नई दिल्ली : ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के पहले पांच दिनों में भारत ने 10 पदक जीतकर शानदार शुरुआत की है। इनमें भारतीय बेटियों का योगदान सबसे अहम रहा है, जिन्होंने स्कॉटलैंड की धरती पर तिरंगे का मान बढ़ाया। इन सफलताओं के पीछे कई खिलाड़ियों के संघर्ष की ऐसी कहानियां हैं, जो हर किसी को प्रेरित करती हैं। ऐसी ही एक मिसाल हैं शर्मीला धनकड़, जिन्होंने तमाम मुश्किलों को पीछे छोड़ते हुए पैरा एथलेटिक्स में भारत के लिए इतिहास रच दिया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 40 वर्षीय शर्मीला धनकड़ ने राष्ट्रमंडल खेल 2026 की महिला गोला फेंक (F57) स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर अपने नाम एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की। यह जीत केवल एक गोल्ड मेडल नहीं, बल्कि उनके वर्षों के संघर्ष, धैर्य और अटूट हौसले की कहानी भी बयां करती है।
आज इस स्वर्ग जैसी जिंदगी में नजर आ रहीं शर्मीला का जीवन 14 साल पहले किसी नर्क से कम नहीं था। उनके पहले पति ने उन पर इस कदर यातनाएं की थीं कि उन्हें बिना कपड़ों के सड़क पर बेटियों के साथ फेंक दिया था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ग्लासगो में सोमवार रात गोल्ड मेडल जीतने के बाद शर्मीला ने और अपनी 14 साल पहले की दर्द भरी कहानी को भी सबके सामने बताया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वहीं SAI द्वारा आयोजित प्रेस ब्रीफिंग में सवालों का भी जवाब दिया और यह भी बताया कि दूसरे पति अजीत सिंह का उनकी जिंदगी में बेहद खास रोल रहा।
शर्मीला धनकड़ ने अपनी जिंदगी के सबसे कठिन दौर को याद करते हुए बताया कि 2012 में उनके नशे की लत से ग्रस्त पति ने रेवाड़ी के गुरकावास गांव में उन्हें दो बेटियों के साथ घर से निकाल दिया था। उस समय आसपास के लोगों ने उनकी मदद की और उन्हें कंबल व रजाई ओढ़ाकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। इसके बाद उनके माता-पिता जय लाल और सरोज उन्हें अपने पैतृक गांव छिथरौली (महेंद्रगढ़) ले गए, जहां से उन्होंने अपनी जिंदगी की नई शुरुआत की।
उस दर्दनाक घटना के 14 साल बाद शर्मीला ने ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में महिला गोला फेंक (F57) स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद उन्होंने अपनी मां और दूसरे पति अजीत सिंह को मंच पर बुलाकर जीत का जश्न साझा किया। उनके संघर्ष और सफलता की यह कहानी आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।
शर्मीला धनकड़ ने बयां किया संघर्षों से भरा जीवन
शर्मीला 2 साल की उम्र में ही एक पैर में पोलियो से पीड़ित हो गई थीं। उन्होंने गोल्ड मेडल जीतने के बाद अपनी आपबीती को बताया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा,”मेरे को नंगी करके मेरी बेटियों के साथ सड़क पर फेंक दिया था मेरे पहले हस्बैंड (पति) ने। मेरे पड़ोसियों ने मुझे कंबल से लपेटा और फिर मेरे माता-पिता मुझे वहां से ले गए। मेरी 19 साल की उम्र में शादी कर दी गई थी। वह ड्रग्स लेता था और उसका आदि था। जब मेरी दूसरी बेटी पैदा हुई थी तब से चीजें खराब हो गई थीं।”
वहीं शर्मीला की माता सरोज भी बचपन से नेत्रहीन हैं। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में बेटी की सफलता के बाद कहा, ”मेरी बेटी कक्षा 1 से कक्षा 10 तक टॉपर रही है। लेकिन हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तो हमने उसकी शादी कर दी। जब यह हुआ (पहले पति की बर्बरता) तो मैंने अपने पति से कहा कि उसे वापस ले आओ। यह गोल्ड मेडल शर्मीला के जज्बे का नतीजा है।”
जिसने थामा हाथ, उसी ने संघर्षों को जीत में बदला
शर्मीला धनकड़ की जिंदगी में एक ही रिश्ते ने दो बिल्कुल अलग अनुभव दिए। जहां पहले पति के साथ उनका जीवन कठिनाइयों और अपमान से भरा रहा, वहीं दूसरे पति अजीत सिंह ने हर कदम पर उनका साथ देकर नई उम्मीद दी। पहले विवाह से अलग होने के बाद 2018 में शर्मीला ने अजीत सिंह से दूसरी शादी की। अजीत पेशे से प्लंबर और पंप टेक्नीशियन थे, लेकिन उन्होंने हमेशा शर्मीला के सपनों को प्राथमिकता दी और हर मुश्किल दौर में उनका हौसला बढ़ाया।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसी वर्ष हरियाणा रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान शर्मीला को तीन महीने के अनुबंध पर महिला बस कंडक्टर के रूप में काम करने का अवसर मिला। परिवार की जिम्मेदारियों के साथ नौकरी और खेल—दोनों को संतुलित करते हुए उन्होंने अपने संघर्ष को कभी अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया। यही जज्बा आगे चलकर उन्हें राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक तक ले गया।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार शर्मीला ने SAI द्वारा आयोजित प्रेस ब्रीफिंग में सवाल पर जवाब देते हुए अपने जीवन में दूसरे पति का क्या योगदान रहा उस पर कहा,”अजीत ने मुझे खेल में आगे बढ़ाने और उनकी जीवन को संवारने में अपना सबकुछ लगा दिया। एक तरफ पहले पति ने जीवन को नर्क बनाया था तो दूसरी तरफ अजीत ने बेटियों को संभाला, शर्मीला को आगे ले जाने में हर संभव प्रयास किया और अपना काम तक छोड़ दिया।” वहीं भारत की गोल्ड मेडलिस्ट बेटी ने सभी महिलाओं के लिए खास संदेश भी दिया। उन्होंने कहा,”इस गोल्ड मेडल को जीतने के बाद मैं हर बेटी और महिला को मैसेज देना चाहूंगा कि हमको प्रताड़ना से लड़ना चाहिए और आवाज उठानी चाहिए।” साथ ही अगले कॉमनवेल्थ गेम्स तक उन्होंने अपनी बेटियों को भी तैयार करने और खेल के क्षेत्र में आगे ले जाने की बात कही।
पिता के जाने का गम, फिर भी नहीं टूटी हिम्मत
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों का यह स्वर्ण पदक शर्मीला धनकड़ के करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय खिताब है। इससे पहले वह बर्मिंघम पैरा कॉमनवेल्थ गेम्स और हांगझोउ पैरा एशियाई खेलों में चौथे स्थान पर रहकर पदक से मामूली अंतर से चूक गई थीं। इस उपलब्धि से एक साल पहले ही उन्होंने अपने पिता को खो दिया था, जिससे यह सफलता उनके लिए और भी भावुक पल बन गई। फिलहाल शर्मीला रेवाड़ी में किराए के मकान में रहती हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस स्वर्ण पदक के बाद स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) और हरियाणा सरकार के सहयोग से वह अपना खुद का घर खरीदने का सपना भी पूरा कर सकेंगी। उनके लिए यह गोल्ड मेडल केवल खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि संघर्षों के बाद नई जिंदगी की शुरुआत का प्रतीक भी है।


