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Monday, March 16, 2026

लक्ष्य सेन, कोच और परिवार पर लगा केस रद्द, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 28 जुलाई को बैडमिंटन खिलाड़ी लक्ष्य सेन, उनके परिवार और कोच के खिलाफ दर्ज जन्म प्रमाण पत्र जालसाजी मामले में एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया। यह मामला लंबे समय से चल रहा था, जिसमें आरोप था कि लक्ष्य सेन ने उम्र संबंधित जानकारी में हेरफेर की थी। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि मामले में आपराधिक इरादे का कोई ठोस प्रमाण नहीं है और जांच में गंभीर खामियां हैं। कोर्ट के इस फैसले से लक्ष्य सेन और उनके समर्थकों को बड़ी राहत मिली है।

जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि सेन के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई जारी रखना अनुचित है। यह अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले कर्नाटक सरकार और शिकायतकर्ता एमजी नागराज को नोटिस जारी किया था, जिन्होंने आरोप लगाया था कि लक्ष्य सेन और उनके भाई चिराग सेन के जन्म प्रमाण पत्र जाली थे। वह कर्नाटक हाई कोर्ट के 19 फरवरी के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

जन्म प्रमाण पत्र हेरफेर केस में खत्म हुई कानूनी लड़ाई

सुप्रीम कोर्ट ने लक्ष्य सेन, उनके परिवार और कोच विमल कुमार की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिनमें FIR को रद्द करने की मांग की गई थी। इससे पहले हाई कोर्ट ने यह कहते हुए मामला जांच योग्य माना था कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर ऐसे पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं जो मामले की जांच की आवश्यकता को दर्शाते हैं। हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी, जिसे अब खारिज कर दिया गया है। यह मामला नागराज द्वारा दायर एक निजी शिकायत के बाद सामने आया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सेन के माता-पिता धीरेंद्र और निर्मला सेन, उनके भाई, कोच और कर्नाटक बैडमिंटन संघ के एक कर्मचारी मिलकर ने उनके जन्म प्रमाण पत्र में हेरफेर की थी।

फर्जी जन्म प्रमाण पत्र से फायदा उठाने का आरोप

शिकायतकर्ता का आरोप है कि टूर्नामेंट में हिस्सा लेने और सरकारी लाभ प्राप्त करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र में हेरफेर किया गया। इस फर्जीवाड़े के जरिए खिलाड़ी को उम्र में राहत दिखाकर खेल कोटे का लाभ उठाने की कोशिश की गई। उन्होंने अपने तर्क के समर्थन में सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से प्राप्त कुछ दस्तावेज प्रस्तुत किए थे। 2022 में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) और 471 (जाली रिकॉर्ड को असली के रूप में इस्तेमाल करना) के तहत मामला दर्ज किया था। हालांकि, कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद जांच पूरी नहीं हो पाई।

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