नई दिल्ली : बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान के पिता मंसूर अली खान पटौदी और दादा इफ्तिखार अली खान पटौदी भारतीय क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ियों में शुमार रहे हैं। पटौदी परिवार की दोनों पीढ़ियों ने भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी की। वहीं, ‘सीनियर पटौदी’ यानी इफ्तिखार अली खान पटौदी ने इंग्लैंड के लिए भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला था। भारत की आजादी से कुछ समय पहले 1946 में भारतीय टीम ने इंग्लैंड का दौरा किया था और इस दौरे पर टीम की कप्तानी इफ्तिखार अली खान पटौदी को सौंपी गई थी। खास बात यह थी कि वह इससे पहले 1932-33 में इंग्लैंड की ओर से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चर्चित बॉडीलाइन सीरीज में भी खेल चुके थे।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 1946 में भारत के इंग्लैंड दौरे से पहले इफ्तिखार अली खान पटौदी लंबे समय से क्रिकेट से दूर हो चुके थे। इसके बावजूद उन्हें टीम की कप्तानी सौंपी गई, जबकि विजय मर्चेंट को उपकप्तान बनाया गया था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अगर कप्तानी का फैसला सिर्फ क्रिकेट कौशल के आधार पर लिया जाता तो विजय मर्चेंट इसके सबसे मजबूत दावेदार होते। माना जाता है कि 1971 में ‘जूनियर पटौदी’ यानी मंसूर अली खान पटौदी को कप्तानी से हटाए जाने के बाद इस पुराने घटनाक्रम का असर फिर देखने को मिला। उस दौर में कप्तानी में बदलाव को लेकर भारतीय टीम के भीतर मनमुटाव की स्थिति बनी और अजीत वाडेकर को भी विरोध का सामना करना पड़ा। हालांकि, वाडेकर की कप्तानी में भारत ने पहली बार वेस्टइंडीज और इंग्लैंड की धरती पर टेस्ट सीरीज जीती।
टाइगर पटौदी की कप्तानी पर भारी पड़ी ‘बॉम्बे लॉबी’
स्पिनरों के बीच अजीत वाडेकर को लेकर नाराजगी थी। ईरापल्ली प्रसन्ना और बिशन सिंह बेदी जैसे गेंदबाजों का मानना था कि वाडेकर कप्तानी के लायक नहीं थे। बेदी और प्रसन्ना जैसे स्पिनरों को ‘टाइगर पटौदी’ ने तैयार किया था। दोनों उनका बहुत सम्मान करते थे। भारतीय टीम के कई लोगों को लगता था कि ‘टाइगर पटौदी’ को कप्तानी से हटाने के पीछे बॉम्बे लॉबी थी। कई लोगों को लगा कि विजय मर्चेंट ने पटौदी परिवार से 1946 में कप्तान न बनने बदला लिया। ‘जूनियर पटौदी’ का फॉर्म खराब हुआ और मर्चेंट ने उन्हें टीम से बाहर करवा दिया।
नेहरू के समर्थन ने दिलाई ‘सीनियर पटौदी’ को कप्तानी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार विजय मर्चेंट ने बदले की भावना से मंसूर अली खान पटौदी को टीम से बाहर किया। हालांकि, जूनियर पटौदी मानते थे कि बदले की भावना से उन्हें कप्तानी से हटाया गया। 2004 में टाइगर ने बताया था कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘सीनियर पटौदी’ को भारत की कप्तानी सौंपने पर जोर दिया था। भारत आजादी के करीब था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नेहरू का मानना था कि किसी मुस्लिम को कप्तान बनाने से भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि बनेगी, जिसकी कल्पना उन्होंने की थी। सीनियर पटौदी बल्लेबाजी में बुरी तरह फेल रहे। मर्चेंट जैसे खिलाड़ी उनकी कप्तानी में खेलने से नाखुश थे।
विजय मर्चेंट ने ऐसे लिया पुराना बदला
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बहुत से लोगों का मानना था कि 1967 में जब विजय मर्चेंट चयन समिति के अध्यक्ष बने तो उन्होंने बदला लेने की शुरुआत की। पहली बार इसके संकेत तब मिले जब न्यूजीलैंड की टीम भारत के दौरे पर आई थी। यह दौरा डुनेडिन में भारत की ऐतिहासिक जीत के बाद हुआ था, जो विदेशी धरती पर भारत की पहली जीत थी। इस जीत में प्रसन्ना ने अहम भूमिका निभाई थी। टाइगर ने पहली बार स्पिन को भारत का मुख्य हथियार बनाने की अपनी थ्योरी को सफलतापूर्वक आजमाया था।
विजय मर्चेंट से क्यों नाखुश थे पटौदी?
