नई दिल्ली : Sheetal Devi की यात्रा केवल खेल उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह असंभव को संभव बनाने वाले अटूट हौसले की प्रेरणादायक कहानी है। किश्तवाड़ की वादियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाली शीतल ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से नई पहचान बनाई है। ‘पैरा आर्चर ऑफ द ईयर 2025’ के लिए विश्व आर्चरी द्वारा उनका चयन पूरे जम्मू-कश्मीर के लिए सम्मान और गर्व का विषय है।
इस उपलब्धि से वह करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा की अब और मजबूत मिसाल बन गई हैं। किश्तवाड़ के लोई धार जैसे सुदूर गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा फहराना शीतल के कठिन परिश्रम का प्रमाण है। जन्म से ही दोनों हाथ न होने के बावजूद उन्होंने अपने हौसले, मेहनत और जज्बे से ये नया मुकाम हासिल किया है। शीतल का बचपन चुनौतियों से भरा रहा है। पिता मान सिंह साधारण परिवार से हैं। मां शक्ति देवी ने शीतल का हमेशा हौसला बढ़ाया।
कटड़ा स्थित माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के स्पोर्ट्स स्टेडियम में आर्चरी अकादमी में दाखिला लेने के बाद उनके जीवन ने नया मोड़ लिया। शुरुआत में हालात बेहद कठिन थे। वह धनुष तक नहीं उठा पाती थीं, निशाना चूक जाता था और कई बार निराशा भी हाथ लगती थी। उनके कोच कुलदीप वेदवान और अभिलाषा चौधरी ने उन्हें हिम्मत दी और लगातार प्रेरित किया। शीतल ने अपने दाएं पैर से धनुष उठाने और मुंह व कंधे की मदद से तीर चलाने का अभ्यास शुरू किया।
शुरुआती दिनों में यह बेहद कठिन था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। ट्रेनिंग के दौरान उनके लिए विशेष धनुष तैयार किया गया जिससे वह बेहतर अभ्यास कर सकें। दो साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार पदक जीतने शुरू किए। वर्ष 2021 में उन्होंने अपने कॅरिअर की शुरुआत की और पहली बार किश्तवाड़ में भारतीय सेना की एक प्रतियोगिता में भाग लिया।
हौसला और परिवार का साथ: सफलता की असली ताकत
Sheetal Devi का मानना है कि उनके जैसे कई बच्चे हैं, जिन्हें आगे बढ़ने के लिए सिर्फ हिम्मत और परिवार के समर्थन की जरूरत होती है। यदि वे खेलों को अपनाएं और पूरे समर्पण के साथ मेहनत करें, तो वे भी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। उनकी प्रेरक यात्रा यह साबित करती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, मजबूत इरादों और आत्मविश्वास के दम पर सफलता हासिल की जा सकती है।


