नई दिल्ली : पिता गुलाम नबी चाहते थे कि बेटा डॉक्टर बने—सफेद कोट पहने और सुरक्षित भविष्य की राह चुने। मगर आकिब के दिल की धड़कन तो सिर्फ क्रिकेट के लिए थी। पथरीले मैदानों पर अभ्यास, लंबी बस यात्राएं और सीमित संसाधनों के बीच उसका सपना आकार लेता रहा। डांट पड़ी, घर के ताले लगे, आर्थिक तंगी ने कई बार कदम रोकने की कोशिश की, लेकिन वह अपने इरादे से नहीं डिगा। कश्मीर के शिरी की गलियों से उठी यह खामोश जिद आखिरकार सफलता की कहानी बन गई। पिता की चिंता, बेटे का जुनून और परिवार के भरोसे ने मिलकर उम्मीद की एक नई इबारत लिख दी।
तेंदुलकर-गांगुली से प्रेरित थे आकिब के पिता
90 के दशक के आखिर और 2000 के दशक की शुरुआत में गुलाम नबी का ‘तेंदुलकर सर’ और ‘कैप्टन कूल- गांगुली’ के लिए छिपा हुआ प्यार शायद उनके बेटे आकिब (अकू) को क्रिकेट में बने रहने देने के पक्ष में हो गया। वह कहते हैं ‘शुरू में, मैंने उसे सख्ती से रोका। हालांकि, गुलाब की मां और पत्नी (आकिब की दादी और मां) क्रिकेट की दीवानी थीं। गुलाम कहते हैं, ‘मेरी पत्नी उन क्रिकेटरों के खेलने के स्टाइल के बारे में भी जानती है, जिनके नाम मैंने कभी सुने भी नहीं!’ वह बताते हैं, ‘मैं भी एक अच्छा गेंदबाज हुआ करता था, लेकिन शादी के बाद मैंने क्रिकेट खेलना छोड़ दिया। जिम्मेदारियां हावी हो जाती हैं।’
तीन बच्चों के पिता गुलाम नबी एक सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं। जब आकिब नबी रणजी ट्रॉफी फाइनल के तीसरे दिन कर्नाटक के करुण नायर, केएल राहुल और देवदत्त पडिक्कल जैसे बल्लेबाजों को क्लीन बोल्ड कर रहे थे, तब उनके पिता बारामूला से सात किलोमीटर दूर शिरी स्थित अपने सेकेंडरी स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे थे। बाद में वे मोबाइल पर बेटे की गेंदबाजी की वीडियो क्लिप देखते और गर्व महसूस करते। पुराने दिनों को याद करते हुए गुलाम नबी बताते हैं, “मिडिल स्कूल में आठवीं कक्षा के दौरान आकिब पढ़ाई में जोन टॉपर था। मैं सच में चाहता था कि मेरे सभी बच्चे मेडिकल लाइन में जाएं।”
गुलाम नबी को सताता था बेटे के क्रिकेट में बिगड़ जाने का डर
जम्मू-कश्मीर में क्रिकेट का अक्सर संबंध राजनीति, सुरक्षा हालात, धार्मिक और क्षेत्रीय मतभेदों और बुनियादी सुविधाओं की आर्थिक स्थिति से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन हर चीज केवल इसी तक सीमित नहीं है। आकिब नबी और अधिकांश मिडिल क्लास परिवारों के लिए चिंता का विषय कुछ और ही था। गुलाम नबी बताते हैं, “मुझे पता था कि क्रिकेट कोई बुरा खेल नहीं है, क्योंकि मैं भी खेलता था। लेकिन जब आकिब दिनभर और शाम तक गायब रहता था और हमें नहीं पता होता था कि वह कहां है, तो मुझे बहुत चिंता होती थी। डर और परेशानी रहती थी कि बेटा बिगड़ न जाए। इसलिए जब वह क्रिकेट खेलने की बात छिपाता था, तो वह मुझे पसंद नहीं था।”
हालांकि, शर्मीला और बहुत अंतर्मुखी आकिब क्रिकेट छोड़ने वाला नहीं था। गुलाम बताते हैं, ‘उसका जुनून देखकर मैंने हार मान ली। 9वीं से 12वीं तक मैं जोर देता रहा कि वह मेडिसिन पढ़े, उसे क्लास में डालो, लेकिन उसका प्यार क्रिकेट था। मैं उसे डांटता था, बंद कर देता था, लेकिन उसने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया। एक शब्द भी नहीं। उस समय क्रिकेट में करियर बनाने का कोई स्कोप नहीं था। कश्मीर में कोई सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन वह कड़ी मेहनत करता रहा।’ फिर बोलते हैं, ‘एक पिता के तौर पर आपको सख्त होना पड़ता है। थोड़ी ढील दी तो बातें खराब हो सकती थीं…। देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां भी हिंसा और ड्रग्स किसी भी आम परिवार के लिए चिंता की बात थी।’
तीसरी कोशिश में आखिरकार चुने गए आकिब नबी
