नई दिल्ली : फिल्म अभिनेता सैफ अली खान के दादा इफ्तिखार अली खान पटौदी ने भारत और इंग्लैंड, दोनों के लिए क्रिकेट खेला था। वहीं, इफ्तिखार के बेटे मंसूर अली खान पटौदी और उनके साथी क्रिकेटर विजय मर्चेंट से जुड़ी कप्तानी की एक दिलचस्प कहानी भी सामने आई थी। अब इस अंक में जानेंगे कि मंसूर अली खान पटौदी कैसे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण करने के महज एक साल बाद ही भारतीय टीम के कप्तान बन गए और उनके नाम के साथ ‘टाइगर’ का उपनाम कैसे जुड़ा।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ‘टाइगर’ पटौदी ने महज 20 साल की उम्र में 1961 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया था। बतौर क्रिकेटर वह तेजी से अपनी पहचान बनाने लगे और अगले ही साल 1962 में वेस्टइंडीज दौरे के लिए उन्हें भारतीय टीम का उप-कप्तान चुना गया। इसी दौरे के दौरान एक दर्दनाक हादसे ने परिस्थितियां बदल दीं और आगे चलकर पटौदी के कप्तान बनने का रास्ता खुला। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नियमित कप्तान नारी कॉन्ट्रैक्टर बारबाडोस में एक मैच के दौरान तेज बाउंसर की चपेट में आ गए थे। गेंद उनके सिर पर लगी, जिसके बाद उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल ले जाना पड़ा। आपातकालीन सर्जरी के जरिए उनकी जान बचाई गई और उनके बच जाने को किसी चमत्कार से कम नहीं माना गया। हालांकि, इस चोट के बाद नारी कॉन्ट्रैक्टर दोबारा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेल सके और उन्हें भारत वापस भेज दिया गया।
महज 21 साल में कप्तान बन गए थे ‘टाइगर’ पटौदी
नारी कॉन्ट्रैक्टर की जगह ‘टाइगर पटौदी’ को कप्तानी मिली। उस समय ‘टाइगर पटौदी’ सिर्फ 21 साल के थे। उन्होंने लगभग एक दशक तक भारत की कमान संभाली। इस दौरान टीम ने कई ऐसी उपलब्धियां हासिल कीं, जो पहले नहीं हुईं थीं। इसमें 1968 में न्यूजीलैंड के खिलाफ विदेश में पहली जीत भी शामिल है।
मंसूर अली खान पटौदी का बल्लेबाजी रिकॉर्ड खास नहीं है, लेकिन बतौर कप्तान वह काफी सफल रहे। मंसूर अली खान पटौदी ने अपने टेस्ट करियर में 84 पारियों में 34.91 के औसत से 2793 रन बनाए। इसमें केवल 6 शतक शामिल हैं। हालांकि, उन्हें महान बनाता है उनका नेतृत्व कौशल। अपने नेतृत्व कौशल की बदौलत उन्होंने अलग-अलग इलाकों के खिलाड़ियों के एकजुट करके टीम बनाई।
‘टाइगर’ पटौदी के नामकरण की दिलचस्प कहानी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार माना जाता है कि मंसूर अली खान पटौदी को ‘टाइगर’ नाम उनकी शानदार फील्डिंग की वजह से मिला, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने अपने 11वें जन्मदिन पर एक ‘टाइगर’ का शिकार किया था। उस दिन उनके पिता की मौत हो गई थी। उनके नाना ने घर पर हुई दुखद घटना से ध्यान हटाने के लिए शिकार का इंतजाम किया था।
कप्तान बनने से पहले पहले दो टेस्ट नहीं खेल पाए थे पटौदी
‘टाइगर’ पटौदी का करियर उनकी पर्सनैलिटी की तरह ही जबरदस्त है। कम बोलने वाले इंसान होने के बावजूद वह ध्यान आकर्षित कर लेते थे। नारी कॉन्ट्रैक्टर ने प्रदीप मैगजीन को 1962 के वेस्टइंडीज दौरे की ‘टाइगर’ से जुड़ी एक घटना के बारे में बताया था। पटौदी पहले दो टेस्ट नहीं खेले। उन्होंने जांघ में खिंचाव के कारण खुद को अनफिट बताया।
