राइफल्स इकाई ने देखा तो सेना ने उनकी शिक्षा का समर्थन किया और उसे चिकित्सा सहायता प्रदान की।

भारतीय सेना द्वारा आयोजित युवा कार्यक्रम में, सेना की प्रशिक्षक अभिलाषा चौधरी और कुलदीप वाधवान ने शीतल देवी के आत्मविश्वास को देखा तब उन्हें प्रशिक्षित करने का फैसला किया। सबसे पहले कोच प्रोस्थेटिक्स में उसकी मदद करना चाहते थे, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि उसके मामले में प्रोस्थेटिक्स संभव नहीं था। लेकिन शीतल ने कोचों को यह कहकर आश्चर्यचकित कर दिया कि उन्हें अपने पैरों का उपयोग करके पेड़ों पर चढ़ने का शौक है और उन्हें इसमें महारत हासिल है।

शीतल से पहले कोचों ने पहले कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति को तीरंदाजी के लिए प्रशिक्षित नहीं किया था जिसके कोई हाथ न हों। हालांकि उन्होंने कुछ शोध किया और मैट स्टुट्जमैन के बारे में सीखा, जो हाथरहित थे और तीरंदाजी के लिए अपने पैरों का इस्तेमाल करते थे। इससे उन्हें आत्मविश्वास मिला। आखिर 11 महीनों के प्रशिक्षण के बाद शीतल देवी ने 2022 के एशियन पैरा गेम्स में महिलाओं के कंपाउंड तीरंदाजी में भाग लिया और भारत के लिए दो स्वर्ण पदक जीते कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। उसने महिलाओं के युगल कंपाउंड में रजत पदक जीतने के बाद मिश्रित युगल और महिलाओं के व्यक्तिगत स्पर्धा में भी दो स्वर्ण पदक प्राप्त किए।

शीतल देवी 2024 के ग्रीष्मकालीन पैरालंपिक में महिलाओं की पैरा तीरंदाजी में प्रतिस्पर्धा करने वाली सबसे कम उम्र की थीं, लेकिन उन्होंने 2024 के ग्रीष्मकालीन पैरालंपिक में राकेश कुमार (पैरालंपिक) के साथ मिश्रित टीम कंपाउंड ओपन में कांस्य पदक जीतकर निराशा को तोड़ दिया। निश्चित रूप से शीतल को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ पैरा तीरंदाज का जो सम्मान मिला है वो आने वाले समय में उसे अपने असाधारण कौशल और बहुमुखी प्रतिभा के बल पर और ज्यादा उपलब्धियां प्राप्त करने के लिए प्रेरित करेगा। आगे और ज्यादा उपलब्धियों के लिए शीतल को सरकार से आर्थिक व ट्रेनिंग के लिए सहायता मिल रही है। शीतल की अभी सेना में नौकरी और अच्छी सैलरी है। उसे शुरुआत से ही सेना से काफी लगाव रहा है। वो राष्ट्रीय राइफल्स में खेल कोटे के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें करीब 50 हजार रुपए महीना वेतन मिलता है।

शीतल सरकार की टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टॉप्स) में शामिल हैं और उन्हें करीब 50 हजार रुपए महीने का अलाउंस मिलता है। पूरे साल होने वाली उनके देश-विदेश में ट्रेनिंग का खर्चा भी खेल मंत्रालय उठाता है। सबसे अच्छी बात यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीतने के बाद शीतल की लोकप्रियता बढ़ी। कई स्पोर्ट्स कंपनियों ने उनके साथ अनुबंध किए। उन्हें स्पॉन्सरशिप भी मिली। शीतल अभी अनुबंध से सालाना करीब 15 लाख रुपए और सालाना 25 लाख कमाती है। इसी आर्थिक सहायता से शीतल ने 2024 में गांव में मिट्टी के बने घर की जगह अपने माता-पिता के लिए नया घर बना लिया है।

