नई दिल्ली : एशियाड में लगातार तीसरा स्वर्ण पदक जीतने के लिए शॉटपुटर तजिंदर पाल सिंह तूर ने अपने गुरु और कोच एमएस ढिल्लों को ऑस्ट्रेलिया से विशेष आग्रह कर बुलाया था। यही वह कोच हैं, जिन्होंने 2018 के जकार्ता एशियाड में फाइनल से पहले तूर को उनके कैंसर से जूझ रहे पिता करम सिंह की हालत याद दिलाकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित किया था। कोच के उन शब्दों ने तूर में ऐसा जज्बा भरा कि उन्होंने स्वर्ण पदक जीतकर वापसी की थी। तूर को इस बार भी उम्मीद थी कि ढिल्लों की मौजूदगी उन्हें स्वर्ण तक पहुंचाएगी, लेकिन उनके हिस्से में रजत पदक आया। तूर ने स्वीकार किया कि उनका शरीर उस तरह साथ नहीं दे रहा था, जैसा 2018 और 2023 के फाइनल में दिया था। उन्होंने अपने वजन को 140 किलो या उससे कम रखने का लक्ष्य बनाया था, लेकिन एशियन गेम्स के दौरान उनका वजन 144 से 145 किलो के बीच रहा। तूर ने अपने पिछले दोनों स्वर्ण पदक करीब 140 किलो के वजन पर जीते थे, लेकिन इस बार बढ़ा हुआ वजन उनके प्रदर्शन पर असर डालता नजर आया।
वजन 139 किलो तक ले आए थे तजिंदर तूर
ढिल्लों ने पहले बताया था कि 11 अप्रैल को दिल्ली में हुई एथलेटिक्स मीट तक तजिंदर तूर की तैयारी अच्छी चल रही थी। इस प्रतियोगिता में तूर ने 21.03 मीटर का थ्रो किया था और उनका वजन 139 किलो था। हालांकि, जून में इंटर-स्टेट प्रतियोगिता से पहले उन्हें रोटेटर कफ में चोट लग गई। चोट के कारण वह राष्ट्रमंडल खेलों में भी हिस्सा नहीं लेना चाहते थे। वहां से लौटने के बाद उन्होंने चोट पर काम शुरू किया, लेकिन कुछ ही दिनों बाद यह समस्या फिर उभर आई। इसके बाद उन्होंने ऐसी सभी एक्सरसाइज बंद कर दीं, जिनसे चोट बढ़ने का खतरा था। उनकी ट्रेनिंग में जंप और हर्डल जैसी एक्सरसाइज भी शामिल नहीं रहीं। तूर के मुताबिक, वह न तो जंप लगा पा रहे थे और न ही हर्डल पार कर रहे थे। ट्रेनिंग में इस बदलाव का असर उनकी फिटनेस और वजन पर पड़ा और वह अपना वजन 140 किलो से नीचे नहीं ला सके।


