ब्रजेश द्विवेदी, 60 % दिव्यांग है, जिन्हे चलने मे अपने हाँथ का सहारा लेना पड़ता है मगर दिव्यांगता उनके हौशले को कमज़ोर नहीं कर पाई , माँ की अद्भुत मेहनत से आज वो अपने पैरो पर खड़े है । क्रिकेट की दीवानगी हर पल सोते जागते बस यही अरमान लिए की देश का प्रतिनिधित्व करना है । धीरे धीरे जब बड़े हुए तो समझा आया की तालिया आपको शिखर तक नहीं पंहुचा सकती। पिता राज्य परिबाहन मे एक कंडक्टर थे और घर मे 7 लोग उनपर निर्भर थे । जीवन मे केवल वो तभी छुट्टी लेते जब ब्रजेश के एग्जाम मे कम नंबर आते थे क्योकि तब स्कूल मे पेरेंट्स का आना अनिवार्य होता था। स्कूल जीवन मे एक संघर्ष यह था की माता पिता अपने बच्चो की फीस भर ले यही बहुत बड़ी उपलब्धि थी जो की किसी तरह पूरी हो जाती थी और उस पर क्रिकेट जैसे खेल का सामान खरीदना एक सपना होता था मगर दप्ती और प्लास्टिक बॉल से अपना मन हल्का कर लेते थे । थोड़ा आगे सोचा तो बस बढई के पास जाओ और उससे निवेदन करो की एक लकड़ी को बैट का आकर देदे। किसी तरह बैट बना तो 5 रुपए की स्पंच की बॉल कैसे खरीदे ? सो कपडे की गेंद बनाया अंदर कोई सड़क मे फटी बाल मिली उसको प्लास्टिक और फिर कपडे से लपेटा और शुरू हो गए, समय थोड़ा बदला तो टेनिस की बाल के लिए जद्दो जहद। खैर दोस्तों की मदद से वो भी होगया। अब बड़े हुए और लगा की हम सचिन नहीं तो कैफ तो बन ही सकते है मगर कैसे संभव हो लेदर बॉल और बैट, ग्लव्स तो केवल टीवी मे ही देखा है खरीदना तो कल्पना से परे था। एक सीनियर खिलाडी ने बाउंड्री मे बॉल उठाते देखा तो दया बस एक बैट दिया बैट बीच से फटा हुआ था फेविकोल अंदर लगा के रेशम के धागे से उसकी गटिंग करके तैयार किया तो लगा वर्ल्ड कप जीत गए। बस यही से कारवा आगे बढ़ा।
मेहनत का कोई पर्याय नहीं
उस समय ग्राउंड मतलब उबड़ खाबड़ जगह जहा सब कुछ आप को ही करना पड़ेगा, 3.30 को सुबह उठकर साइकिल से 6 किलो मीटर आगे जा कर स्टेडियम मे पहले पिच को रोल करना फिर उसके सूखने तक व्यायाम करना फिर दोपहर 12 तक जी तोड़ मेहनत कर वापस घर जा के फिर 3 बजे दोपहर फिर ग्राउंड मे उपलब्ध हो जाना। यह सीलसिला10 साल तक चलते रहा । दौड़ पाते नहीं ,थोड़ी सोहरत मिली तो लोगो ने रनर देने से मन किया, मगर बोलिंग तो थी ना। लेफ्ट आर्म स्पिनर होने के कारन हमेशा बिरोधी को चकमा दिया। एक समय ऐसा भी आया की हर शहर ,गांव के लोगो ने बुलाया और अच्छा करने पर अपने कंधे मे भी उठाया और कुछ पैसे जेव मे डाला। बड़े होते होते ये समझ मे आया की दिव्यांगता के कारण सामान्य क्रिकेट मे अपने करियर को आगे ले जाना संभव नहीं है। और एक क्रिकेट खिलाडी बनने का जो सपना संजो रखा था अटूट मेहनत करके वो अब अधूरा सा लग रहा था। मगर एक चीज किसी इन्शान को टूटने नहीं देती वो है अपने परिवार का हौशला और दोस्तो का उत्शाहवर्धन।
दिव्यांग क्रिकेट की शुरुआत
भाई जहा अच्छे खिलाडी रहे वही मेरे दोस्त मेरे प्रतिद्वन्द्वी, मगर एक बात सब कहते थे की ” मंजिले मिल ही जाये गई भटकते हुए ही सही गुमराह वो है जो घर से निकलते ही नहीं “। बस फिर क्या था निकल पड़े दिव्यांग क्रिकेट की खोज मे। जब कंधे मे किट रखकर सफर मे निकले तो टी टी साहेब ने हालत देखते हुए भी कहा की “आप स्लिपर मे चढ़े है तो 650 रूपया फाइन लगेगा”, इतना तो मै टोटल लेके भी नहीं चला थे, जनरल बोगी मे घुसे तो बथरूम मे जगह मिली और इतनी भीड़ थी की मांगा हुआ जूता भी बथरूम मे छूट गया । भिलाई पहुंचे और ट्रायल दिया और 1999 में मध्य प्रदेश दिव्यांग क्रिकेट टीम का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला और यहीं से उनके प्रोफेशनल दिव्यांग क्रिकेट शुरुआत हु। 