नई दिल्ली : अरब सागर की लहरें अभी पूरी तरह शांत भी नहीं होतीं कि अब्दुल फत्ताह अपनी नाव किनारे की ओर मोड़ चुके होते हैं। रात भर जाल डालकर मछलियां पकड़ने के बाद उनके हाथों में थकान जरूर होती है, लेकिन आंखों में एक अलग ही चमक दिखाई देती है—कुछ बड़ा कर दिखाने की चमक। सुबह की हल्की रोशनी के साथ, जब ज्यादातर लोग आराम की तलाश में होते हैं, अब्दुल फत्ताह एक छोटे से मैदान की ओर बढ़ जाते हैं। यही उनका दूसरा संसार है, जहां न कोई सिंथेटिक ट्रैक है और न आधुनिक सुविधाएं, बस एक सपना है, जो हर दिन उनसे और ऊंची छलांग लगाने की मांग करता है।
7.03 मीटर की छलांग से अब्दुल फत्ताह ने मचाया तहलका
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अब्दुल फत्ताह ने जब खेलो इंडिया ट्रायबल गेम्स 2026 में 7.03 मीटर की छलांग लगाई, तो वह सिर्फ एक गोल्ड मेडल नहीं था, बल्कि उन अनगिनत सुबहों और थकी हुई रातों की जीत थी, जिन्हें उन्होंने अपने परिवार और अपने सपनों के बीच संतुलन बनाते हुए जिया था। लक्षद्वीप के छोटे से द्वीप से निकलकर आए इस 18 वर्षीय खिलाड़ी की कहानी अब सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि इस बात का सबूत बन गई है कि सही नजर और मजबूत विश्वास के सामने संसाधनों की कमी भी सपनों की उड़ान को नहीं रोक सकती। हालांकि, यह सफर हमेशा इतना आसान नहीं रहा।
फुटबॉल से शुरू हुआ अब्दुल फत्ताह का खेल सफर
अब्दुल फत्ताह के लिए खेल की शुरुआत फुटबॉल से हुई थी। द्वीप के ज्यादातर युवाओं की तरह वह भी गेंद के पीछे दौड़ते हुए बड़े हुए, लेकिन एक स्थानीय अंतर-द्वीपीय प्रतियोगिता के दौरान, उनकी रफ्तार पर कोच मोहम्मद कसीम की खास नजर पड़ी।
कोच कसीम ने पहचानी अब्दुल सत्ताह की छिपी प्रतिभा
मोहम्मद कसीम ने उनके भीतर छिपी उस क्षमता को पहचान लिया, जिसे अब्दुल फत्ताह खुद नहीं समझ पाए थे। कसीम ने उनमें सिर्फ तेज दौड़ने वाला खिलाड़ी नहीं देखा, बल्कि संभावित एथलीट के रूप में परखा। यहीं से कहानी ने करवट बदली। फुटबॉल के मैदान से उठकर जब अब्दुल फत्ताह ने पहली बार लंबी कूद के लिए कदम बढ़ाए तो यह सिर्फ खेल बदलने का फैसला नहीं था, बल्कि किस्मत को नई दिशा देने जैसा था।
सीमित संसाधन, मिट्टी का ट्रैक और बिना किसी आधुनिक सुविधा के शुरू यह सफर धीरे-धीरे आकार लेने लगा। यही वह मोड़ था, जहां एक कोच की नजर ने न सिर्फ एक खिलाड़ी को पहचाना, बल्कि लक्षद्वीप के खेल इतिहास में एक नई उम्मीद भी जगा दी। मछुआरे परिवार में जन्में अब्दुल फत्ताह चार भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं और घर की बड़ी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर उठाते हैं।
पैसों की कमी ने रोकी पढ़ाई, लेकिन नहीं टूटा हौसला
अब्दुल अपने परिवार की रोजी-रोटी में हाथ बंटाने के लिए ज्यादातर रातें समुद्र में बिताते हैं। आर्थिक तंगी के चलते उन्हें 12वीं कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हालांकि, इन चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और पिता के पारिवारिक व्यवसाय में सहयोग करते हुए खेल को अपने जुनून के रूप में अपनाने का फैसला किया, जिससे उनके सपनों को नई दिशा मिल सकी।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार केंद्र शासित प्रदेश के खेल अधिकारी अहमद जावेद हसन के माध्यम से अब्दुल फत्ताह ने अपनी जिंदगी की सच्चाई बयां करते हुए कहा, “कोई और चारा नहीं है, आपको हर चीज में तालमेल बैठाना ही पड़ता है। मैं जब स्कूल में था, तभी से मछली पकड़ने में अपने पिता की मदद करता आ रहा हूं और यही हमारी आय का एकमात्र जरिया है। हमारे परिवार में छह सदस्य हैं, इसलिए जिम्मेदारियां भी ज्यादा हैं। सुबह के समय मैं अपनी ट्रेनिंग के लिए निकल जाता हूं। मेरे परिवार को इसके बारे में पता है, भले ही वे खेल को ज्यादा नहीं समझते, लेकिन मेरा साथ जरूर देते हैं।”


