सचिन की पारी से कमेंट्री का जुनून, रेडियो से अंग्रेजी सीखी; जोधपुर के देवेंद्र कुमार की दिलचस्प कहानी

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नई दिल्ली : खेल की दुनिया में जुनून, मेहनत और संघर्ष की कई कहानियां देखने को मिलती हैं, लेकिन राजस्थान के जोधपुर से निकलकर अफगानिस्तान क्रिकेट की ‘आवाज’ बनने वाले देवेंद्र कुमार का सफर बेहद खास है। साल 1998 में शारजाह में सचिन तेंदुलकर की ऐतिहासिक पारी की रेडियो कमेंट्री सुनकर गांव के 11-12 साल के देवेंद्र के मन में कमेंट्री का जुनून पैदा हुआ। उस समय शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि रेडियो पर सुनी गई वह आवाज एक दिन उन्हें दुनिया के बड़े क्रिकेट स्टेडियमों तक पहुंचा देगी।

बिना किसी खास संसाधन के, सिर्फ BBC रेडियो सुनकर, अंग्रेजी अखबारों से नोट्स बनाकर और विदेशी सैलानियों से बातचीत कर देवेंद्र कुमार ने कमेंट्री की बारीकियां सीखीं। 20 साल 12 दिन की अटूट जिद और लंबी तपस्या के बाद आज वह अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के प्रमुख कमेंटेटर्स में से एक हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार देवेंद्र कुमार ने अपने इस दिलचस्प और प्रेरणादायक सफर की पूरी कहानी साझा की है।

कमेंट्री का सफर जोधपुर से अफगानिस्तान तक कैसे पहुंचा?

देवेंद्र कुमार: यह बहुत ऐतिहासिक सफर रहा है। 2017 में मेरे पास पहली बार आयरलैंड और अफगानिस्तान के मैच के लिए आमंत्रण आया था। वह मैच शारजाह में खेला गया था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान क्रिकेट टीम को टेस्ट मैच में फुल स्टेटस (पूर्णकालिक देश का दर्जा) मिलने के बाद वह पहला मैच था। पहली सीरीज थी। उस मैच के लिए एलिस्टेयर कैंपबेल के साथ कमेंट्री की थी। उसके बाद वहां से मेरा काबुल जाना शुरू हुआ और यह सिलसिला अब तक चल रहा है। अभी भारत बनाम अफगानिस्तान मैच में कमेंट्री करने के लिए दिल्ली आया हूं।

सवाल: कमेंट्री के प्रति आपका जुनून कब और कैसे जागा?

देवेंद्र कुमार: ऐसा नहीं था, क्योंकि गांव के अंदर क्रिकेट का कोई कल्चर नहीं था। बाहर से लोग आते थे तो थोड़ा बहुत क्रिकेट खेलते थे। उनके साथ मैं भी खेल लेता था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 1998 में जब सचिन तेंदुलकर ने शारजाह में जो दो पारियां खेलीं, उस समय बीबीसी रेडियो की जो क्लिप्स सुनने के बाद जो एक्साइटमेंट था, उसने ट्रिगर किया। लगा कि यह एक अच्छी चीज है। इसके अंदर एक रिदम है। उसने इंस्पायर किया कि मुझे कमेंटेटर बनना चाहिए। उस समय नहीं जानता था कि कमेंट्री क्या होती है। बस यह फील हुआ कि एक अच्छी चीज है जो आकर्षित कर रही है।

सवाल: कमेंट्री की दुनिया में आपकी शुरुआत कहां से हुई?

देवेंद्र कुमार: फिर रेडियो पर कमेंट्री सुनने लगा। गांव में जब भी बाहर से कोई लड़के आते थे क्रिकेट खेलते थे तो जो रेडियो पर पंक्तियां बोली जाती थीं उन्हें ही दोहराता था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार तब तक मुझे क्रिकेट की टर्मिनोलॉजी के बारे में नहीं पता था। मतलब के कौन सा शॉट क्या है, क्योंकि मैंने 1999 में पहली बार टेलीविजन देखा। हां 1999 में। उस समय मैं 11-12 साल का था। तब पहली बार क्रिकेट देखा। उस मैच में सचिन तेंदुलकर वगैरह वेस्टइंडीज में कहीं क्रिकेट खेल रहे थे। इसके बाद थोड़ा-थोड़ा ओरिएंटेशन होने लगा कि क्या गेम है।

देवेंद्र कुमार: फिर टीवी पर मैच देखते थे और साथ में रेडियो पर कमेंट्री चलाते थे। फिर धीरे-धीरे तब समझ में आने लगा कि फाइन लेग कहां है, थर्ड मैन कहां है, कौन सा शॉट क्या कहलाता है। धीरे-धीरे उसका ओरिएंटेशन होने लगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार फिर उसके बाद हॉस्टल के अंदर प्रैक्टिस करते थे या जहां भी हम खेलते थे। मतलब टीवी पर जो देखते थे, रेडियो पर जो सुनते थे, उसकी कमेंट्री की प्रैक्टिस करते थे। हालांकि, वह एक फन एक्टिविटी थी। मतलब कोई सोच-समझकर लिया गया फैसला नहीं था।

देवेंद्र कुमार: मैं 2006 में जयपुर गया। एक सितंबर 2006 को। सवाई मान सिंह स्टेडियम। फिर वहां पर लगातार मैच देखता था। मैच के दौरान जब उसमें इन्वॉल्व होने लगा तो समझा कि खुद को डेवलप करना होगा। अंग्रेजी पर पकड़ बनानी होगी। कमेंट्री के कौशल को विकसित करना होगा। उसके साथ-साथ अतिरिक्त जानकारी की भी जरूरत है, क्योंकि रेडियो या टेलीविजन पर कमेंट्री करते हैं तो काफी फिल-इन करना पड़ता है।

देवेंद्र कुमार: अंग्रेजी समाचार पत्रों को पढ़ना शुरू किया। लाइब्रेरी में जाता और पढ़ता, नोट्स बनाता और मैच में कमेंटेटर्स के पीछे बैठता। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वे जो कमेंट्री करते थे, उनके नोट्स बनाता और फिर उसको लागू करने की कोशिश करता।

सवाल: पहली बार इंटरनेशनल कमेंट्री बॉक्स में कब मौका मिला?

