सिर्फ 12 गज की दूरी, फिर भी सबसे कठिन शॉट! पेनल्टी पर क्यों चूक जाते हैं दिग्गज?

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नई दिल्ली : स्टेडियम में हजारों दर्शकों का शोर एक पल के लिए थम जाता है। गेंद पेनल्टी स्पॉट पर रखी है। एक ओर क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे विश्वस्तरीय स्ट्राइकर खड़े हैं, तो दूसरी ओर गोलपोस्ट के नीचे गोलकीपर पूरी तैयारी के साथ मौजूद है। दोनों के बीच सिर्फ 12 गज की दूरी होती है। देखने में यह आसान मौका लगता है, क्योंकि 24 फीट चौड़े और 8 फीट ऊंचे गोलपोस्ट के सामने केवल एक गोलकीपर होता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लेकिन यही वह क्षण है, जब दबाव, मानसिक संतुलन और सटीक निशाना सबसे बड़ी परीक्षा बन जाते हैं, और कई बार दुनिया के महानतम फुटबॉलर भी पेनल्टी किक पर चूक जाते हैं।

आखिर पेनल्टी पर क्यों चूक जाते हैं दिग्गज खिलाड़ी?

पेनल्टी किक केवल किस्मत का खेल नहीं, बल्कि रणनीति, कौशल और मानसिक मजबूती की भी परीक्षा होती है। नॉर्वे के खेल शोधकर्ता गीर योरडेट ने वर्षों तक पेनल्टी शूटआउट का अध्ययन किया और अपनी पुस्तक ‘प्रेशर: लेसन्स फ्रॉम द साइकोलॉजी ऑफ द पेनल्टी शूटआउट’ में इसके महत्वपूर्ण निष्कर्ष बताए हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यदि खिलाड़ी गेंद दाईं ओर मारता है तो गोल होने की संभावना लगभग 71 प्रतिशत रहती है। बाईं ओर शॉट लगाने पर भी सफलता की संभावना लगभग इतनी ही होती है। हालांकि, सबसे अधिक सफलता तब मिलती है जब गेंद सीधे गोलपोस्ट के बीच में मारी जाए। ऐसी स्थिति में गोल होने की संभावना लगभग 78 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, क्योंकि कई बार गोलकीपर पहले ही किसी एक दिशा में छलांग लगा देता है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कारण सीधा है। ज्यादातर गोलकीपर गेंद मारे जाने से पहले ही दाईं या बाईं ओर छलांग लगाने का फैसला कर लेते हैं। अगर खिलाड़ी आखिरी क्षण तक उन्हें भ्रम में रखे और गेंद बीच में मार दे, तो गोलकीपर के पास बचाव का मौका ही नहीं बचता। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हालांकि, कहानी इतनी आसान भी नहीं है। अगर गोलकीपर अपनी जगह पर ही खड़ा रह जाए तो बीच में मारी गई गेंद आसानी से उसके हाथों में आ सकती है। तब वही खिलाड़ी, जिसकी तारीफ हो सकती थी, आलोचना का शिकार बन जाता है।

रोनाल्डो की रणनीति ने खींचा सबका ध्यान

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार विश्व कप के एक नॉकआउट मुकाबले में पुर्तगाल पीछे चल रहा था। रोनाल्डो पेनल्टी लेने पहुंचे। उन्होंने दौड़ शुरू की, लेकिन गेंद मारने से ठीक पहले हल्का-सा रुक गए। गोलकीपर उनकी चाल में फंस गया और दाईं ओर कूद पड़ा। अगले ही पल रोनाल्डो ने गेंद सीधे बीच में भेज दी। गोल… और पुर्तगाल की उम्मीदें फिर से जिंदा हो गईं। यह सिर्फ एक गोल नहीं था, बल्कि दबाव के बीच लिया गया ऐसा फैसला था, जिसने मैच का रुख बदल दिया।

मोहम्मद सालाह ने भी पेनल्टी पर उठाया बड़ा जोखिम

मिस्र के स्टार मोहम्मद सालाह ने भी एक बड़े मुकाबले में ‘पनेंका’ शॉट खेला। इस तकनीक में खिलाड़ी गेंद को हल्के से चिप करके गोल के बीचोंबीच भेजता है। अगर गोलकीपर अपनी जगह खड़ा रह जाए तो खिलाड़ी मजाक का पात्र बन जाता है, लेकिन अगर गोलकीपर छलांग लगा दे तो शॉट शानदार दिखता है। मोहम्मद सालाह सफल रहे और उनकी बहादुरी की तारीफ हुई, लेकिन यही शॉट असफल होता तो शायद लोग उसे गैर-जिम्मेदार फैसला बताते।

