हॉकी विश्व कप 2026 में भारतीय अंपायर नहीं, चयन प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल

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नई दिल्ली : नीदरलैंड और बेल्जियम की संयुक्त मेजबानी में 15 अगस्त से शुरू होने वाले एफआईएच हॉकी विश्व कप 2026 में करीब तीन दशक बाद ऐसा देखने को मिलेगा, जब टूर्नामेंट में एक भी भारतीय अंपायर या तकनीकी अधिकारी शामिल नहीं होगा। वर्ष 1998 में यूट्रेक्ट में खेले गए विश्व कप के बाद यह पहला अवसर है, जिसने भारतीय हॉकी जगत में निराशा पैदा कर दी है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कई पूर्व खिलाड़ियों और दिग्गजों का मानना है कि अब केवल अंपायरों की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उनकी गुणवत्ता, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक्सपोजर बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।

भारत की ओर से अतीत में आर.वी. रघु प्रसाद, सतिंदर शर्मा, तरलोक सिंह भुल्लर और अमरजीत सिंह बावा जैसे अंपायर विश्व कप में जिम्मेदारी निभा चुके हैं। इनमें रघु प्रसाद का नाम सबसे प्रमुख है, जिन्होंने चार हॉकी विश्व कप में अंपायरिंग की। पिछले वर्ष 47 वर्ष की उम्र में संन्यास लेने वाले रघु प्रसाद पहले एशियाई अंपायर बने थे, जिन्होंने ओलंपिक सहित 200 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में अंपायरिंग का गौरव हासिल किया।

हॉकी विश्व कप 2026 में भारत की बड़ी कमी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रघु प्रसाद ने कहा कि बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों के लिए अंपायरों का चयन एफआईएच (FIH) की अंपायरिंग समिति करती है। चयन के दौरान प्रो लीग और पिछले बड़े टूर्नामेंटों में प्रदर्शन को आधार बनाया जाता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वहीं, पूर्व भारतीय अंपायर सतिंदर शर्मा ने कहा कि अमरजीत सिंह बावा और तरलोक सिंह भुल्लर के बाद उन्होंने और रघु प्रसाद ने भारतीय अंपायरिंग की पहचान को बनाए रखने का काम किया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सतिंदर ने कहा, “यूरोपीय अंपायरों के बीच अपनी जगह बनाना आसान नहीं था। बीजिंग ओलंपिक 2008 में भारतीय टीम क्वालीफाई नहीं कर सकी थी, लेकिन मैं अकेला भारतीय अधिकारी था जो वहां मौजूद था। अब हम निरंतरता बनाए रखने में पिछड़ रहे हैं।”

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हॉकी इंडिया की मई 2025 की सूची के अनुसार, भारत में पुरुष वर्ग में 100 से अधिक और महिला वर्ग में 70 से ज्यादा अंपायर हैं। इसके बावजूद एफआईएच पैनल में भारत की मौजूदगी सीमित है। पुरुष वर्ग में सिर्फ 6 भारतीय अंपायर और महिला वर्ग में 4 अंपायर एफआईएच पैनल का हिस्सा हैं। तकनीकी अधिकारियों के मामले में भी स्थिति लगभग ऐसी ही बनी हुई है।

घरेलू स्तर से विश्व मंच तक पहुंचने की राह में बड़ी चुनौती

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिग्गजों का मानना है कि अगर भारतीय अंपायरों को घरेलू टूर्नामेंटों में ही सीमित रखा जाएगा तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव कैसे मिलेगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सतिंदर शर्मा ने कहा, “घरेलू और अंतरराष्ट्रीय अंपायरिंग में जमीन-आसमान का अंतर होता है। भारतीय टीम के कैंप में भी अंपायरों को शामिल किया जाना चाहिए। देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, जरूरत सिर्फ बेहतर ढांचे और सही अवसरों की है।”

उन्होंने वित्तीय चुनौतियों को भी बड़ी समस्या बताया। अमरजीत सिंह बावा ने अपने समय को याद करते हुए बताया कि तब उन्हें रोजाना सिर्फ 20 रुपये भत्ता मिलता था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वहीं शर्मा ने कहा कि आज भी ज्यादातर भारतीय अंपायरों के पास स्थायी नौकरी नहीं है और उन्हें घरेलू टूर्नामेंटों से मिलने वाली कमाई पर निर्भर रहना पड़ता है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रघु प्रसाद ने कहा, “खिलाड़ियों को पदक जीतने के बाद पहचान और सरकारी नौकरी मिल जाती है, लेकिन अंपायरों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में कोई माता-पिता अपने बच्चे को अंपायरिंग के क्षेत्र में क्यों भेजना चाहेंगे?” मीडिया रिपोर्ट के अनुसार तीनों दिग्गजों ने जोर दिया कि अगर भारत को आने वाले विश्व कप और ओलंपिक में अंपायरिंग के क्षेत्र में मजबूत प्रतिनिधित्व चाहिए, तो अभी से बेहतर योजना, प्रशिक्षण और मजबूत सपोर्ट सिस्टम तैयार करना होगा।

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