नई दिल्ली : Indian Premier League 2026 अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। मंगलवार (26 मई) से रविवार (31 मई) के बीच टूर्नामेंट के प्लेऑफ मुकाबले खेले जाएंगे। फाइनल से पहले क्वालिफायर-1, एलिमिनेटर और क्वालिफायर-2 जैसे तीन अहम मैच होंगे। हालांकि, आईपीएल के शुरुआती तीन सीजन 2008, 2009 और 2010 में प्लेऑफ नहीं बल्कि सीधे सेमीफाइनल खेले जाते थे। इंटरनेशनल क्रिकेट टूर्नामेंट में आज भी सेमीफाइनल के जरिए ही फाइनल खेलने वाली दो टीमें तय होती हैं, लेकिन आईपीएल में तीन मुकाबलों वाला प्लेऑफ फॉर्मेट क्यों लागू किया गया? इसके पीछे की वजह काफी दिलचस्प और रोमांच बढ़ाने वाली है।
आईपीएल में प्लेऑफ सिस्टम लागू करने के पीछे सबसे बड़ी वजह लीग स्टेज में टीमों की निरंतरता और मेहनत को सही महत्व देना था। दुनिया की सबसे लोकप्रिय क्रिकेट लीग में शुरुआत से ही 50 से ज्यादा मुकाबले खेले जाते हैं। ऐसे में कोई टीम अगर पूरे सीजन शानदार प्रदर्शन करते हुए 18-20 अंक हासिल करे और सिर्फ एक खराब मैच की वजह से टूर्नामेंट से बाहर हो जाए, तो इसे कहीं न कहीं नाइंसाफी माना जाता है। आईपीएल के शुरुआती तीन सीजन में कुछ ऐसा ही देखने को मिला था। यही कारण रहा कि 2011 से टूर्नामेंट के फॉर्मेट में बदलाव करते हुए सेमीफाइनल की जगह प्लेऑफ सिस्टम लागू किया गया, ताकि टॉप टीमों को फाइनल में पहुंचने के लिए दूसरा मौका मिल सके।
20 अंक जुटाने के बाद भी फाइनल नहीं खेल पाई टीम
आईपीएल 2008 में फाइनल राजस्थान रॉयल्स और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच हुआ था। राजस्थान के 22 अंक थे, लेकिन चेन्नई सुपर किंग्स के 16 अंक ही थे। किंग्स इलेवन पंजाब के 14 मैच में 20 अंक थे। दूसरे सेमीफाइनल में चेन्नई से हारकर पंजाब बाहर हो गई। पहला सेमीफाइनल पहले और चौथे नंबर की टीम के बीच हुआ था। राजस्थान रॉयल्स ने दिल्ली कैपिटल्स 14 अंक को हराकर फाइनल में जगह बनाई थी।
सिर्फ 14 अंक के साथ टीम बनी आईपीएल चैंपियन
आईपीएल 2009 के फाइनल में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और डेक्कन चार्जर्स आमने-सामने थे। उस सीजन लीग चरण में शीर्ष पर रहने वाली दिल्ली टीम ने 20 अंक, जबकि चेन्नई टीम ने 17 अंक हासिल किए थे, लेकिन दोनों टीमें सेमीफाइनल हारकर बाहर हो गईं। वहीं, बेंगलुरु के 16 और डेक्कन चार्जर्स के सिर्फ 14 अंक थे। इसके बावजूद डेक्कन चार्जर्स ने खिताब अपने नाम कर लिया।
आईपीएल 2010 में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। फाइनल में मुंबई टीम 20 अंक और चेन्नई टीम 14 अंक के साथ पहुंची। वहीं, 16 अंक हासिल करने वाली डेक्कन चार्जर्स टीम सेमीफाइनल में ही बाहर हो गई। बेंगलुरु टीम के खाते में भी केवल 14 अंक थे। हालांकि, इस सत्र में तीसरे स्थान का फैसला करने के लिए सेमीफाइनल हारने वाली टीमों के बीच अलग मुकाबला खेला गया, जिसे बेंगलुरु ने 9 विकेट से जीत लिया था।
प्लेऑफ फॉर्मेट से कम हुई महत्वहीन मुकाबलों की संभावना
प्लेऑफ फॉर्मेट की एक बड़ी खासियत यह भी है कि अंतिम-4 में जगह पक्की होने के बाद भी कोई टीम अपने मुकाबलों को हल्के में नहीं ले सकती। टीमों को शीर्ष-2 में जगह बनाने के लिए आखिरी मैच तक पूरी ताकत लगानी पड़ती है, क्योंकि इससे फाइनल में पहुंचने का एक अतिरिक्त मौका मिलता है। आईपीएल 2026 में भी इसका असर साफ देखने को मिला। एक समय ऐसा लग रहा था कि चार टीमों के 18-18 अंक हो जाएंगे। रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु, गुजरात टाइटंस और सनराइजर्स हैदराबाद ने तो यह आंकड़ा हासिल भी कर लिया। अंतिम-4 में पहुंचने के बाद भी बेंगलुरु और हैदराबाद के मुकाबले की अहमियत कम नहीं हुई। प्लेऑफ सिस्टम का फायदा ब्रॉडकास्टर को भी मिलता है, क्योंकि इससे टूर्नामेंट में एक अतिरिक्त हाई-वोल्टेज मुकाबला जुड़ जाता है।
कई बड़ी क्रिकेट लीगों ने अपनाया प्लेऑफ फॉर्मेट
दुनिया की कई बड़ी टी20 क्रिकेट लीगों में भी अब पारंपरिक सेमीफाइनल की जगह प्लेऑफ फॉर्मेट अपनाया जाता है। ऑस्ट्रेलिया की बिग बैश लीग में प्लेऑफ के तहत क्वालिफायर, नॉकआउट और चैलेंजर जैसे मुकाबले खेले जाते हैं। वहीं, कैरेबियन प्रीमियर लीग में पहले एलिमिनेटर होता है, इसके बाद क्वालिफायर-1 और क्वालिफायर-2 मुकाबले आयोजित किए जाते हैं। आईएलटी20 और एसए20 लीग में भी लगभग आईपीएल जैसा ही प्लेऑफ सिस्टम लागू है। पाकिस्तान सुपर लीग में क्वालिफायर, एलिमिनेटर-1 और एलिमिनेटर-2 मुकाबलों के जरिए फाइनल खेलने वाली टीमों का फैसला होता है।


