नई दिल्ली : भारत में बैडमिंटन स्टार बनना जितना चमकदार नजर आता है, उसकी राह उतनी ही मुश्किल और अक्सर अनदेखी होती है। बड़े मंच पर जीत के बाद जिन खिलाड़ियों पर तालियां बजती हैं, वही खिलाड़ी छोटे टूर्नामेंटों के दौरान बुनियादी खर्च तक जुटाने के लिए संघर्ष करते हैं। कई बार उन्हें होटल का खर्च उठाना मुश्किल होता है, गर्मियों में छतों पर सोना पड़ता है और सफर के दौरान पेट भरने की चिंता सताती रहती है। कई परिवारों के लिए यह खेल सिर्फ जुनून नहीं, बल्कि एक लंबी आर्थिक परीक्षा बन जाता है—जहां जेवर गिरवी रखने पड़ते हैं, पारिवारिक मुश्किलें बढ़ती हैं और सालों तक छुट्टियां तक कुर्बान करनी पड़ती हैं।
जूनियर स्तर से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर शटल, रैकेट, कोर्ट फीस और यात्रा खर्च के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद से भरा होता है। जिस उम्र में खिलाड़ी अपने खेल को निखार रहे होते हैं, उसी समय उनके माता-पिता कर्ज, त्याग और अनिश्चित भविष्य के बीच फैसले ले रहे होते हैं। यह वह कड़वी सच्चाई है, जो अक्सर जीत के जश्न के पीछे छिप जाती है, जहां हर उभरते सितारे के पीछे भूख, कर्ज और अडिग विश्वास का लंबा संघर्ष होता है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन मिथुन मंजूनाथ के संघर्ष की कहानी इसी सच्चाई को सामने लाती है। जूनियर दिनों में छोटे टूर्नामेंट खेलने के दौरान कई बार वे पंखे वाले साधारण होटल का कमरा भी नहीं ले पाते थे। चिपचिपी गर्मियों में वे कपड़ों पर पानी डालकर खुले छतों पर सो जाते थे, ताकि किसी तरह अगला मैच खेलने की ताकत जुटा सकें। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आयुष शेट्टी के परिवार की कहानी भी कम अलग नहीं है। आर्थिक मजबूरियों के चलते उनका परिवार बंट गया। पूरा परिवार उडुपी से बेंगलुरु शिफ्ट नहीं हो सका और उनके पिता को अकेले ही वहीं रहना पड़ा ताकि बेटे का सपना जारी रह सके।
महिला सिंगल्स की कई खिलाड़ियों के घरों में हालात ऐसे हैं कि उनकी माताएं खुद ही फिजियो की भूमिका निभाने लगती हैं। वे पोषण, मसाज तकनीक और एंकल टेपिंग के क्रैश कोर्स सीखती हैं, क्योंकि ट्रैवलिंग फिजियो का खर्च उठाना संभव नहीं होता। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी के पिता का उदाहरण बताता है कि यह संघर्ष कितना गहरा होता है। वे स्थानीय टूर्नामेंटों में लाइनसमैन और चेयर अंपायर बनते थे, ताकि बेटे के बार-बार टूटने वाले रैकेट स्ट्रिंग्स का खर्च निकाला जा सके। यह एक ऐसा खर्च है जो बेटे के करियर के लिए बेहद जरूरी था।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार त्रिसा जॉली की कहानी भी इस संघर्ष की एक और परत खोलती है। घर से दूर अकेले रहकर अभ्यास करना, हॉस्टल की समयसीमा चूक जाने पर भूखे रहना, यह सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता के बावजूद, आर्थिक आत्मनिर्भरता अब भी उनके लिए एक अधूरा सपना है। विडंबना यह है कि जब यही खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर जीतते हैं तो उन्हें सिर आंखों पर बैठाया जाता है, लेकिन जैसे ही प्रदर्शन में गिरावट आती है, सवाल