हालांकि हर खिलाड़ी इतना भाग्यशाली नहीं होता। कई महान फुटबॉलर पेनल्टी चूकने के कारण हमेशा के लिए याद किए जाते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इटली के रॉबर्टो बाज्जियो इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उनके जैसे खिलाड़ियों के लिए एक चूकी हुई पेनल्टी पूरी जिंदगी का बोझ बन जाती है। महान खिलाड़ी भी क्यों चूक जाते हैं? यही फुटबॉल का सबसे बड़ा रहस्य है। रॉबर्टो बाज्जियो, लियोनल मेसी, हैरीकेन, मार्कस रैशफोर्ड, स्टीवन जेरार्ड… सूची लंबी है।

इन सभी ने अपने करियर में अहम पेनल्टी मिस की हैं। आखिर क्यों? दरअसल, पेनल्टी सिर्फ तकनीक का नहीं, दिमाग का खेल है। जब खिलाड़ी गेंद रखने जाता है, तब उसके दिमाग में सिर्फ गोल करने का विचार नहीं चलता। वह कई बारे में सोच रहा होता है। मसलन- अगर मैं चूक गया तो? देश क्या कहेगा? सोशल मीडिया पर क्या होगा? क्या लोग मुझे हमेशा इसी गलती के लिए याद रखेंगे?

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यही डर उसके पैरों तक पहुंच जाता है, इसलिए ‘जोर से मार देता’… कहना आसान है, लेकिन करना उतना ही मुश्किल। 1996 यूरो कप के सेमीफाइनल में इंग्लैंड के गैरेथ साउथगेट जर्मनी के खिलाफ पेनल्टी चूक गए थे। मैच के बाद उनकी मां ने पूछा था, ‘‘इतना सोचने की क्या जरूरत थी? जोर से मार देते।’’ यही बात हर मैच के बाद करोड़ों दर्शक भी कहते हैं, लेकिन मैदान पर खड़ा खिलाड़ी जानता है कि यह सिर्फ गेंद को मारने का मामला नहीं है। वह उस पल अपने देश की उम्मीदों, करोड़ों प्रशंसकों और अपने पूरे करियर का भार उठा रहा होता है।

आत्मविश्वास के बावजूद क्यों चूक जाते हैं खिलाड़ी?

लिवरपूल और हंगरी के कप्तान डोमिनिक सोबोस्लाई का मानना है कि पेनल्टी में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं होती। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आरबी लाइपजिग के लिए खेलते समय पीएसजी के खिलाफ मैच में नेमार ने उनसे पूछा था, ‘‘गोल करोगे?’’ सोबोस्लाई का जवाब था, ‘‘हां, मैं कभी पेनल्टी नहीं चूकता।’’ उन्होंने गोल भी किया, लेकिन हर खिलाड़ी ऐसा नहीं कर पाता। कई बार आत्मविश्वास भी दबाव के आगे टूट जाता है।

जब मानसिक दबाव बिगाड़ देता है पूरा खेल

यूरो 2020 के फाइनल में इंग्लैंड के मार्कस रैशफोर्ड इटली के खिलाफ पेनल्टी किक पर गोल करने से चूक गए थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय उनके मन में बार-बार सिर्फ एक ही बात चल रही थी—‘गलती नहीं करनी है।’ हर हाल में सब कुछ बिल्कुल सही करने की यही सोच उनके प्रदर्शन पर भारी पड़ गई। खेल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब खिलाड़ी ‘गोल करना है’ की सकारात्मक सोच छोड़कर ‘गलती नहीं करनी’ की मानसिकता में आ जाता है, तो उसका आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। यही वजह है कि पेनल्टी किक को फुटबॉल की सबसे कठिन मानसिक परीक्षा माना जाता है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पेनल्टी किक देखने में भले ही बेहद आसान लगती हो। गेंद एक तय जगह पर रखी होती है और सामने सिर्फ एक गोलकीपर होता है, लेकिन वास्तविक चुनौती शारीरिक से कहीं ज्यादा मानसिक होती है। उस पल खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंद्वी से कम और अपने मन में चल रहे दबाव, उम्मीदों और डर से ज्यादा जूझ रहा होता है। यही कारण है कि महान फुटबॉलर योहान क्रॉयफ ने कहा था, “पेनल्टी इतनी आसान दिखती है कि वही उसे सबसे मुश्किल बना देती है।” इसलिए अगली बार जब कोई कहे, “अरे, बस जोर से मार देता!”, तो यह याद रखना चाहिए कि फुटबॉल के सबसे महान खिलाड़ी भी कई बार सिर्फ 12 गज की इस दूरी को पार करने में सफल नहीं हो पाते।

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