2003 से 2007 तक मध्य रेलवे की तरफ से प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला उसी दौरान तमिलनाडु के खिलाफ हुए एक मैच में 57 रन की शानदार पारी खेलते हुए मध्य रेलवे को जीत दिलाने में एक अहम योगदान देने की कोशिश की । परिस्तिथिया विपरीत हुई तो 2008 में एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी मे काम शुरू किया जहा ब्रजेश ने 4125 रुपये से अपनी नौकरी की शुरुआत की। खूब मेहनत किया मगर जीवन मे एक टीश थी की काश मै अपने सपने पूरा कर सकता और सायद भगवन ने मेरी सुन ली। 2014 इंजीनियरिंग की एक श्रेष्ट संस्था भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान इंदौर मे चयन हुआ और यहाँ से उन्होंने पुनः अपने पंखो से उड़न भरी । 2017 में राष्ट्रीय स्तर राष्ट्रीय दिव्यांग क्रिकेट प्रतियोगिता जिसका आयोजन अजमेर में हुआ वहां शानदार प्रदर्शन ने उन्हे दिव्यांग क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित होने वाले मैत्री कप(भारत- बंग्लादेश) मे चयन हुआ और तब से आज तक ब्रजेश भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे है ।
पहले दिव्यांग प्रीमियर लीग मे रहे कप्तान
2021 मे जब सारा देश कोरोना की चपेट मे था उस समय आई पी एल की तर्ज मे शारजाह ,यू ए ई मे आयोजित दिव्यांग प्रीमियर लीग मे ब्रजेश बतौर मुंबई आइडियल्स कप्तान रहा श्रेस्ट प्रदर्शन किया और टीम सेमी फाइनल तक पहुंची। और अब तक चाहे बंग्लादेश मे आयोजित होने वाली 4 देशों की बंगबंधु सीरीज हो , भारत और नेपाल तपन ट्रॉफी हो या टाटा स्टीलीयम कप (भारत बांग्लादेश नेपाल सीरीज) चाहे भारत नेपाल सीसीएल कप सभी में वे देश को प्रतिनिधित्व कर रहे है ।
दिसंबर मे पहले टेस्ट मैच के होंगे कप्तान
भारत और नेपाल टेस्ट सीरीज भारत के मथुरा मे प्रस्तावित है जिसके ब्रजेश कप्तान होंगे
अब इस दिव्यांग क्रिकेट मे क्या लक्ष है
आज 40 साल का हो गया और 23 साल से दिव्यांग क्रिकेट खेल रहा हु मगर दिव्यांग क्रिकेट की हालत जस की तस। बस मन मे ठान लिया की मध्य प्रदेश मे दिव्यांग क्रिकेट खिलाड़िओ के लिए कुछ करुंगा। 2019 मे एक ट्रायल मध्य प्रदेश के मनसोर मे जान सहयोग से आयोजित करवाया वह हमें 21 खिलाडी मिले और फिर वही से एक लक्ष्य रखा और फिर दिव्यांग क्रिकेट एसोशिएशन मध्यप्रदेश के बैनर तले अप्रेल मे देश का पहला राज्य-स्तरीय दिव्यांग क्रिकेट प्रीमियर लीग का जन सहयोग से 10 से 13 अप्रैल जबलपुर मे आयोजित कराया जिसमे हमारे प्रदेश के कोने-कोने से 110 दिव्यांग खिलाड़ियों ने भाग लिया जहां उनके रहने-खाने एवं खेल की सभी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा किया। वर्ष 2021 मे सतना मे भी एक राष्ट्रीय आयोजन कराया गया। इसके साथ ही संभाग स्तर पर खेल को निखारने के लिए एक अंतर संभागीय सीरीज अपने ही एक दिवंगत खिलाडी प्रह्लाद बंजारा जी के नाम से शुरू की( प्रहलाद दिव्यांग ट्रॉफी) जिसमे पुरे प्रदेश के कोने कोने से खिलाडियो को क्रिकेट से जोड़ना एवं प्रोत्साहित करना रहा । यह दूसरा सफल वर्ष चल रहा और आज 9 संभागो की दिव्यांग क्रिकेट टीमों का गठन हो चुका है।
आज आखिरी छोर से आये दिव्यांग भाईओ के चेहरे पर देख कर ब्रजेश को यह लगता है की उन्होने अपने लिए ही सब कुछ किया है। क्यों की मध्य प्रदेश एकलौता राज्य है जहा तकरीबन 250 दिव्यांग खिलाडी क्रिकेट से जुड़ कर अपने खेल का जौहर दिखा रहे है. ब्रजेश का मनाना है की मुझे कई अवार्ड मिले है मगर आज जो खेल का बिस्तार हो रहा है उससे बाद पुरस्कार कुछ भी नही. अंत मे वो कहते है की संघर्ष की राहों पर आज भी अडा हु वक़्त रुकता नही और मै थमता नही


