नई दिल्ली : बंगाल के बल्लेबाज सुदीप घरामी ने रणजी ट्रॉफी में अपने बल्ले से धूम मचा रखी है। पिछले सीजन में आंध्र के खिलाफ 299 रन और जम्मू-कश्मीर के खिलाफ 146 रन बनाने के बाद उन्होंने अब दिल्ली के खिलाफ नाबाद 122 रन की शानदार पारी खेली है। रणजी ट्रॉफी में उनकी पिछली 3 पारियों का कुल स्कोर 567 रन रहा है। इसके अलावा, दलीप ट्रॉफी के क्वार्टर फाइनल में भी घरामी ने 146 रन की पारी खेलकर अपनी बल्लेबाजी का दम दिखाया था। ये आंकड़े बड़े-बड़े क्रिकेटरों को संतुष्ट कर सकते हैं, लेकिन सुदीप घरामी की महत्वाकांक्षाएं इससे कहीं आगे हैं। वह लगातार बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपने खेल को नई ऊंचाइयों तक ले जाना चाहते हैं।
राजमिस्त्री के बेटे घरामी ने अपने लिए इतना ऊंचा स्तर तय किया है कि सिर्फ तीन मैचों में खराब फॉर्म का छोटा सा दौर भी उन्हें खुद को साबित करने की जरूरत का एहसास दिलाने के लिए काफी था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कल्याणी ने कहा, ‘मैंने ऑफ-सीजन में बहुत मेहनत की। मैंने सोचा था कि सीजन की शुरुआत दिलीप ट्रॉफी के पहले मैच में शतक के साथ करूंगा। मैंने ऐसा किया भी, लेकिन उसके बाद चीजें ठीक नहीं रहीं।’
लोगों की बातों को पीछे छोड़ रणजी ट्रॉफी में चमके सुदीप घरामी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार घरामी ने कहा, ‘इस मैच से पहले मेरे दिमाग में बस एक ही बात चल रही थी कि मुझे पहली ही पारी में खुद को साबित करना है। मुझे सबको दिखाना था कि मैं किसी से कम नहीं हूं।’ घरामी के लिए अपनी काबिलियत साबित करने की चाहत कोई नई बात नहीं है। घरामी ने लगभग दो दशक उन लोगों को जवाब देने में बिताए हैं जिन्हें उन पर शक था। यह सिलसिला तब से चल रहा है जब लोग उनके पिता से कहते थे कि उनका बेटा कभी प्रोफेशनल क्रिकेटर नहीं बन पाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें टैलेंट की कमी थी, बल्कि इसलिए क्योंकि उनके पास जरूरी साधन नहीं थे।
बल्ला खरीदने के पैसे नहीं थे, लेकिन क्रिकेटर बनने का जुनून था
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार घरामी कहते हैं, ‘मेरे पिता राजमिस्त्री का काम करते थे। जब मैंने क्रिकेट खेलना शुरू किया तो हमारे पास बैट और क्रिकेट का दूसरा सामान खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। मेरे लिए किट खरीदने के लिए मेरे पिता को अपने दोस्तों से उधार लेना पड़ता था। उस समय लोग उनसे कहते थे, ‘क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? राजमिस्त्री का बेटा क्रिकेटर कैसे बनेगा? बेटे पर फालतू पैसे खर्च कर रहे हो। उसे बस थोड़ी पढ़ाई-लिखाई करवा दो ताकि उसे कोई रेगुलर नौकरी मिल सके और गुजारा चल सके।’ हर ताने के साथ सुशांत घरामी का संकल्प और मजबूत होता गया।
पिता ने नहीं छोड़ी जिद, बेटे ने रणजी ट्रॉफी में बल्ले से मचाई धूम
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सुदीप घरामी ने कहा, ‘उस समय हमारे पास पक्का घर भी नहीं था। हम कच्चे घर में रहते थे। जब मैंने अंडर-19 लेवल पर खेलना शुरू किया, तब जाकर मैंने अपने परिवार के लिए ईंट-पत्थर का पक्का घर खरीदा। आप समझ सकते हैं कि यह कितना मुश्किल था। सबने मेरे पिता को मना किया, लेकिन वे मुझे क्रिकेटर बनाने पर अड़े हुए थे। उन्हें बस यही धुन सवार थी। असल में उन्हें भी क्रिकेट का बहुत शौक था, लेकिन पैसों की तंगी के कारण वे खुद इस खेल को आगे नहीं बढ़ पाए। वे चाहते थे कि उनका बेटा वह करे जो वे नहीं कर पाए। वे मुझे रोज सुबह-सुबह एकेडमी ले जाते थे और मेरे प्रैक्टिस खत्म होने तक वहीं इंतजार करते थे। फिर शाम को हम दोनों घर के पीछे वाले मैदान में जाते थे, जहां मेरे पिता मुझे बॉलिंग करते थे। रात में मैं घर पर उनकी देखरेख में शैडो ड्रिल करता था। उन्होंने मुझे क्रिकेटर बनाने के लिए अपना सब कुछ लगा दिया।’