दिव्यांग खिलाड़ियों के प्रति समाज को सोच बदलनी होगी : कुलदीप
अगर सही प्रतिभा खोज हो तो भारत ओलंपिक में शीर्ष पर होगा : कोच कुलदीप वेदवान

पौराणिक काल में गुरु द्रोणाचार्य को धनुर्विद्या में श्रेष्ठ एकलव्य से उसका अंगूठा गुरु दक्षिणा में मांगने के लिए याद किया जाता है। परंतु आज के युग में एक ऐसे गुरु हैं, जो अपने दिव्यांग शिष्यों की विशेष क्षमताओं को विकसित कर उन्हें खेलों के विश्व पटल पर श्रेष्ठता के शिखर तक पहुँचाने के लिए भगीरथ प्रयासों के लिए जाने जाते हैं। देश के श्रेष्ठ दिव्यांग तीरंदाजों शीतल देवी, राकेश कुमार, सरिता अधाना, ज्योति बालियान तथा पायल नाग के कोच तथा मार्गदर्शक कुलदीप वेदवान ने अपने शुभ संकल्प, अटूट विश्वास और अथक परिश्रम से अनेक खिलाड़ियों के जीवन की दिशा और दशा बदल दी है। वर्तमान समय के अत्यंत प्रतिभाशाली तथा प्रेरणादायक कोच कुलदीप वेदवान के साथ नेशनल स्पोर्ट्स टाइम्स के विशेष संवाददाता दीपक वर्मा को विस्तृत वार्तालाप करने का अवसर मिला। प्रस्तुत है कोच वेदवान से विशेष बातचीत…

  • सेना की पृष्ठभूमि से आकर पैरा-आर्चरी को चुनना – यह एक पेशेवर कदम था या एक भावनात्मक बुलावा ?
    सेना की नौकरी मैंने सन् 2000 में ज्वाइन की थी। सेना की नौकरी छोड़ने का सबसे बड़ा कारण यह था कि मैं देश को ओलंपिक पदक दिलाना चाहता था। क्योंकि सेना में रहते हुए प्रशिक्षण देना मेरे लिए असंभव था- बच्चों को पूरा समय देना होता है। तो मैंने लगभग 12 साल नौकरी करने के बाद निर्णय लिया कि मुझे सेना छोड़नी होगी, क्योंकि दोनों चीजें एक साथ संभव नहीं थी। फिर मैंने वहां से इस्तीफा दिया और पूरी तरह पेशेवर तरीके से खुद को प्रशिक्षण में समर्पित कर दिया। जो मैंने सोचा था, वही किया- देश को पहला पदक टोक्यो पैरालंपिक में दिलाया, और दूसरा पेरिस पैरालंपिक में भी दिलाया।
  • जब आपने पहली बार किसी ऐसे खिलाड़ी को देखा जिसके हाथ या पैर नहीं थे, उस क्षण आपके मन में कोच के रूप में सबसे बड़ा सवाल क्या था ?
    जब मेरे पास पहली बार एक तीरंदाज का फोन आया: “सर, मेरे हाथ नहीं हैं और मुझे तीरंदाजी सीखनी है,” तो यह मेरे लिए अनूठा अनुभव था। मुझे खुशी हुई कि ऐसे बच्चों को सिखाने का मौका मिलेगा, और मुझे पूरा विश्वास था कि मैं उसे चैंपियन बना दूँगा। फिर शीतल देवी का फोन आया। उसने कहा, “सर, मैं तीरंदाजी करना चाहती हूँ।” पहली ही बातचीत में मैंने उससे कहा, “क्या किसी विज्ञान के शिक्षक ने कभी कहा कि वह तुम्हें वैज्ञानिक बना देगा?” उसने कहा- ‘नहीं, सर।’ तब मैंने कहा, ‘मैं राष्ट्रीय कोच हूँ, अगर तुम मेरे पास आती हो- चाहे तुम्हारे हाथ न हों- तो मैं तुम्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर का पैरालंपिक पदक विजेता बना दूँगा।’ यह मेरा विश्वास है। मुझे अपनी कोशिश पर भरोसा है, और यह भगवान का दिया हुआ है।
  • क्या आपको कभी लगा कि यह काम “संभव” नहीं है? अगर हाँ, तो वह क्षण अपने कैसे पार किया ?
