FIFA World Cup 2026: कैसे देखेंगे वर्ल्ड कप? भारत में फुटबॉल को लेकर FIFA की मुश्किलें

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नई दिल्ली : आप अभी आईपीएल में बिज़ी हैं, लेकिन भारत से बाहर स्पोर्ट्स वर्ल्ड में सबसे बड़े इवेंट का काउंटडाउन चल रहा है और इंतज़ार जून महीने का है। जून 2026 में जब उत्तरी अमेरिका के तीन देशों अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको में फुटबॉल का सबसे बड़ा महाकुंभ शुरू होगा यानी फीफा वर्ल्ड कप 2026, तब दुनिया की एक-चौथाई आबादी टीवी और स्क्रीन्स से चिपकी होगी। इस बार रोनाल्डो के संभवतः आखिरी दांव, मेसी की विरासत के अगले अध्याय और 48 टीमों के नए रोमांच देखने के लिए पूरी दुनिया बेताब है। लेकिन 140 करोड़ की आबादी वाले, खुद को ‘ग्लोबल स्पोर्ट्स पावरहाउस’ कहने वाले भारत में अभी इस बात पर माथापच्ची चल रही है कि इस महाकुंभ को लोग देखेंगे कहां।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, टूर्नामेंट शुरू होने में एक महीने से भी कम का समय बचा है और इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि फीफा वर्ल्ड कप जैसी मेगा इवेंट के लिए अपने यहां कोई ऑफिशियल ब्रॉडकास्टर नहीं मिल रहा है। फीफा के अधिकारी ज्यूरिख से दिल्ली के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन भारतीय मीडिया घराने जेबें सिकोड़कर बैठे हैं। यह स्थिति केवल एक कमर्शियल डील का फेल होना नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि क्रिकेट के ‘अति-केंद्रीकरण’ ने भारतीय स्पोर्ट्स मार्केट को अंदर से कितना खोखला और एकतरफा बना दिया।

सिर्फ पब और सोशल मीडिया पर दीवानगी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अक्सर सोशल मीडिया पर ट्रेंड्स देखकर लगता है कि इंडिया में फुटबॉल को लेकर दीवानगी चरम पर है। कोलकाता के डर्बी से लेकर केरल के मालाबार तक और बेंगलुरु से लेकर मुंबई के पब्स तक, ‘लेवल ऑफ पैशन’ में कोई कमी नहीं दिखती। लेकिन जब इस पैशन को रेवेन्यू यानी मुनाफे में बदलने की बात आती है, तो सारा गणित फेल हो जाता है। मगर एक कड़वा सच ये है कि ‘क्रिकेट बिकता है, बाकी सब केवल दिखाया जाता है।’ सीधी-सी बात है कंपनियों के लिए विज्ञापन का पैसा वहीं जाता है जहां रिटर्न की गारंटी हो। क्रिकेट का कोई मामूली द्विपक्षीय मैच भी भारत में फीफा वर्ल्ड कप के ग्रुप स्टेज मैचों से ज्यादा स्पॉन्सरशिप वैल्यू ले आता है। जब तक खेल से सीधे तौर पर पैसा नहीं बनता, तब तक कोई भी ब्रॉडकास्टर सिर्फ ‘खेल भावना’ या ‘डायवर्सिटी’ के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपये का नुकसान उठाने को तैयार नहीं होता।

सारा मामला पैसों का ही है, क्रिकेट के आगे बाकी खेल पीछे

लेकिन यहां पूरी गलती सिर्फ भारतीय बाज़ार या मीडिया कंपनियों की ही नहीं है. कई बातें ऐसी हैं, जो फीफा को भी भारत के हिसाब से प्रैक्टिकली सोचनी चाहिए. फीफा ने शुरुआत में भारतीय बाजार से करीब 100 मिलियन डॉलर की उम्मीद लगाई थी. जब कोई आगे नहीं आया, तो वे 2026 और 2030 के बंडल राइट्स के लिए करीब 35 से 60 मिलियन डॉलर (लगभग 290 करोड़ से 500 करोड़) पर आ गए. रिलायंस और डिज्नी स्टार के मर्जर के बाद बना JioHotstar इस समय भारतीय स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग का ‘अघोषित किंग’ है.

उनके पास आईपीएल, आईसीसी इवेंट्स और घरेलू क्रिकेट के राइट्स पहले से हैं. जब बाजार में कॉम्पिटिशन ही खत्म हो गया, तो फीफा के सामने मोलभाव करने का विकल्प नहीं बचा. जियोस्टार ने महज 20 मिलियन डॉलर (करीब 165 करोड़) का ऑफर दिया, जिसे फीफा ने अपनी तौहीन समझा. जब आपके पास खरीदार ही एक या दो बचे हों, तो आप अपनी मर्जी की कीमत नहीं वसूल सकते. फीफा को शायद यह अहसास नहीं था कि भारत में उनका मुकाबला किसी दूसरे फुटबॉल लीग से नहीं, बल्कि क्रिकेट नाम के उस ‘सिंडिकेट’ से है जो बाकी खेलों का ऑक्सीजन सोख लेता है.

