ड्रेसिंग रूम में उपहास, मैदान पर ‘कालिया’, अपनों के तानों ने तोड़ा हौसला, शिवरामकृष्णन की दर्दनाक कहानी

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नई दिल्ली : सिर्फ 17 साल की उम्र, जन्मदिन और सामने रखा केक— लेकिन मुस्कुराने की जगह आँखों में आंसू थे। लक्ष्मण शिवरामकृष्णन के लिए यह सफर किसी सामान्य क्रिकेट करियर जैसा नहीं था, बल्कि तानों, तिरस्कार और रंगभेद से भरी एक ऐसी कठिन यात्रा थी, जिसने उनके आत्मविश्वास को भीतर तक झकझोर दिया। मैदान पर भीड़ उन्हें ‘कालिया’ कहकर पुकारती रही, तो ड्रेसिंग रूम में अपने ही साथी ‘कुरूप’ कहकर उनका मजाक उड़ाते रहे, जिससे उनके मन पर गहरा असर पड़ा।

लगातार चोट पहुंचाने वाले ऐसे शब्दों ने एक युवा खिलाड़ी के मन में ऐसा जहर घोला कि वह खुद से ही डरने लगा। खुद को आईने में देखने से बचने लगा, रातों में डरकर जागता रहा और धीरे-धीरे अवसाद की गहराइयों में उतरता चला गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह कहानी सिर्फ एक क्रिकेटर की नहीं, बल्कि उस दर्द की है, जो तब सबसे ज्यादा चुभता है जब अपने ही आपको तोड़ने लगें। लक्ष्मण शिवरामकृष्णन भारतीय टीम के साथ पाकिस्तान दौरे पर थे। उसी दौरान उनका 17वां जन्मदिन पड़ा। जन्मदिन पर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन को केक काटने के लिए बुलाया गया। वह केक महान सुनील गावस्कर ने उनके लिए मंगवाया था।

तभी एक साथी खिलाड़ी ने केक को देखकर सुनील गावस्कर से कहा, ‘अरे सनी, तुमने बिल्कुल सही रंग का केक मंगवाया है। एक सांवले लड़के के लिए इतना गहरा चॉकलेट केक।’ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने बताया, ‘मैं रोने लगा और मैंने केक काटने से मना कर दिया। तब सुनील गावस्कर को मुझे शांत कराना पड़ा और फिर मैंने आंखों में आंसू लिए केक काटा।’

लक्ष्मण शिवरामकृष्णन के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। चौदह साल की उम्र में भारत के एक वरिष्ठ बल्लेबाज ने चेपॉक में उन्हें ग्राउंड स्टाफ समझ लिया था और उनसे अपने जूते साफ करने को कहा था। तमिलनाडु के ड्रेसिंग रूम में बड़े खिलाड़ी उसे ‘कुरूप’ कहकर बुलाते थे। उत्तर भारत के स्टेडियम में जब वह बाउंड्री पर फील्डिंग करते थे तो भी भीड़ ‘कालिया-कालिया’ के नारे लगाती थी।

मुंबई के एक होटल में एक गेटकीपर ने उन्हें दोबारा अंदर आने से मना कर दिया, जबकि उस समय वह भारतीय टीम का हिस्सा थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार गेटकीपर ने उनका रंग और उनकी उम्र देखी और कहा ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह भारतीय क्रिकेटर हों। उन्हें अपने किसी साथी खिलाड़ी का इंतजार करना पड़ा जो उनकी तस्दीक दे सके। इसमें एक घंटा लग गया। मुंबई का यह होटल नरीमन पॉइंट पर स्थित ट्राइडेंट है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने बताया, ‘उसके बाद मुझे अहसास हुआ कि मुझे अपने साथ चाबियां रखनी चाहिए, लेकिन जब भी मैं गेट के पास पहुंचता तो डर के मारे कांपने लगता। इस डर से कि कहीं मुझे फिर से मना करके बाहर न निकाल दिया जाए। तब मैं सोलह साल का था।’ लक्ष्मण शिवरामकृष्णन के लिए भारत का पाकिस्तान दौरा किसी डरावने सपने से कम नहीं था।

पाकिस्तान की भीड़ का अपना ही अंदाज था। पूरे एक महीने तक ‘कालिया, कालिया, कालिया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ’लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने बताया, ‘इन सब बातों की वजह से मैं ऐसी स्थिति में पहुंच गया, जहां एक इंसान के तौर पर मेरा आत्म-सम्मान बहुत कम हो गया था। जब इतनी कम उम्र में आपका आत्म-सम्मान इतना कम हो जाए तो आत्मविश्वास लाना बहुत मुश्किल होता है। मैं हमेशा भूलना चाहता था, भूलना चाहता था, भूलना चाहता था, लेकिन आपके अवचेतन मन की गहराई में यह हमेशा रहता है और फिर बाहर आ ही जाता है।’

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने बताया, मैं पूरी तरह से टूट चुका था और मैं खुद को आईने में देखना भी नहीं चाहता था। मैं शराब पीकर सो जाता। यह सब मैं इसलिए करता था, क्योंकि मैं कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। जब भी मैं सोकर उठता तो मुझे लगता कि मैं मरने वाला हूं। शराब ही एकमात्र ऐसी चीज थी जिससे मुझे नींद आती थी।’ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने बताया, ‘इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के दौरान हम जब कभी-कभी दुबई में सफर कर रहे होते थे तो वहां कोई स्पीड लिमिट नहीं होती थी। अगर गाड़ी बहुत तेज चलती तो मेरे मन में कुछ ऐसा आता कि बस दरवाजा खोलूं और कूद जाऊं। किसी तरह, किसी चीज ने मुझे बेवकूफी भरा ऐसा कोई भी काम करने से रोक लिया।’

लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने अपने कठिन दौर को याद करते हुए बताया कि उस समय उनकी मानसिक स्थिति बहुत परेशान करने वाली हो गई थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि रात में उन्हें मतिभ्रम होने लगता था—आंखें बंद करते ही डरावनी तस्वीरें सामने आने लगती हैं, जिन्हें वे कल्पना में भी नहीं सोच सकते थे। जब वे आंखें चूकते हैं, तो आसपास कुछ भी नहीं होता, लेकिन थकान इतनी होती कि सोना जरूरी लगता है। जैसे ही दोबारा आंखें बंद करते, वही जलन दृश्य लौट आते। इस तरह बार-बार आंखें खोलने और बंद करने के बीच उनकी नींद पूरी तरह से उड़ जाती थी, जिससे उनकी स्थिति और भी खराब होती चली गई।

लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने अपने संघर्ष भरे दौर का जिक्र करते हुए बताया कि शराब और डिप्रेशन एक-दूसरे को और बढ़ने गए। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि शराब पीने से उनका डिप्रेशन गहराता गया और उसी डिप्रेशन के कारण शराब की लत भी बढ़ती चली गई। यह एक ऐसा चक्र बन गया, जिसमें वे हर बार और उलते चले गए। बाहर की दुनिया भी उन्हें यही कहती रही कि उनकी स्थिति की वजह से शराब है, जिससे उन पर मानसिक दबाव और बढ़ता गया।

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