    मैंने कभी भी ‘असंभव’ के बारे में सोचा ही नहीं। सेना से मैंने अनुशासन और यह सीखा है कि असंभव कुछ होता ही नहीं है। यही हथियार और मिसालें देखों, खुद लड़खड़ाए बाहर भी किया। लेकिन एक बात समझ आई कि ताकत हथियारों में नहीं, सोच में होती है। एक गाँव का किसान का बेटा अगर ओलंपिक स्तर तक सोच सकता है, तो वही सच्ची ताकत है। अब्दुल कलाम जी ने भी पहले सोचा, तभी तो वह सफल हुए। अगर आपने ठान लिया, तो सब संभव है। मैंने भी ठाना कि देश को ओलंपिक पदक दिलाना है, और उसी दिशा में काम किया। उतार-चढ़ाव तो आज भी आते हैं, बुरा भी खिलाड़ी कभी नीचे जाएगा, कभी ऊपर, लेकिन मेहनत करती रहनी है तो लक्ष्य ज़रूर बदलेगा।
  • आप ऐसे खिलाड़ियों को प्रशिक्षण करते है जिनके लिए किताबों में कोई तकनीक लिखी ही नहीं है- आप अपनी “प्रशिक्षण भाषा” कैसे विकसित करते है?
    मैंने शुरुआत ज्योति बालियान से की। वह मेरी पहली पैरा तीरंदाज थीं और भारत की भी पहली ऐसी खिलाड़ी बनीं, जिन्होंने एशिया कप, पैरालंपिक और विश्व चैंपियनशिप में पदक जीते। उनके पास 22-23 राष्ट्रीय स्वर्ण पदक और कई अंतरराष्ट्रीय पदक हैं। उसके बाद राकेश, शीतल, पायल, अक्षय, सरिता – ऐसे कई खिलाड़ी जुड़ते चले गए। हर खिलाड़ी के अनुसार मेरे दिमाग में उसकी तकनीक और उपकरण अपने आप तैयार हो जाते हैं। जैसे शीतल के दोनों हाथ नहीं थे, तो उसका उपकरण मैं स्वयं खुद बनाया। फिर पायल आई- एक ऐसी बच्ची, जिसके न हाथ हैं, न पैर। उसे देखकर ही मेरे दिमाग में उसकी तीरंदाजी का पूरा खाका बन गया। शुरुआत में वह बहुत घबरायी हुई थी, लेकिन जब उसने कुश्ती को अलग-अलग तरीकों से तीर चलाते देखा, तो उसे भरोसा हुआ। उसने मुझसे पूछा, “सर, मैं कैसे तीर चलाऊँगी?” मैंने कहा, “जब मैं तुम्हें यहाँ लेकर आया हूँ, तो तुम्हें तीर चलवाऊँगा भी।” मैंने उसके लिए उपकरण बनाया, लेकिन उसे मंजूरी नहीं मिल रही थी। तब मैंने विश्व तीरंदाजी संघ और भारतीय तीरंदाजी संघ को लिखा कि वह दुनिया की पहली ऐसी खिलाड़ी है, और उसके लिए बनाए गए उपकरण को मंजूरी दी जाए। आखिरकार मंजूरी मिली। वह आज मुख्य एशियाई खेलों में खेली, और अब आगे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए तैयारी कर रही है। हाल ही में दो साल की एक बच्ची भी हमारे पास आई है, जिसके दोनों हाथ नहीं हैं- उसने भी तीरंदाजी शुरू कर दी है। तो मेरे लिए यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जैसे ही मैं किसी बच्चे को देखता हूँ, उसकी क्षमता के अनुसार तकनीक और उपकरण अपने आप तैयार हो जाते हैं- और मैं उन्हें खुद ही बनता हूँ
  • आपके खिलाड़ी शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी बड़ी लड़ाई लड़ते हैं । एक कोच के रूप में आप उनका ‘डर’ कैसे तोड़ते हैं?
