कड़ी मेहनत लाई रंग, सब्जी विक्रेता के बेटे ने विश्व कुश्ती में जीता रजत पदक

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नई दिल्ली : अंडर-23 विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के लगातार तीन संस्करणों (2024, 2025 और 2026) में ग्रीको-रोमन वर्ग में विश्वजीत मोरे भारत के एकमात्र पदक विजेता रहे हैं। महाराष्ट्र के कोल्हापुर के रहने वाले 22 वर्षीय विश्वजीत ने गुरुवार को लास वेगास में इतिहास रचते हुए इस प्रतियोगिता के ग्रीको-रोमन वर्ग के फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय पहलवान बनने का गौरव हासिल किया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हालांकि, 55 किलोग्राम भारवर्ग के खिताबी मुकाबले में उन्हें जॉर्जिया के कोबा कारुमिजदे के खिलाफ 12-13 से करीबी हार का सामना करना पड़ा और रजत पदक से संतोष करना पड़ा।

मोरे ने फाइनल तक के सफर में ईरान और रूस जैसे कुश्ती के दिग्गज देशों के पहलवानों को हराकर भारत की मौजूदगी दर्ज कराई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वह कोल्हापुर जिले के सरवाड़े गांव के एक ऐसे परिवार से आते हैं, जो खेती और सब्जियां बेचने का काम करता है। रामचंद्र मोरे और पार्वती के बेटे के सामने अंतरराष्ट्रीय पहलवान बनने का सपना पूरा करने की राह आसान नहीं रही।

जिस सफलता की परिवार को नहीं थी उम्मीद, विश्वजीत ने वह कर दिखाया

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कोल्हापुर से उनके बड़े भाई विनायक ने बताया, ‘हम एक किसान परिवार हैं। मेरे पिता हमारे खेत में उगाई गई सब्जियां बेचते हैं। फसल कटाई के समय मेरी मां खेत में उनकी मदद करती हैं। विश्वजीत बचपन में कुश्ती लड़ता था, लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि वह इस मुकाम तक पहुंच जाएगा।’

बचपन में ही अखाड़े से जुड़ गए थे विश्वजीत

छह साल की उम्र में विश्वजीत अपने गांव के अखाड़े में जाया करता था, जहां इस खेल में उनकी दिलचस्पी पैदा हुई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार विनायक ने बताया, ‘बचपन में वह नियमित रूप से अखाड़े में जाता था और वहां प्रशिक्षण ले रहे अन्य लोगों के साथ कुश्ती लड़ता था। पहले तो हमें लगा कि यह बस एक शौक है, लेकिन जब उसने पदक जीतना शुरू किया तो हमें एहसास हुआ कि वह इसमें एक अच्छा करियर बना सकता है।’

खुद की जरूरतें घटाईं, विश्वजीत के कुश्ती के सपने को दी उड़ान

जब विश्वजीत ने कुश्ती आगे बढ़ना शुरू किया, तो मोरे परिवार को इसके लिए काफी संसाधनों की जरूरत पड़ी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भाई ने याद करते हुए बताया, ‘पहलवान बनना कोई आसान काम नहीं है। जूनियर स्तर पर भी उसे सही डाइट की जरूरत होती थी, क्योंकि मुकाबला काफी कड़ा होता था। विश्वजीत को ठीक से खाना-पीना मिल सके, इसके लिए मेरे पिता को घर के बाकी खर्चों में कटौती करनी पड़ी।”

‘आर्मी बॉयज कंपनी’ में चयन से विश्वजीत

इन बलिदानों का फल तब मिला जब 2019 में 15 साल की उम्र में विश्वजीत का चयन बेलगाम की ‘आर्मी बॉयज कंपनी’ में हो गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भाई ने बताया, ‘वह परिवार में सबसे छोटा है। जब उसका चयन ‘आर्मी बॉयज कंपनी’ में हुआ, तो हमें गर्व भी हुआ और थोड़ा दुख भी, लेकिन यह चयन उसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने का एक बेहतरीन रास्ता साबित हुआ।’

अनजान खेल से विश्व चैंपियनशिप के फाइनल तक पहुंचे विश्वजीत

विश्वजीत 48 किलो के पहलवान के तौर पर ‘आर्मी बॉयज कंपनी’ में शामिल हुए, जिन्हें ‘ग्रेको-रोमन’ कुश्ती के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने कोच के रूप में काम कर रहे सूबेदार रंजीत महादिक की देखरेख में यह कला सीखी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रंजीत ने बताया, ‘उसे ग्रीको-रोमन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। यह सब उसके लिए बिल्कुल नया था। उसने हमारे साथ सेंटर में 6-7 साल तक ट्रेनिंग की, लगातार बेहतर होता गया और मेडल जीतता रहा। हर साल जैसे-जैसे उसका आयु-वर्ग बदलता गया, अंडर-15 से अंडर-17 और फिर अंडर-20 में वह अपने वेट कैटेगरी में नेशनल लेवल पर मेडल जीतता रहा। हमारे पास 30 अच्छे पहलवान हैं जो यहां उसके साथ अभ्यास करते थे। इससे उसका तेजी से विकास हुआ।’

विश्वजीत को सेना की ‘मिशन ओलंपिक विंग’ में मिला मौका

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार अच्छी प्रगति और पदक जीतने की बदौलत विश्वजीत सेना में हवलदार के पद पर भर्ती हुए। उन्हें सेना की ‘मिशन ओलंपिक विंग’ में शामिल किया गया। फिलहाल, वह पुणे स्थित आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट (ASI) में प्रशिक्षण ले रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रणजीत ने कहा, ‘एएसआई में उन्हें और बेहतर अनुभव मिला। उनकी सबसे बड़ी खूबी खेल की उनकी समझ है। खेल की रणनीतियों को समझने के मामले में उनका कोई सानी नहीं है।’

विश्व चैंपियनशिप में रजत के बाद अब सीनियर स्तर पर नजरें

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप में तीन मेडल जीतने के बाद रंजीत को लगता है कि विश्वजीत के लिए आगे कदम बढ़ाने का यह सही समय है। उनके पूर्व कोच ने जोर देकर कहा, ‘वह सीनियर स्तर पर अपनी छाप छोड़ने के लिए तैयार है। आज का मेडल ऐतिहासिक था, लेकिन मुझे यकीन है कि उसके लिए अभी और भी कई मेडल आने बाकी हैं।’

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