ज्यूरिख. अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति (International Olympic Committee) ने बड़ा फैसला लेते हुए घोषणा की है कि 2028 में होने वाले लॉस एंजिल्स ओलिंपिक से ट्रांसजेंडर महिलाओं को महिलाओं की कैटेगरी में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी। नए नियम के अनुसार अब केवल वही खिलाड़ी महिला वर्ग में हिस्सा ले सकेंगी, जो जैविक रूप से जन्म से महिला हैं। IOC ने कहा है कि प्रतियोगिताओं में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह निर्णय लिया गया है। समिति का मानना है कि जन्म से पुरुष और बाद में जेंडर परिवर्तन करने वाले खिलाड़ियों को शारीरिक रूप से कुछ प्राकृतिक लाभ मिल सकते हैं, जिन्हें पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
नई नीति के तहत खिलाड़ियों को SRY जीन स्क्रीनिंग टेस्ट से गुजरना होगा, जिससे उनके जैविक लिंग की पुष्टि की जाएगी। यह जांच थूक, गाल के स्वैब या ब्लड सैंपल के जरिए की जा सकती है। IOC की प्रेसिडेंट Kirsty Coventry ने इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि ओलिंपिक स्तर पर जीत और हार के बीच बहुत मामूली अंतर होता है, ऐसे में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पेरिस ओलिंपिक 2024 के दौरान दो महिला बॉक्सरों को लेकर विवाद सामने आया था। अल्जीरिया की Imane Khelif और ताइवान की Lin Yu-ting की भागीदारी पर सवाल उठे थे। दोनों खिलाड़ियों ने अपने-अपने वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था, लेकिन उनकी पात्रता को लेकर काफी बहस हुई थी।
IOC का कहना है कि यह नियम केवल प्रोफेशनल खेलों पर लागू होगा और जमीनी स्तर के खेल इससे प्रभावित नहीं होंगे। साथ ही यह नीति सभी खेल संगठनों के लिए एक समान दिशा तय करने के उद्देश्य से लाई गई है, ताकि अलग-अलग नियमों की स्थिति खत्म हो सके। गौरतलब है कि पहले IOC ट्रांसजेंडर महिलाओं को टेस्टोस्टेरोन स्तर कम रखने की शर्त पर खेलने की अनुमति देता था या फिर निर्णय संबंधित खेल संघों पर छोड़ दिया जाता था। इस फैसले के बाद DSD (डिफरेंस ऑफ सेक्स डेवलपमेंट) एथलीट्स पर भी असर पड़ सकता है। इसमें वे खिलाड़ी शामिल हैं जिनके शरीर में सामान्य XX क्रोमोसोम नहीं होते।
दक्षिण अफ्रीका की मशहूर एथलीट Caster Semenya ने इस तरह के नियमों की आलोचना करते हुए इसे बहिष्कार जैसा बताया है। इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज होने की संभावना है, क्योंकि मानवाधिकार संगठनों और कई एक्टिविस्ट्स ने पहले भी ऐसे नियमों पर सवाल उठाए हैं। वहीं दूसरी ओर IOC का तर्क है कि खेलों में समान अवसर और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह कदम जरूरी है।