‘टाइगर’ ने क्यों बनाया था चोट का बहाना?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सच यह था कि पटौदी वेस्टइंडीज के खतरनाक तेज गेंदबाजों का सामना करने से बहुत डरे हुए थे, जिसमें वेस हॉल भी शामिल थे। पहले टेस्ट के दौरान उन्होंने जो देखा, उससे उनका शक यकीन में बदल गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नारी कॉन्ट्रैक्टर ने उस शाम को याद करते हुए बताया, ‘टाइगर का कुछ दोस्त पीछा कर रहे थे। मैंने कभी किसी आदमी को इतनी तेजी से भागते नहीं देखा। वह पकड़े जाने से बचने के लिए एक पेड़ पर भी चढ़ गए। सोचिए जो आदमी खिंचाव के कारण टेस्ट मैच से बाहर था, वह पेड़ पर चढ़ गया। मुझे पता था कि वह चोट का बहाना बना रहे थे, क्योंकि वह वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाजों का सामना करने से बहुत डर हुए थे।’
कॉन्ट्रैक्टर की नाराजगी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नारी कॉन्ट्रैक्टर को लग था कि पटौदी के बैकग्राउंड की वजह से उस दौरे पर सीनियर खिलाड़ियों की मौजूदगी के बावजूद उन्हें उपकप्तान बनाया गया था। पटौदी यह बात जानते थे। कॉन्ट्रैक्टर इस बात से भी नाराज थे कि जानलेवा चोट से ठीक होने के बाद भी उन्हें भारत के लिए खेलने का दूसरा मौका नहीं मिला।
‘टाइगर’ की कप्तानी से खिलाड़ियों को नहीं थी परेशानी
कॉन्ट्रैक्टर के पास ‘टाइगर’ को नापसंद करने के अपने कारण हो सकते हैं, लेकिन शायद ही किसी खिलाड़ी ने अपने युवा साथी को कप्तान बनाने पर कोई नाराजगी या विरोध दिखाया। इनमें से कुछ बहुत सीनियर क्रिकेटर थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पटौदी का मानना था कि उन्हें उस दौरे पर टीम के हर सदस्य से पूरा सपोर्ट और सहयोग मिला। इसमें विजय मांजरेकर, चंदू बोर्डे और पॉली उमरीगर जैसे खिलाड़ी शामिल थे। इनमें से हर खिलाड़ी कप्तानी के लायक था।
कप्तानी से दूर रहना चाहते थे पॉली उमरीगर
पॉली उमरीगर ने उस दौरे पर भारतीय टीम की ओर से शानदार बल्लेबाजी की थी और उन्हें भारतीय क्रिकेट के सबसे बेहतरीन बल्लेबाजों में गिना जाता है। युवा मंसूर अली खान पटौदी उन्हें एक बेहद चतुर रणनीतिकार मानते थे और उनकी सलाह को काफी महत्व देते थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पटौदी के मुताबिक, उमरीगर सलाहकार के तौर पर अपनी भूमिका से बेहद खुश थे, क्योंकि इसमें किसी तरह की सीधी जिम्मेदारी नहीं थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पटौदी ने कहा था, “उमरीगर एक सलाहकार के तौर पर अपनी भूमिका से बहुत खुश थे, जिसमें कोई जिम्मेदारी शामिल नहीं थी। मुझे शक है कि वह कप्तानी करना और खुद पर फैसले लेने का बोझ डालना पसंद करते।” भारत और विश्व क्रिकेट से जुड़ी ऐसी ही रोचक कहानियों के लिए जनसत्ता के खेलनामा से जुड़े रहें। अगली कड़ी में जानेंगे कि सलीम दुर्रानी ने ऐसा क्या कहा था, जिससे ‘टाइगर’ पटौदी गुस्सा हो गए थे।


