नई दिल्ली : पैरा एशियाई खेल 2026 के पहले ही दिन भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए देश का मान बढ़ाया। दिन का पहला स्वर्ण पदक निशानेबाज मोना अग्रवाल ने जीता, जबकि दूसरा स्वर्ण लंबी कूद के खिलाड़ी निषाद कुमार ने टी-45 वर्ग में अपने नाम किया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भारतीय खिलाड़ियों ने पहले दिन अब तक दो स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पदक जीतकर प्रतियोगिता में दमदार शुरुआत की। खिलाड़ियों के इस प्रदर्शन ने भारतीय दल के उत्साह को बढ़ाया और आगे की स्पर्धाओं के लिए पदक की उम्मीदें भी मजबूत कीं।
निषाद कुमार ने लंबी कूद की इस स्पर्धा में 7.11 मीटर के बेस्ट अटेम्प्ट के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार खास बात यह है कि निषाद आमतौर पर हाई जम्प (ऊंची कूद) में प्रतिभाग करते हैं। उन्होंने पैरा ओलंपिक में इस स्पर्धा में दो मेडल भी जीते हैं। वहीं अब लॉन्ग जम्प में निषाद कुमार ने इतिहास रचा और भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता।
एक हाथ गंवाने के बाद भी नहीं मानी हार, कौन हैं निषाद कुमार?
निषाद कुमार के बारे में अगर जानें तो उनका जन्म 3 अक्टूबर 1999 को हुआ था। वह हिमाचल प्रदेश के रहने वाले हैं। उन्होंने भारत के लिए ऊंची कूद (हाई जम्प) में भी हिस्सा लेते हुए दो पैरा ओलंपिक के मेडल जीते हैं। वह पहले T47 कैटेगरी में प्रतिभाग करते थे। इसमें वह एथलीट हिस्सा लेते हैं जिनके हाथ और पैर में कोई दिक्कत रहती है। उन्होंने टोक्यो और पैरिस पैरालम्पिक में दो मेडल जीते थे।
निषाद का जन्म हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित बदाउं गांव में हुआ था। वह एक किसान परिवार से जुड़े हुए थे। उनके पिता एक मिस्त्री थे जो ईंटों का काम करते थे। इसके अलावा वह किसानी भी करते थे। निषाद को उन्होंने आगे बढ़ाने में उनकी पढ़ाई के लिए कड़ी मेहनत की। निषाद ने डीएवी कॉलेज, हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी और फिर लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई की। फिर एक दर्दनाक हादसे के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और खुद को खेल की दुनिया में आगे बढ़ाया।
घास काटने वाली मशीन में कैसे गंवाया निषाद कुमार ने अपना एक हाथ?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, निषाद कुमार के जीवन से जुड़ी ऐसी घटना के बारे में जानते हैं जिसके बाद उन्होंने अपना दायां हाथ गंवा दिया था। खेती के दौरान अपने परिवार की मदद करते हुए उनका हाथ घास काटने वाली मशीन में फंस गया था। इसके बाद उनके साथ यह हादसा हुआ। इसके बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी मां से प्रेरणा लेते हुए खुद को एक स्टेट लेवल वॉलीबॉल में आगे ले गए। इसके बाद 2009 में उन्होंने हाई जम्प की ओर रुख किया। वह खुद की ट्रेनिंग के लिए रोजाना एक हाथ से साइकिलिंग भी करते थे। निषाद की मेहनत का फल अब उन्हें मिल रहा है। टोक्यो और पेरिस पैरा ओलंपिक में मेडल जीतने के बाद आइची-नागोया पैरा एशियाई खेलों में उन्होंने इतिहास रचते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया है।