देवेंद्र कुमार: साल 2009 में दिल्ली आया। इसी स्टेडियम में चैंपियंस लीग चल रही थी। यहां पहली बार इंटरनेशनल कमेंट्री बॉक्स में बैठा। उस कमेंट्री बॉक्स में एलन हेडन विल्किंस, इयान चैपल, एलन डोनाल्ड… ये सभी आए हुए थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सुनील गावस्कर, हर्षा भोगले भी कमेंट्री कर रहे थे। उनके पीछे बैठकर पहली बार उनको सुन रहा था। दिल्ली में ही इंटरनेशनल कमेंट्री बॉक्स में एंट्री मिली। फिर उसके बाद यह सिलसिला चलता रहा। जोधपुर गया फिर जयपुर गया। फिर तैयारी करता रहा।

देवेंद्र कुमार: इसके बाद हॉर्स पोलो कमेंट्री में ब्रेक मिला। पोलो पर कमेंट्री करता था तभी दूरदर्शन में भी कमेंट्री करने का मौका मिला। दूरदर्शन पर अलग-अलग, जैसे- टेनिस, फुटबॉल, बास्केटबॉल, वॉलीबॉल, इन सभी खेलों की कमेंट्री करने लगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जयपुर में जब भी आईपीएल के मुकाबले तो कमेंटेटर आते और मैं उनके पीछे बैठता। यह सिलसिला चलता रहा और किसी दिन किसी कमेंटेटर ने अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड को सुझाव दिया कि यह बंदा है जो आपके लिए काम कर सकता है। इस तरह 2017 में अफगानिस्तान क्रिकेट बोड से फोन आया।

सवाल: तब आपको पश्तो आती थी?

देवेंद्र कुमार: पश्तो आती नहीं थी, लेकिन मुझे इंग्लिश कमेंट्री के लिए बुलावा आया था।

सवाल: अब पश्तो सीख ली?

देवेंद्र कुमार: पश्तो मैं समझ जाता हूं। वे जितना भी बोलते हैं तो समझ जाता हूं। मतलब जैसे कोई पश्तो कमेंटेटर है। उसके साथ यदि मैं अंग्रेजी में कमेंट्री कर रहा हूं तो मुझे समझ में आता है कि वह क्या बात कर रहे हैं। इसके बाद अफगानिस्तान के घरेलू और जितने भी अंतरराष्ट्रीय मुकाबले हुए उनमें मैं लगातार कमेंट्री कर रहा हूं।

सवाल: संघर्ष के दिनों में परिवार का रवैया कैसा रहा? क्या कभी कमेंट्री छोड़ने का विचार आया?

देवेंद्र कुमार: एक धुन थी, उसमें कुछ ना तो समझ में आ रहा था ना कभी इतना सोचा था। जब आप एक धुन में रहते हैं तो आपको अगला जो लक्ष्य होता है ना…। वह अपने आप मिलता रहता है। जब आप किसी चीज के अंदर पूरी तरह से घुस जाते हैं तो जो एरिया ऑफ इंप्रूवमेंट है, कैसे बिल्ड करना चाहिए, यह सब धीरे-धीरे सीखता गया।

सवाल: अब तक के अपने सफर को किस नजरिए से देखते हैं?

देवेंद्र कुमार: साल 2023 में भारत में जो आईसीसी वनडे वर्ल्ड कप हुआ, उसमें मेरा बचपन का सपना पूरा हुआ। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वर्ल्ड कप में यहीं अरुण जेटली स्टेडियम में भारत और अफगानिस्तान के बीच मैच हुआ था। उसमें मैंने कमेंट्री की। वर्ल्ड कप 2023 में डिफेंडिंग चैंपियन इंग्लैंड के खिलाफ अफगानिस्तान की पहली बड़ी जीत के मौके पर भी मैं कमेंट्री कर रहा था। वह मैच भी अरुण जेटली स्टेडियम में खेला गया था।

सवाल: क्या दिल्ली को अपने लिए लकी मानते हैं?

देवेंद्र कुमार: हां, दिल्ली ने मेरे करियर को उफान पर पहुंचाया। जब मैंने घर छोड़ा था तो मेरा पहला उद्देश्य बीबीसी के लिए कमेंट्री करना था। वह मैंने 2023 में किया। मैंने बचपन में 10-12 हजार घंटे कमेंट्री सुनी। रेडियो बीबीसी पर सुनता था। इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, वेस्टइंडीज, शॉर्ट वेव रेडियो पर जो कमेंट्री आती थी, दिन भर वही सुनता था। बीबीसी न्यूज भी सुनता था। उनके अलग-अलग कार्यकम होते ते वह रिपीट कर-कर के सुनता रहता। 41 की उम्र में भी डटे हैं मोहम्मद नबी, अफगान टीम से पहले हुआ था डेब्यू, एक ख्वाब के कारण बदला था संन्यास का फैसला

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