नई दिल्ली : भारत और श्रीलंका के बीच 2008 में खेली गई टेस्ट सीरीज ऐतिहासिक रही थी। हालांकि श्रीलंका ने भारत के खिलाफ आखिरी बार टेस्ट सीरीज 2008 में जीती थी, लेकिन उस सीरीज में भारत ने तीन मैचों में 2-1 से जीत दर्ज की थी। इसी सीरीज के दौरान पहली बार डिसीजन रिव्यू सिस्टम (DRS) का इस्तेमाल किया गया था। कोलंबो में खेले गए पहले टेस्ट की दूसरी पारी में भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग DRS के जरिए आउट दिए जाने वाले पहले बल्लेबाज बने थे।
भारतीय टीम के लिए DRS का शुरुआती अनुभव इतना खराब रहा कि वह करीब आठ वर्षों तक इसके इस्तेमाल के पक्ष में नहीं थी। उस तीन मैचों की सीरीज में कुल 48 बार DRS का सहारा लिया गया, जिसमें 12 रिव्यू सफल रहे, जबकि 36 फैसले टीमों के पक्ष में नहीं गए। भारत ने 21 बार DRS का इस्तेमाल किया, लेकिन इनमें से सिर्फ एक रिव्यू उसके पक्ष में गया। वहीं श्रीलंका के 11 रिव्यू सफल रहे। इस सीरीज के दौरान कई DRS फैसलों को लेकर विवाद भी देखने को मिले थे।
DRS का पहला रिव्यू हरभजन सिंह ने लिया, जानें क्या हुआ था फैसला
भारत के दिग्गज स्पिनर हरभजन सिंह डीआरएस का इस्तेमाल करने वाले पहले क्रिकेटर थे। हरभजन सिंह ने श्रीलंका के मलिंडा वार्नापुरा के खिलाफ एलबीडब्ल्यू की अपील की, जिसे ऑन-फील्ड अंपायर ने खारिज कर दिया। इसके बाद कप्तान अनिल कुंबले ने रिव्यू करने का फैसला किया। भारत के लिए निराशा की बात यह रही कि रिव्यू सफल नहीं हुआ। इसके बाद मलिंडा वार्नापुरा ने कुल 115 रन बनाए।
DRS से बचने वाले पहले बल्लेबाज बने तिलकरत्ने दिलशान
श्रीलंका के स्टार खिलाड़ी तिलकरत्ने दिलशान रिव्यू लेकर आउट होने से बचने वाले पहले बल्लेबाज बने थे। जहीर खान की गेंद पर आउट दिए जाने के बाद अंपायर के फैसले को चुनौती देते हुए रिव्यू की मांग की थी। हैरानी की बात यह थी कि डीआरएस का फैसला गलत साबित हुआ, क्योंकि स्निक ओ मीटर (जो डिसीजन रिव्यू सिस्टम का हिस्सा नहीं था) ने दिखाया कि विकेटकीपर द्वारा कैच किये जाने से पहले श्रीलंकाई बल्लेबाज के बल्ले से गेंद का हल्का सा संपर्क हुआ था।
DRS के सामने सचिन-द्रविड़ हुए बेअसर, रिव्यू ने बदला फैसला
वीरेंद्र सहवाग रिव्यू सिस्टम के तहत आउट दिए जाने वाले पहले बल्लेबाज बने थे। मुथैया मुरलीधरन की गेंद पर वीरेंद्र सहवाग के खिलाफ एलबीडब्ल्यू की अपील हुई। नॉटआउट दिए जाने के बाद श्रीलंका ने रिव्यू की मांग की और सफल रही। हालांकि, यह फैसला विवादित था। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ दोनों के ही मामले में यह सही साबित हुआ था।
अनिल कुंबले और महेला जयवर्धने के बीच हुआ दिलचस्प DRS मुकाबला
मैच के बाद भारत के तत्कालीन कप्तान अनिल कुंबले ने कहा कि रिव्यू सिस्टम अब भी एक प्रयोग है और इसकी समीक्षा की जानी चाहिए। हालांकि, श्रीलंका के कप्तान महेला जयवर्धने इस सिस्टम के समर्थन में थे। उन्होंने कहा, ‘‘अगर इस टेस्ट मैच में इसका इस्तेमाल नहीं किया गया होता, तो शायद चार गलत फैसले हमारे खिलाफ जाते। मैदान पर मौजूद अंपायर के लिए सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ दोनों के मामले में फैसले लेना मुश्किल था।’’
DRS के फैसलों को लेकर खिलाड़ियों में रहा संशय
आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शायद डीआरएस के बगैर कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन जब इसका पहली बार इस्तेमाल हुआ था तब खिलाड़ियों के साथ-साथ अंपायरों में भी असमंजस की स्थित थी। कमेंटेटर भी स्वाभाविक रूप से दर्शकों को मैदान पर हो रही घटनाओं के बारे में समझाने के साथ-साथ इस नई तकनीक के कामकाज को समझने की कोशिश कर रहे थे।
डीआरएस में क्या-क्या होता है इस्तेमाल
- हॉक-आई (Hawk-Eye) एलबीडब्ल्यू के लिए गेंद को ट्रैक करता है और यह पता लगाता है कि क्या गेंद स्टंप्स पर लगती या नहीं।
- अल्ट्रा-एज (UltraEdge) ऑडियो टेक्नोलॉजी की मदद से गेंद के बल्ले से हल्के से छूने का भी पता लगा लिया जाता है।
- पिचिंग के लिए बॉल ट्रैकिंग एलबीडब्ल्यू फैसले के लिए यह जांचता है कि गेंद ऑफ स्टंप की लाइन के अंदर पिच हुई या बाहर।
DRS की अपनी भी हैं सीमाएं
डीआरएस का उद्देश्य मैदान पर अंपायर के फैसले की दोबारा जांच कर उसे सही या गलत साबित करने में मदद करना है, लेकिन यह तकनीक भी पूरी तरह विवादों से मुक्त नहीं है। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा ‘अंपायर्स कॉल’ को लेकर रहता है। हॉक-आई गेंद के स्टंप्स के पास पहुंचने तक उसके प्रक्षेपण का अनुमान लगा सकता है, लेकिन स्टंप्स से आगे गेंद की वास्तविक दिशा को पूरी तरह निश्चित रूप से नहीं बता सकता। इसी वजह से कुछ फैसलों में तकनीकी गुंजाइश रखी जाती है। जब गेंद स्टंप्स को छूती हुई या उनके बेहद करीब से गुजरती हुई दिखाई देती है, तो ऐसी स्थिति में ‘अंपायर्स कॉल’ का फैसला लागू हो सकता है।