    मैंने 2008 में अपने गाँव धनौरा टिकरी (बागपत) में वेदवान आर्चरी अकादमी से प्रशिक्षण शुरू किया। वहीं से मेरे लगभग 60-70 बच्चे भारतीय सेना में जा चुके हैं- जो… 12-12 साल की उम्र में मेरे पास आए थे। मैं दिव्यांग और सामान्य दोनों खिलाड़ियों को एक ही नजर से देखता हूँ। मैं कभी तुलना नहीं करता, बल्कि दिव्यांग खिलाड़ियों से कहता हूँ कि आप किसी से कम नहीं, बल्कि आगे हैं। उनके अंदर दया या बेचारगी की भावना आने ही नहीं देता। मेरे प्रशिक्षण का सिद्धांत साफ़ है – जो आप प्रतियोगिता में करते हो, वही शुरुआत से अभ्यास में करो। क्योंकि अक्सर बच्चा अभ्यास में अलग और प्रतियोगिता में अलग हो जाता है। इसलिए हम शुरुआत से ही प्रतियोगिता जैसा माहौल बनाते हैं – पूरा अनुशासन, पूरा ध्यान, बिना किसी बनावट के। अभ्यास बीच में 10-15 मिनट का विश्राम होता है, जिसमें बच्चे या तो पढ़ते हैं या सुनते हैं। मैंने उनके उपकरणों में सकारात्मक बदलावों का एक अनुप्रयोग करवाया है, जिससे हर हफ्ते उन्हें नई किताब सुनने को मिलती है। इस तरह उनका मानसिक और खेल-दोनों स्तर पर विकास होता है। और जब वे प्रतियोगिता में जाते हैं, तो उन्हें कुछ भी नया नहीं लगता- इसलिए डर भी नहीं लगता।
  • क्या कभी ऐसा हुआ कि आपने किसी एथलीट को तकनीक नहीं, सिर्फ विश्वास सिखाया हो – और वही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया?
    बिल्कुल, मैं आपको राकेश का उदाहरण देता हूँ। जब मैंने उसे पहली बार देखा, तो वह अपने गाँव में घर के सामने सड़क पर बैठा था। मैं उनके पास गया और उसकी कहानी सुनी। उसने बताया कि पहाड़ से गिरने के बाद वह दिव्यांग हो गया। डिप्रेशन में था, अकेला था, लेकिन उसे खुद भरोसा नहीं था। वह कहना चाहता था कि तीन बार आत्महत्या की कोशिश कर चुका था। उसने कहा, ‘मुझे अपने माता-पिता की लाठी बनना था, लेकिन आज मैं ही लाठी बन गया हूँ।’ उस वक्त मैंने केवल इतना उससे कहा, ‘मैं श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड में कोच हूँ। अगर तुम मेरे पास आते हो, तो एक दिन अर्जुन पुरस्कार विजेता और पैरालंपिक पदक विजेता बन सकते हो।’ आज उसके पास सब कुछ है- क्योंकि उसने विश्वास किया। इसी तरह 2018 में मैं जम्मू-कश्मीर के पहाड़ों में एक दृष्टिबाधित बच्चे – पायल को ढूँढने गया। कई गाँवों में घूमते हुए उसके घर पहुँचा। वह आना नहीं चाहती थी, तो मैंने उसे भरोसा दिलाया- ‘रहना, खाना, पढ़ाई- सब मैं देखूँगा।’ उस समय हमारे पास कोई सुविधा नहीं थी। मैंने इस बच्ची का खर्च अपनी जेब से उठाया। कई बार उन्हें ढूँढकर लाना पड़ता है- वे अपने आप नहीं आते। यही हमारी सबसे बड़ी कमी है – प्रतिभा खोज। अगर सही तरीके से प्रतिभा खोज हो जाए, तो देश के ओलंपिक पदक 50 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं।
  • शीतल देवी जैसी खिलाड़ी के साथ काम करते हुए आपको सबसे बड़ी “सीख” क्या मिली, एक कोच के रूप में?