बेदी और प्रसन्ना की जोड़ी इस रणनीति का मुख्य हिस्सा थी। इस शानदार प्रदर्शन के बाद भी न्यूजीलैंड के खिलाफ भारतीय टीम में मर्चेंट ने बदलाव करना शुरू कर दिया, जिससे पटौदी नाखुश थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पटौदी ने बताया,’मैंने उनसे कहा कि टीम में कोई छेड़छाड़ न करें क्योंकि मैंने बहुत मेहनत से एक ऐसी टीम बनाई थी जिसे खुद पर भरोसा था। हमने अभी-अभी विदेशी धरती पर एक ऐतिहासिक सीरीज जीती थी, लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं मानी। लोग कहते हैं कि वह एक बेहतरीन बल्लेबाज और समझदार कप्तान थे। मुझे वह एक जिद्दी इंसान लगे, जिन्हें मनमानी करना पसंद था। वह समझदारी भरी सलाहों को अनसुना कर देते थे।’
पसंद के खिलाड़ी को काफी तवज्जो देते थे मर्चेंट
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पटौदी ने बताया कि मर्चेंट अपने पसंद के खिलाड़ी को काफी तवज्जो देते थे। उन्होंने नेट्स में एक गेंदबाज को दिखाते हुए कहा, ‘मिल गया, मिल गया, अमर सिंह।’ अमर सिंह एक महान तेज गेंदबाज थे, जिन्होंने 1932 में इंग्लैंड के पहले दौरे पर भारत के लिए खेला था। हालांकि,मर्चेंट जिस गेंदबाज को लाए थे, वह न तो बहुत तेज गेंदबाजी करता था और न ही उसका एक्शन सही था। ऐसा लगता था कि वह ‘चकिंग’ (हाथ न घुमाने) करता है।
मर्चेंट ने छिपाई पटौदी की अनुपलब्धता की खबर
यह देखते हुए पटौदी को कोई हैरानी नहीं हुई जब मर्चेंट ने 1971 के वेस्टइंडीज दौरे के लिए उन्हें कप्तान पद से हटाने के पक्ष में वोट दिया। पटौदी ने चयन से काफी पहले ही खुद को इस दौरे के लिए अनुपलब्ध बता दिया था। इसे मर्चेंट ने दुनिया से छिपाए रखा। कई लोगों को लगा कि यह फैसला भारतीय क्रिकेट में लोकतांत्रिक बदलाव को दिखाता है, क्योंकि एक आम आदमी ने भारतीय कप्तान के तौर पर एक नवाब की जगह ली थी।
वेस्टइंडीज दौरे के लिए विवादित चयन
वेस्टइंडीज जाने वाली टीम में विवादित चयन हुए थे, लेकिन टीम की सफलता के कारण बात नहीं हुई। मर्चेंट ने हैदराबाद से पांच खिलाड़ियों सैयद आबिद अली, एमएल जयसिम्हा, केनिया जयंतीलाल, डी. गोविंदराज और विकेटकीपर पोचियाह कृष्णमूर्ति को चुना। जयसिम्हा का समय गुजर चुका थ और मीडियम पेसर गोविंदराज ने कभी कोई टेस्ट नहीं खेला। जयंतीलाल ने एक टेस्ट खेला और कृष्णमूर्ति ने चारों टेस्ट खेले, लेकिन उस दौरे के बाद दोनों को कभी नहीं चुना गया।
मर्चेंट ने पक्षपाती न दिखने के लिए क्या किया
मर्चेंट ने पक्षपाती न दिखने के लिए पटौदी की घरेलू टीम से पांच खिलाड़ियों को चुनके साउथ जोन के चयनकर्ता सीडी गोपीनाथ को खुश करने की पूरी कोशिश की। हालांकि, गोपीनाथ ने चयन समिति की बैठक में पटौदी को हटाने के मर्चेंट के फैसले का समर्थन नहीं किया। पटौदी ने यह वाकया बताया तो उनमें कड़वाहट नहीं दिखी,लेकिन उन्हें लगता था कि मर्चेंट पक्षपाती थे।
विवादों से घिरा इंग्लैंड दौरा
टाइगर एक बहुत लोकप्रिय कप्तान थे, खासकर स्पिनरों के बीच। पटौदी के समर्थकों में पनप रहे असंतोष और भारत के खराब प्रदर्शन के अलावा 1974 का इंग्लैंड दौरा अन्य विवादों में भी घिरा रहा। भारतीय टीम लंदन में भारतीय राजदूत द्वारा आयोजित स्वागत समारोह में कुछ घंटे देरी से पहुंची। इसे भारतीय वाणिज्य दूतावास ने अपमान माना और टीम को सबके सामने फटकार लगाई गई।
बेदी और प्रसन्ना ने इंग्लैंड दौरे को दाग माना
इंग्लैंड दौरे पर भारतीय टीम बुरी तरह हारी। बेदी और प्रसन्ना इसे अपने क्रिकेट करियर पर एक दाग मानते थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एक टेस्ट मैच के दौरान बीबीसी रेडियो ब्रॉडकास्टर और कमेंटेटर ब्रायन जॉनस्टन ने कहा था, ‘मैंने कप्तान वाडेकर को अपने स्पिनरों, बेदी और प्रसन्ना के साथ बातचीत करते नहीं देखा। अगर वे बातचीत कर रहे हैं तो यह टेलीपैथी के जरिए ही हो रहा होगा।’ इससे कप्तान और उनके मुख्य गेंदबाजों के बीच बिगड़े रिश्तों का पता चलता था।
टाइगर पटौदी के हाथों में आई कप्तानी
इंग्लैंड दौरे पर भारतीय टीम के खराब प्रदर्शन और प्रशंसकों व प्रेस के भारी विरोध के चलते अजीत वाडेकर को समय से पहले ही टीम से बाहर होना पड़ा। 1971 में भारतीय टीम से बाहर किए गए टाइगर पटौदी ने इसके बाद दोबारा टीम में वापसी की और उन्हें कप्तानी की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भारत और विश्व क्रिकेट से जुड़ी ऐसी ही दिलचस्प और अनसुनी कहानियों के लिए जनसत्ता के खेलनामा से जुड़े रहें। कहानी के अगले हिस्से में जानेंगे कि मंसूर अली खान पटौदी को ‘टाइगर’ नाम कैसे मिला और इसके पीछे क्या खास किस्सा है।