वैसे इस बार चुनौती सिर्फ पैसों की नहीं है, बल्कि टाइमिंग की भी है। 2026 का वर्ल्ड कप उत्तरी अमेरिका में हो रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि भारत में मैचों का प्रसारण रात के 10 बजे से लेकर सुबह के 6 बजे के बीच होगा। यानी जब ज्यादातर फैन्स सो रहे होंगे, तब मैच हो रहे होंगे और जब आईबॉल नहीं होगा तो फिर विज्ञापन के लिए पैसे कौन देगा। कुल 104 मैचों में से बमुश्किल 12–13 मैच ऐसे होंगे जो भारतीय दर्शकों के लिए प्राइम-टाइम (शाम 7 से 10 के बीच) में आएंगे, बाकी सारे मैच तब होंगे जब भारत सो रहा होगा। अब कोई भी विज्ञापनदाता रात के 3 बजे आने वाले मैच के लिए करोड़ों रुपये के स्लॉट नहीं खरीदेगा। अगर क्रिकेट होता तो बात दूसरी थी, तब तो पूरा देश ही जागता।

ऊपर से भारतीय डिजिटल इकोसिस्टम में विज्ञापनों की मंदी चल रही है. स्टार्टअप्स की फंडिंग रुकी हुई है, और रियल-मनी गेमिंग पर भारत सरकार के कड़े टैक्स नियमों के बाद से स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग को मिलने वाला एक बहुत बड़ा रेवेन्यू सोर्स वैसे ही सूख चुका है. ऐसे में 2022 के कतर वर्ल्ड कप (जहां वायकॉम18 ने 500 करोड़ खर्च किए थे) जैसा दांव दोबारा लगाना किसी भी कंपनी के लिए वित्तीय आत्महत्या जैसा है. यह संकट इस हद तक बढ़ चुका है कि अब दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर हो चुकी है.

कोर्ट से गुहार लगाई गई है कि सरकार और प्रसार भारती (दूरदर्शन) को हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि देश के करोड़ों फुटबॉल फैंस को ‘ब्लैकआउट’ का सामना न करना पड़े. लेकिन सवाल यह है कि क्या टैक्सपेयर्स के पैसे का इस्तेमाल फीफा जैसी दुनिया की सबसे अमीर खेल संस्था की जिद पूरी करने के लिए किया जाना चाहिए? प्रसार भारती अगर इसे खरीदता भी है, तो वह फीफा की शर्तों पर नहीं बल्कि अपनी कमर्शियल लिमिट्स में खरीदेगा. यह पूरी स्थिति दर्शाती है कि भारत में खेल नीतियां और खेल का बाजार कितना असंतुलित है.

क्रिकेट के आगे कुछ भी नहीं, फीफा वर्ल्ड कप की मुश्किलें

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हम अक्सर कहते हैं कि भारत में फुटबॉल क्यों नहीं पनप पा रहा? इसका जवाब इंफ्रास्ट्रक्चर या टैलेंट की कमी से ज्यादा हमारे ‘स्पोर्टिंग कल्चर’ में छिपा है। भारत में क्रिकेट एक खेल नहीं, एक सामाजिक रस्म बन चुका है। बचपन से ही बच्चों को बैट थमाया जाता है, कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप क्रिकेट अकादमियों में बहती है, और राजनीतिज्ञों के लिए स्टेट क्रिकेट असोसिएशन का अध्यक्ष बनना पावर का सबसे बड़ा सिंबल है। फुटबॉल को भारत में हमेशा एक ‘विदेशी’ या ‘एलिट’ खेल के रूप में देखा गया, सिवाय कुछ चुनिंदा राज्यों (बंगाल, केरल, गोवा, नॉर्थ-ईस्ट) के। जब देश की नेशनल टीम (ब्लू टाइगर्स) फीफा रैंकिंग में लगातार संघर्ष कर रही हो, तो घरेलू दर्शकों का जुड़ाव अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से सिर्फ ‘मेसी-रोनाल्डो’ के ग्लैमर तक सीमित रह जाता है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जब तक आपकी खुद की टीम वर्ल्ड कप नहीं खेल रही होती, तब तक उस खेल के प्रति देश का कमर्शियल कमिटमेंट हमेशा डांवाडोल रहता है। फीफा वर्ल्ड कप 2026 के राइट्स का यह बवाल भारतीय स्पोर्ट्स इंडस्ट्री के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है. यह दिखाता है कि भारत अब किसी भी इंटरनेशनल स्पोर्ट्स प्रॉपर्टी के लिए आंख मूंदकर पैसे बहाने को तैयार नहीं है, चाहे वह फीफा ही क्यों न हो. बाजार अपने हिसाब से करेक्शन कर रहा है. यदि आखिरी वक्त पर अमेज़न प्राइम या यूट्यूब जैसे किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म के साथ कोई ‘कट-प्राइस’ (सस्ते दाम वाली) डील नहीं होती है, तो यह भारत के स्पोर्ट्स फैंस के लिए एक बड़ा झटका होगा.

लेकिन यह झटका जरूरी भी है। यह सोचने के लिए कि क्या हम वाकई एक ‘स्पोर्टिंग नेशन’ हैं, या हम सिर्फ एक ऐसे देश हैं जो चार साल में एक बार फुटबॉल का बुखार चढ़ने का नाटक करता है और बाकी के दिन क्रिकेट के साए में गुजार देता है। फीफा को भी समझना होगा कि 140 करोड़ की आबादी का मतलब सीधे तौर पर 140 करोड़ डॉलर की कमाई नहीं होता। बाजार की अपनी जमीनी हकीकत होती है, और फिलहाल वह हकीकत फुटबॉल के पक्ष में नहीं है। बाकी आप देखेंगे कि जैसे-जैसे फुटबॉल वर्ल्ड कप करीब आएगा, वैसे ही आपके आसपास फुटबॉल के कई एक्सपर्ट होंगे, कई बार में वर्ल्ड कप स्पेशल डील भी मिलेंगी और मैच देखने का माहौल तैयार होगा।

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