    जब शीतल देवी हमारे पास आई, तो वह भी पायल की तरह बहुत घबराई हुई थी। उन्होंने मैदान में बाकी बच्चों को देखा और कहा, ‘सर, मैं तीर कैसे चलाऊँगी?’ क्योंकि उनके जैसा कोई बच्चा वहाँ था ही नहीं। हमने उनके लिए विशेष अभ्यास तैयार किए – पैरों में वजन बाँधकर चलने और संतुलन पर काम किया। धीरे-धीरे उन्होंने अपना उपकरण बनाया। जब उन्होंने पहली बार तीर चलाया, वही खुशी थी जो बाद में पेरिस पैरालंपिक में पदक जीतते समय उनके चेहरे पर दिखी। शुरुआत में उन्हें खुद पर भरोसा नहीं था, लेकिन वही पल उनके जीवन का मोड़ बन गया। आज शीतल किसी परिचय की मोहताज नहीं है। अगर भारत में तीरंदाजी को घर-घर तक पहुँचाने वाली कोई खिलाड़ी है, तो वह शीतल देवी है। पेरिस में मुझसे जर्मनी से आए लोग मिले। उन्होंने कहा कि वे खास तौर पर शीतल का मुकाबला देखने आए हैं। उस समय मुझे महसूस हुआ कि आज दुनिया हमारे खिलाड़ियों को देख रही है। पायल को देखकर भी बहुत खुशी होती है। हमने दुनिया को एक ऐसा तीरंदाज दिया है, जो पायल की तरह बिना हाथ, न पैर, फिर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल रही है। उसने ही 2025 में जयपुर में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पायल ने शीतल को हराकर भी स्वर्ण पदक जीते। शीतल ने दो रजत और ज्योति से दो कांस्य पदक जीते – और ये तीनों ही मेरी शिष्याएँ हैं। एक कोच के लिए इससे बड़ा सुखद पल क्या हो सकता है?
  • जब कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीतता है, उस पल आपको ज़्यादा खुशी किस बात की होती है- मेडल या उसकी यात्रा?
    सर, जब कोई बच्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतता है, तो उसकी पूरी यात्रा आँखों के सामने आ जाती है। सबसे बड़ी खुशी यही होती है कि मेरे देश का झंडा ऊपर जा रहा है। साथ ही एक भावना यह भी होती है कि एक किसान का बेटा होकर जो सपना देखा था, वह आज सच हो रहा है। मैं थोड़ा भावुक हूँ- उस पल मेरी आँखों से आँसू निकल आते हैं।
  • भारत में दिव्यांग तीरंदाजी का ढांचा अभी भी सीमित है। सबसे बड़ी कमी आपको कहाँ दिखती है- इन्फ्रास्ट्रक्चर, कोचिंग या मानसिकता?
    भारत में देश तीरंदाजी का ढांचा अभी सीमित है। सबसे बड़ी कमी तीन स्तरों पर है – बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षण और मानसिकता। हमें ढांचों को विकसित करना होगा, विशेष प्रशिक्षण केंद्र बनाने होंगे और सुविधाएँ पूरी तरह व्हीलचेयर अनुकूल करनी होंगी। साथ ही, दिव्यांग खिलाड़ियों के प्रति समाज की सोच बदलनी होगी और जागरूकता बढ़ानी होगी। मैं एक सुझाव देना चाहूँगा- हर जिले में ‘प्रतिभा खोज टीम’ बनाई जाए, जिसमें कोच, फिजियो और मनोवैज्ञानिक जैसे विशेषज्ञ हों। यह टीम हर स्कूल में जाकर बच्चों की क्षमता पहचाने और उन्हें सही खेल दिशा दे। अगर यह व्यवस्था लागू हो जाए, तो अगले 10-15 सालों में भारत ओलंपिक पदक तालिका में शीर्ष देशों में शामिल हो सकता है। आज हमारे यहाँ प्रतिभा खोज की कमी है। बच्चे बिना सही मार्गदर्शन के किसी भी खेल में चले जाते हैं, जबकि असली शुरुआत जमीनी स्तर- स्कूल, अकादमी और विश्वविद्यालय से होती है। अगर हम शुरुआत में ही सही प्रतिभा पहचान लें, तो परिणाम बेहतर होंगे। हम खुद को युवा देश कहते हैं, लेकिन ओलंपिक पदकों में वह दिखाई नहीं देता। अमेरिका, चीन और जापान इसलिए आगे हैं क्योंकि उन्होंने स्कूल स्तर पर ही मजबूत ढांचा तैयार किया है। अगर हम भी जमीनी स्तर पर सही निवेश और योजना के साथ काम करें, तो भविष्य के ओलंपिक तैयार करना मुश्किल नहीं है।
  • क्या कभी आपको व्यवस्था से अपने खिलाड़ियों के लिए संघर्ष करना पड़ा?