उठने लगते हैं। यहां तक कि विश्व चैंपियनशिप पदक विजेताओं को भी संन्यास लेने की सलाह दी जाती है, उम्र को लेकर ताने दिए जाते हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इन्हें अक्सर खेल की ‘दुखभरी कहानी’ कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जैसे ये सिर्फ भावनात्मक कहानियां हों। हालांकि, सच यह है कि यही कहानियां एक खिलाड़ी बनने की असली कीमत को बयां करती हैं। भारत एक ‘परफेक्ट चैंपियन’ चाहता है, जो सिर्फ जीत के बाद बोले, हमेशा विनम्र रहे और अपने परिवार के संघर्षों को पीछे छोड़ दे, लेकिन यह उम्मीद उस हकीकत से टकराती है, जहां एलीट खेल बेहद महंगा है और हर कदम पर पैसे की चुनौती खड़ी रहती है। असल तस्वीर कहीं ज्यादा कठोर है। सेकेंड-हैंड रैकेट इस्तेमाल किए जाते हैं और महंगे शटल को दोबारा इस्तेमाल करने के लिए बचाया जाता है।
बैडमिंटन अब मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए भारी पड़ता जा रहा है। हैदराबाद से बेंगलुरु, मुंबई से जोधपुर और असम से चेन्नई तक कोच चेतावनी दे रहे हैं कि शटल की बढ़ती कीमतें अकादमियों के संचालन को मुश्किल बना रही हैं। इसका सीधा असर माता-पिता पर पड़ रहा है और धीरे-धीरे यह खेल कई परिवारों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। सरकारी नौकरियों के अवसर कम होते जा रहे हैं, फीस बढ़ रही है और ट्रेनिंग का खर्च लगभग दोगुना हो चुका है। नतीजा यह है कि कई खिलाड़ी बीच में ही खेल छोड़ देते हैं। खासतौर पर तब जब जूनियर स्तर पर उन्हें तुरंत सफलता नहीं मिलती।
कोर्ट बुकिंग, लगातार शटल की जरूरत, रैकेट और जूते; ये सभी खर्च एक परिवार के बजट को हिला देने के लिए काफी होते हैं। जब तक किसी खिलाड़ी को शुरुआती उम्र से मजबूत स्पॉन्सरशिप नहीं मिलती, तब तक 17-18 साल की उम्र तक उन्हें अपने दम पर ही संघर्ष करना पड़ता है। कुछ खिलाड़ी हार मान लेते हैं, जबकि कुछ जिद पर टिके रहते हैं। वे रिश्तेदारों के ताने सुनते हैं, अनिश्चित भविष्य के साथ जीते हैं और फिर भी अपने सपनों को नहीं छोड़ते।
साइना नेहवाल और पीवी सिंधु जैसी असाधारण सफलताओं ने इस सपने को जरूर संभव दिखाया है, लेकिन उस सफर की असली कीमत पर बहुत कम बात होती है। ज्यादातर लोगों ने सिंधु को 2016 ओलंपिक के दौरान जाना, लेकिन उससे पहले उनके करियर को संवारने में कितना संघर्ष और आर्थिक दबाव रहा, यह कम ही लोगों को पता है। कई खिलाड़ी किशोरावस्था तक मेहनत करते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी और दबाव के कारण बीच रास्ते में ही हार मान लेते हैं। यह स्थिति तब और भी दर्दनाक हो जाती है, जब एक खिलाड़ी के सपने के साथ पूरा परिवार अपनी जिंदगी दांव पर लगा देता है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार शायद यह किसी के लिए ‘एक और संघर्ष की कहानी’ लगे, लेकिन हकीकत यही है कि हर उभरते खिलाड़ी के पीछे ऐसे ही अनगिनत अनकहे संघर्ष छिपे होते हैं। चाहे ये बातें बार-बार क्यों न दोहराई जाएं, इन्हें सामने लाना जरूरी है, क्योंकि तभी समझ आता है कि एक पदक सिर्फ मेहनत का नतीजा नहीं होता—उसके पीछे पूरे जीवन की कुर्बानी और अथक समर्पण जुड़ा होता है।


