नई दिल्ली : निकिता टोप्पो न सिर्फ मिडफील्ड में अपने शानदार खेल के लिए जानी जाती हैं, बल्कि अपने शुरुआती करियर में आई गंभीर चोट और कठिन हालातों से उबरने के लिए भी सराही जाती हैं। अमेरिकी शिक्षाविद जेमी एस्केलांते का एक प्रसिद्ध विचार है कि जिंदगी इस बात पर नहीं टिकी होती कि आप कितनी बार गिरते हैं, बल्कि इस पर कि आप कितनी बार उठकर फिर खड़े होते हैं। 6 जुलाई 2003 को ओडिशा के सुंदरगढ़ स्थित राजगांगपुर के कुकुडा गांव में जन्मीं निकिता टोप्पो इस सोच का एक सजीव उदाहरण हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, निकिता ने माता-पिता (आशा टोप्पो और थियोफिल टोप्पो) को तब खो दिया था जब वह सिर्फ पांच साल की थीं। उनका पालन-पोषण उनके बड़े पापा (ताऊ) जोसेफ टोप्पो और बड़ी मम्मी (ताई) मंजू टोप्पो ने किया। चार साल पहले जब वह आयरलैंड में होने वाले U-23 फाइव नेशंस कप में हिस्सा लेने जा रही थीं, तभी एक सड़क हादसे में उनके बड़े भाइयों में से एक की मौत हो गई। विदेश में होने के कारण वह बड़े भाई बिराज के अंतिम संस्कार में भी नहीं शामिल हो पाईं थीं। इसके एक साल बाद उन्हें एक ऐसी गंभीर चोट लगी जिससे उनका खेल करियर ही खतरे में पड़ गया था।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कुछ ही समय बाद उनके दूसरे बड़े भाई सरोज भी एक सड़क हादसे का शिकार हो गए। सरोज के सिर में गंभीर चोट आई और वह अब तक पूरी तरह से ठीक नहीं हुए हैं। उनकी याददाश्त नहीं लौटी है। हालांकि, लगातार मिली असफलताओं से हार मानने के बजाय निकिता ने हॉकी में ही अपना सुकून पाया। आज निकिता टोप्पो भारतीय महिला हॉकी टीम में जगह बनाने के लिए लगातार मेहनत कर रही हैं, लेकिन आर्थिक तंगी उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। भाई के इलाज से लेकर अपनी डाइट और ट्रेनिंग तक की जरूरतें पूरी करना उनके लिए आसान नहीं है। इसके बावजूद वह देश के लिए खेलने के अपने सपने को जिंदा रखे हुए हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2025 में निकिता टोप्पो ने अपनी अगुआई में जयपुर में हुए खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (केआईआईटी) को महिला हॉकी का गोल्ड मेडल दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। निकिता ने अप्रैल 2025 में खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में ओडिशा की जीत में अहम भूमिका निभाई। इससे सीनियर भारतीय महिला टीम में जगह बनाने की उनकी उम्मीदें और बढ़ गई हैं। चूंकि बड़े भाई सरोज बीमार हैं और वह कुछ नहीं कर पाते। खुद का और अपने बड़े भाई की जिम्मेदारी भी निकिता पर ही है। निकिता के पास अपना कोई घर भी नहीं है। वह और उनका भाई कभी बड़े पापा (ताऊ जी) या अपनी बुआ के घर में रहते हैं।
मुंबई में हॉकी टूर्नामेंट में हिस्सा लेने गईं निकिता टोप्पो ने दूरभाष पर जनसत्ता को बताया कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि पैसों की तंगी उनके सपने को न तोड़ दे। एक एथलीट को अच्छी डाइट की भी जरूरत होती है, लेकिन यहां भी आर्थिक तंगी आड़े आती है। वह हेल्दी डाइट नहीं ले पाती हैं। इससे उनके खेल पर असर पड़ रहा है। निकिता टोप्पो को यदि जल्द ही नौकरी नहीं मिली तो देश एक प्रतिभावान मिड-फील्डर और पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ को खो सकता है।
हॉकी में कैसे हुई शुरुआत? क्या परिवार में भी कोई खिलाड़ी था?
निकिता टोप्पो: घर-परिवार में तो कोई भी हॉकी नहीं खेलता था। मैंने अपने गांव में दीदी लोगों को हॉकी खेलते हुए देखती थी। जब वे विश्व कप वगैरह खेलकर गांव लौटीं तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। रास्ते भर उनका स्वागत हुआ। बहुत ज्यादा भीड़ थी। मैं भी उस भीड़ में शामिल हो गई। तब मैं बहुत छोटी थी। मेरी आंखों में वही दृश्य बैठ गया और मैंने भी हॉकी खेलने की सोची।
इसके बाद स्कूल में हॉकी खेलने शुरू किया। शुरुआत में जो स्किल वगैरह सीखी। मेरी रनिंग वगैरह बहुत अच्छी थी। मेरे कोच ने यह बात नोटिस की। हालांकि, मैं नियमित रूप से हॉकी नहीं खेल पा रही थी। कोच ने यह देखा तो उन्होंने घर आकर बड़े पापा से बात की। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि लड़की खेलने में बहुत अच्छी है। इसको कंटीन्यू कराओ। बड़े पापा को भी लगा कि उनकी बेटी में प्रतिभा है और उसके बाद मैं नियमित हॉकी खेलने लगी।
टीम इंडिया में चयन के लिए कहां कर रहीं हैं मेहनत?
निकिता टोप्पो: अभी तो फिलहाल मैंने ओडिशा में जो सीनियर नेशनल और नेशनल गेम्स वगैरह हो रहे हैं, उसमें कम बैक किया है, लेकिन इंडिया टीम में भी कम बैक करना है। उसके लिए अभी तैयारी चल रही है। सरकारी नौकरी के लिए कोशिश करने के सवाल पर निकिता ने बताया कि कई जगह प्रयास किया है, लेकिन अब तक कहीं से कोई बुलावा नहीं आया है। अन्य कोई दिक्कत होने के सवाल पर निकिता ने बताया, सीनियर नेशनल और नेशनल गेम्स के लिए हम लोगों की जो राज्य की टीम बनती है, वही मुख्य रूप से टूर्नामेंट होते हैं और वहीं पर चयनकर्ता आते हैं टीम चुनने के लिए। वहीं की परफॉर्मेंस देखकर चयनकर्ता टीम चुनते हैं।