    मैं अपनी बात व्यवस्था के सामने हमेशा स्पष्ट तरीके से रखता हूँ। जो भी जरूरत होती है, साफ़ तौर पर बताता हूँ- और सच कहूँ तो मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई। मैंने हमेशा परिणाम दिए हैं, इसलिए मुझे हर स्तर पर सहयोग भी मिला है। मैं तीरंदाजी संघ, भारतीय खेल प्राधिकरण और खेल मंत्रालय सभी का आभार व्यक्त करता हूँ। उन्होंने मेरे खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने में हमेशा काम किया है। श्राइन बोर्ड का विशेष योगदान है। एक धार्मिक ट्रस्ट होते हुए भी उन्होंने खेल के लिए जो प्रोत्साहन दिया है, वह अद्भुत है। यहाँ का स्टेडियम देश के बेहतरीन स्टेडियमों में से एक है, और तीरंदाजी के वर्तमान परिणामों में उसका बड़ा योगदान है। मैं माता रानी और श्राइन बोर्ड के सभी ट्रस्टियों का भी आभारी हूँ। आज देश में उत्कृष्टता केंद्र और स्टेडियम लगातार विकसित हो रहे हैं। हाल ही में 18 कोच प्रशिक्षण के लिए नियुक्त किए गए – यह बच्चों को तैयार बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। घरेलू स्तर पर भी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर जैसे मुकाबले हो रहे हैं।
  • कोच के तौर पर आपका कोई ऐसा सपना है जो अभी तक पूरा नहीं हुआ?
    मेरा लक्ष्य साफ़ है कि मैं देश को अधिकतम संख्या में ओलंपिक पदक दिलाऊँ। एक पदक से मुझे कोई विशेष खुशी नहीं होती। क्योंकि वह सिर्फ मेरा नहीं होता- वह पूरे देश का पदक होता है, मेरे खिलाड़ियों का होता है, श्राइन बोर्ड का होता है, भारतीय खेल प्राधिकरण का होता है और तीरंदाजी संघ का होता है। मेरा मानना है कि मैं इतने खिलाड़ी तैयार करूँ कि जब ओलंपिक में तीरंदाजी की टीम जाए, तो उसमें अधिक से अधिक मेरे खिलाड़ी हों। अगर मेरा लक्ष्य 10 खिलाड़ी भारत से जाते हैं, तो उनमें कम से कम 4-5 मेरे खिलाड़ी हों। कोच के मन में यही होता है कि उसका खिलाड़ी आगे बढ़े। अगर मैं आपको बताऊँ- टोक्यो पैरालंपिक में 5 खिलाड़ी गए थे, जिसमें से 2 मेरे थे। उसके बाद 6 खिलाड़ी गए, तो उनमें से 3 मेरे थे। अगर एशियन गेम्स की बात करें, तो लगभग 12-13 खिलाड़ी गए थे, जिनमें से 8 मेरे खिलाड़ी थे। उन खिलाड़ियों ने मिलकर कई पदक जीते- शीतल ने 2 स्वर्ण और 1 रजत, राकेश ने 1 स्वर्ण और 2 रजत, और ज्योति ने भी पदक जीते। तो कुल मिलाकर, भारत के जो पदक थे, उनमें से लगभग आधे मेरे खिलाड़ियों के थे। लेकिन अंत में वे सब देश के ही खिलाड़ी हैं- यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। मेरा लक्ष्य बस यही है कि मैं देश को अधिक से अधिक पदक दिलाऊँ।

आत्मा राम भाटी (खेल समीक्षक), दीपक शर्मा (विशेष संवाददाता)

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