पिछले रणजी सीजन में बंगाल के लिए सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज बने
सुदीप घरामी ने पिछले रणजी ट्रॉफी सीजन में 53.77 के औसत से 797 रन बनाए, जो बंगाल के लिए सबसे ज्यादा और कुल मिलाकर चौथे सबसे ज्यादा रन थे। फिर भी उन्होंने अपनी कमियों को खोजने और उन्हें सुधारने का काम जारी रखा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, ‘मुझे कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, जैसे कि मेरा बैट लिफ्ट बाहर की तरफ जा रहा था। ऑफ-सीजन के दौरान, मैंने खास तौर पर अपनी ग्रिप, स्टांस और बैट लिफ्ट पर काम किया। चूंकि मैं अभी बीसीसीआई के ‘टारगेटेड प्लेयर्स ग्रुप’ का हिस्सा हूं, इसलिए मुझे ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ में कोचों के साथ काम करने का मौका मिला। दलीप ट्रॉफी से पहले, मैंने बैंगलोर में एक कैंप में लगभग दो हफ्ते बिताए, जिससे मेरी बैटिंग बेहतर हुई।’
बल्लेबाजी निखारने में सरफराज खान की सलाह बनी मददगार
भले ही ईरानी कप में सुदीप घरामी का प्रदर्शन उनकी उम्मीदों के मुताबिक न रहा हो। उन्होंने 8 और 33 रन बनाए हों, लेकिन वह इसे सीखने का एक अच्छा मौका मानते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, ‘मुझे सरफराज (खान) भाई से बात करने का मौका मिला। उन्होंने मुझे एक आसान सी सलाह दी, ‘हर दिन अच्छी शुरुआत नहीं मिलेगी, लेकिन जिस दिन मिलेगी, उस दिन लंबी पारी खेलनी है।’ यह बहुत काम की सलाह थी। आज मेरा सामना दिल्ली के बहुत मजबूत पेस अटैक से था, लेकिन मैंने ठान लिया था कि एक बार क्रीज पर जमने के बाद, मैं बड़ी पारी खेलूंगा।’
शानदार फॉर्म, क्या अब मिलेगी टीम इंडिया में जगह?
दलीप और ईरानी ट्रॉफी में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद रणजी में एक और शानदार सीजन घरामी के लिए नए रास्ते खोल सकता है, ऐसे रास्ते जो उन्हें भारतीय टीम के ड्रेसिंग रूम तक ले जा सकते हैं। 27 साल के घरामी को यह बात पता है, लेकिन उनका पूरा ध्यान बंगाल के लिए मुश्किल समय में काम आने वाले खिलाड़ी (क्राइसिस मैन) की भूमिका निभाने पर है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, ‘मेरा लक्ष्य हर मैच पर ध्यान देना है। जब भी मेरी टीम को मेरी जरूरत हो, मैं आगे आकर अच्छा प्रदर्शन करना चाहता हूं। कई सालों तक अनुस्तूप मजूमदार बंगाल के लिए मुश्किल समय में काम आने वाले खिलाड़ी रहे हैं। जब भी टीम मुश्किल में होती थी, अनुस्तूप दा आगे आते थे। मैंने उनसे मुश्किल हालात को संभालने के बारे में बहुत कुछ सीखा है।’
सचिन तेंदुलकर को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं
घरामी पिछले सीजन में व्हाइट-बॉल टूर्नामेंट में बंगाल के लिए लगातार खेलते रहे और विजय हजारे ट्रॉफी में उन्होंने कुछ अर्धशतक भी लगाए। हालांकि, रेड लेदर बॉल (लाल गेंद) के प्रति उनका लगाव बेजोड़ है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, ‘सचिन तेंदुलकर हमेशा से मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने जिस तरह की पारियां खेलीं, वे कमाल की थीं। इसके अलावा मेरे बचपन के कोच देबेश चक्रवर्ती सुनील गावस्कर के बहुत बड़े प्रशंसक हैं और उन्होंने बहुत कम उम्र में ही मेरे मन में यह बात बैठा दी थी कि रेड-बॉल क्रिकेट ही असली क्रिकेट है।’