जिस ग्राउंड पर बारामूला के शेरी के क्रिकेटर खेलते थे, वह वास्तव में कंकड़-पत्थर वाला खुला मैदान था। दस साल पहले क्रिकेट को अपनी ख्वाहिश के तौर पर देखने की संभावना के बारे में आकिब कहते हैं, “आप इसे असल में ग्राउंड नहीं कह सकते।” आकिब दोस्तों के साथ JKCA (जम्मू और कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन) के अंडर-19 ट्रायल्स के लिए गए थे और पहले दो कोशिशों में बाहर हो गए थे। लेकिन तीसरी कोशिश में उनका चयन हो गया और यहीं से उनका क्रिकेट करियर नई दिशा में बढ़ाया।
कॉलेज के पहले साल में गुलाम को अहसास हुआ कि उनका बेटा खुद पर क्यों यकीन करता है और बिना कुछ कहे ही अड़ियल क्यों है। गुलाम ने बताया, ‘वह मेरी डांट का जवाब देने में बहुत शर्मीला था। अपने पहले साल में मैंने उसे 2014-15 के आसपास श्रीनगर में डाउनटाउन प्रीमियर लीग में खेलते देखा। गेंद भूल जाओ, उसकी बल्लेबाजी शानदार थी।’ सचिन तेंदुलकर का फैन बेटे आकिब को कुछ साफ-सुथरे स्ट्राइकिंग स्ट्रोक्स खेलते हुए देखता था। गुलाम ने बताया, ‘अपने तो तेंदुलकर सर हमेशा के फेवरेट हैं। गांगुली की कैप्टेंसी भी कूल थी। बिल्कुल पारस डोगरा की तरह। उसने मन बना लिया था। अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं था।’
परिवार में थी आर्थिक तंगी
गुलाम कहते हैं, ‘वित्त एक समस्या थी, लेकिन जब भी उसे पैसों की जरूरत पड़ी, हमने उसे कभी निराश नहीं किया। वह इतना सच्चा था कि मुझे क्रिकेट के प्रति उसके समर्पण पर कभी शक नहीं हुआ। ऐसे भी दिन थे जब जेब में पैसे नहीं होते थे, लेकिन मैं कर्जा ले लेता था। मैंने पक्का इरादा कर लिया था कि मैं उसे पूरी तरह सपोर्ट करूंगा, जैसे कोई भी माता-पिता करते हैं।’ छोटे से बारामूला क्रिकेट क्लब ने मदद करना शुरू कर दिया। लोकल बस सर्विस ने उससे टिकट के पैसे लेने बंद कर दिये। वह 60 किमी दूर ट्रेनिंग के लिए रोजाना लिफ्ट ले सकता था।’
अच्छे खेल के बावजूद India A टीम में चयन नहीं हुआ
आकिब ने जब ईस्ट जोन के खिलाफ दलीप ट्रॉफी मैच में सिर्फ 4 गेंदों में 4 विकेट लिए, तो उनके पिता को आखिरकार संतोष हुआ। इसके बावजूद वे देख सकते थे कि उनका बेटा का टैलेंट वास्तव में इंडिया लेवल के लिए था। गुलाम नबी बताते हैं, “वह लगातार कड़ी मेहनत करता रहा और कभी शिकायत नहीं की। मैंने उसे कभी यह कहते नहीं सुना कि प्रैक्टिस के बाद वह थक गया है।” अच्छे प्रदर्शन के बावजूद इंडिया A में बार-बार चयन न मिलने और आईपीएल टीमों द्वारा नजरअंदाज किए जाने से परिवार को बहुत दुख हुआ। गुलाम नबी ने याद किया, “आईपीएल ऑक्शन से एक साल पहले हमने देखा कि उस पर कोई ध्यान तक नहीं दे रहा। उसकी मां बहुत परेशान थीं। तभी आकिब ने उनसे कहा—‘आप परेशान न हों मां, एक दिन आपके बेटे की बोली करोड़ों में होगी।’”
गुलाम नबी ने बताया, ‘…लेकिन जो भी उसके पास आता, वह उसे खेलने के लिए कभी मना नहीं करता था। सड़कों पर बच्चे उसे गेंदबाजी करने के लिए कहते थे और वह कभी मना नहीं करता था। उसे अपने कौशल पर भरोसा था और एक टीचर के तौर पर मुझे उसकी एक-शब्द वाली पोस्ट ‘विश्वास करो’ बहुत पसंद थी।’ उसके अंदर रहने का मतलब था कि परिवार को उसकी चुप्पी का अंदाजा फोन कॉल पर उसकी आवाज से लगाना पड़ता था। गुलाम नबी कहते हैं, ‘रणजी फाइनल के चौथे दिन भी मुझे लगा कि वह शांत लग रहा है। हमने उससे पूछा कि क्या गड़बड़ है। उसने कहा सब ठीक है, लेकिन मुझे लगता है कि वह सच में चाहता था कि जम्मू-कश्मीर ट्रॉफी जीते।’
परिवार को आकिब से बस यही शिकायत रहती थी कि वह ज्यादा खाता नहीं था। पिता गुलाम नबी कहते हैं, “जब घर पर दाल होती थी तो उसे अच्छा लगता था और सब्ज़ी भी, लेकिन यह लड़का कुछ खाता ही नहीं है कभी।” अपने बेटे के लिए उनकी इच्छा के बारे में गुलाम नबी बताते हैं, “वह सुरक्षित रहे, देश के लिए खेले और भारत के लिए मैच जीते।” इसके अलावा वे तेंदुलकर को भी धन्यवाद देना नहीं भूलते। गुलाम नबी कहते हैं, “कृपया तेंदुलकर सर को जम्मू-कश्मीर के लिए उनकी शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद कहना। मैं उनकी बातों से बहुत खुश हुआ।”

