गोलियों की गूंज में खिला ‘सफ्टबॉल’ का फूल, माता-पिता को खोकर भी नहीं मानी हार

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माओवादी हिंसा के बाद अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमका बस्तर का बेटा राकेश

बस्तर, छत्तीसगढ़। बस्तर की धरती पर माओवादी हिंसा की कहानियां अक्सर दुख और निराशा से भरी होती हैं। यहाँ गोलियों और धमाकों की गूँज में कई बेकसूर ज़िंदगी खत्म हो गईं और अनगिनत घर उजड़ गए। लेकिन इसी अँधेरे के बीच एक ऐसी कहानी ने जन्म लिया, जिसने सिर्फ़ बस्तर ही नहीं, बल्कि पूरे देश का नाम रोशन कर दिया। यह कहानी है राकेश कड़ती की – एक ऐसे जांबाज़ बेटे की, जिसने बचपन में ही माओवादी हिंसा में अपने माता-पिता को खो दिया, लेकिन हार मानने के बजाय अपने सपनों को हकीकत में बदल दिया। आज वही राकेश भारत के अंतरराष्ट्रीय सॉफ्टबॉल खिलाड़ी बनकर नए इतिहास रच रहे हैं।

जब ज़िंदगी में छा गया अंधेरा

राकेश के लिए सब कुछ सामान्य था। वह अपने माता-पिता, सोमैया और शांति कड़ती, के साथ बस्तर में खुशी-खुशी रहते थे। पर एक दिन उनकी दुनिया पूरी तरह से उजड़ गई। माओवादियों ने उनके माता-पिता को निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया। जिस उम्र में एक बच्चे को माँ-बाप का सहारा और प्यार चाहिए होता है, उसी उम्र में राकेश की ज़िंदगी में घना अँधेरा छा गया। वह अकेले रह गए। उनका भविष्य अंधकारमय लग रहा था, क्योंकि कोई सहारा नहीं था। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था। केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) ने इस अनाथ बच्चे का हाथ थाम लिया। यह एक ऐसी पहल थी, जिसने राकेश की ज़िंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। सीआरपीएफ ने उन्हें ‘टुमारो फाउंडेशन’ में दाखिला दिलाया। यहीं से राकेश को एक नई राह मिली, जिसने उनके टूटे सपनों को फिर से जोड़ने का काम किया।

पढ़ाई और खेल का अनोखा संगम

टुमारो फाउंडेशन में राकेश की पढ़ाई फिर से शुरू हुई। वह तब तीसरी कक्षा में थे। पढ़ाई के साथ ही उन्हें सॉफ्टबॉल जैसे खेल के बारे में पता चला। 2017 में जब बीजापुर में सॉफ्टबॉल अकादमी की स्थापना हुई, तब राकेश की ज़िंदगी ने एक और नया मोड़ लिया। वहाँ के कोच सोपान करनेवार ने राकेश के अंदर छिपी प्रतिभा को तुरंत पहचान लिया। उन्होंने राकेश को अकादमी से जोड़ लिया और उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई। राकेश ने अपने लगन और मेहनत से सबको चौंका दिया। वह पढ़ाई में भी आगे रहे। आज वह सिर्फ़ एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी ही नहीं हैं, बल्कि कॉमर्स में 12वीं कक्षा की पढ़ाई भी कर रहे हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि खेल और पढ़ाई दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, बस ज़रूरत है तो सही मार्गदर्शन और मेहनत की।

बस्तर से एशिया कप तक का सफ़र

राकेश के खेलने का तरीका भी बेहद खास है। वह टीम में पिचर की भूमिका निभाते हैं, जो कि सॉफ्टबॉल में एक बहुत ही महत्वपूर्ण जगह है। उन्होंने अब तक 14 राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया है। उनका प्रदर्शन इतना शानदार रहा कि उन्हें भारतीय टीम में जगह मिल गई। 2023 में उन्होंने अंडर-18 एशिया कप में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया और फिर 2025 में थाईलैंड में हुए अंडर-23 एशिया कप में भी हिस्सा लेकर सबको चौंका दिया। यह सिर्फ़ एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह बस्तर के लिए गर्व का पल था। राकेश ने अपनी मेहनत से साबित कर दिया कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर हौसला बुलंद हो तो हर मंज़िल पाई जा सकती है। उनकी कहानी उन लाखों युवाओं के लिए एक प्रेरणा है जो छोटी-छोटी मुश्किलों से हार मान लेते हैं।

‘शहीद कौशल यादव अवार्ड’ से होंगे सम्मानित

राकेश की इस असाधारण उपलब्धि को देखते हुए, उन्हें इस साल राष्ट्रीय खेल दिवस पर एक और बड़ा सम्मान मिलने जा रहा है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय उन्हें ‘शहीद कौशल यादव अवार्ड’ से सम्मानित करेंगे। यह समारोह मुख्यमंत्री के जापान और कोरिया के दौरे से लौटने के बाद आयोजित होगा। यह सम्मान सिर्फ़ राकेश की मेहनत का फल नहीं है, बल्कि यह पूरे बीजापुर और बस्तर के लिए गर्व का क्षण है। यह पहली बार है जब इस क्षेत्र के किसी खिलाड़ी को राज्य स्तरीय खेल सम्मान से नवाजा जा रहा है। यह सम्मान यह भी दर्शाता है कि हिंसा और खोखली विचारधारा इंसान के जज़्बे को नहीं दबा सकती। माओवादी गोलियों ने उनके माता-पिता को छीन लिया, लेकिन उनके सपनों को नहीं मार पाईं।

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