नई दिल्ली : जिस शख्स ने दुनिया की ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहराकर देश का गौरव बढ़ाया और अपने साहस के दम पर तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार, देश के सर्वोच्च साहसिक सम्मान, से नवाजा गया, आज वही रोज़गार के लिए संघर्ष कर रहा है। दिव्यांग पर्वतारोही उदय कुमार अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए स्विगी-जोमैटो में डिलीवरी पार्टनर के रूप में काम कर रहे हैं और रैपिडो भी चला रहे हैं। वर्ष 2015 में हुए एक भीषण ट्रेन हादसे में पैर गंवाने के बाद उनकी जिंदगी ने कई कठिन मोड़ देखे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अब सम्मान और उपलब्धियों के बावजूद स्थायी नौकरी का इंतजार उनकी संघर्षभरी कहानी को एक नया सवाल दे रहा है।
उदय कुमार को कभी लगा कि अब जीने का कोई मतलब नहीं बचा, लेकिन तीन साल के बेटे के एक मासूम सवाल- ‘पापा, झूला क्यों लगा रहे हैं?’ ने उन्हें मौत के मुहाने से खींच लिया। उसी दिन उन्होंने भविष्य में कभी भी हार न मानने की कसम खाई। उन्होंने अपने टूटे हुए सपनों को फिर से जोड़ा, दुनिया की ऊंची चोटियों पर तिरंगा लहराया। हालांकि विडंबना देखिए उदय कुमार ने तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार तक का सफर तो तय कर लिया, लेकिन देश के सर्वोच्च खेल सम्मानों में से एक पाने के बाद भी उन्हें सम्मानजनक नौकरी नहीं मिली। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिव्यांग पर्वतारोही उदय कुमार ने अपनी जिंदगी के इन दर्दनाक और प्रेरक पलों को साझा किया।
सवाल: कैसे, कब और क्या हुआ?
- उदय कुमार: मेरी जर्नी स्टार्ट होती है 19 अक्टूबर 2015 को। नॉर्मल लाइफ से चलते-चलते चैलेंजिंग लाइफ में कनवर्ट होना। मैं बिहार के छपरा से कोलकाता के लिए सफर कर रहा था। जैसे ही मेरा डेस्टिनेशन आने वाला था। वह 2015 का साल था।
- मतलब उतना स्वच्छ कुछ था नहीं, ट्रेन में बेसिन वगैरह। मैं जैसे ही बेसिन पर गया, देखा वह पूरा पानी से लबालब भरा हुआ था और उसका पाइप जाम लग रहा था। ट्रेन चल रही थी तो पानी छलककर नीचे फैला हुआ था। ट्रेन चल रही थी तो मैंने मुंह धोने का सोचा।
- जैसे ही हाथ में पानी लेकर चेहरे पर मारा, तभी एक जर्क आया और मैं शरीर का संतुलन बना नहीं पाया। पैर फिसला मैं बाहर गिरा। चूंकि ट्रेन रनिंग थी और मैंने मैंने रॉड को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन तब तक प्लेटफॉर्म आ गया और ट्रेन और प्लेटफॉर्म के बीच में मेरा पैर फंस गया।
- ट्रेन चलती रही और पैर पूरा प्लेटफॉर्म में लगकर खराब हो गया। फिर जब प्लेटफॉर्म पर ट्रेन रुकी तो मैं हाथ छोड़ा तो गिर पड़ा और एक पत्थर स्पाइनल में घुस गया। जैसे तैसे फिर से खड़ा हुआ, लेकिन पैर तो था नहीं कि खड़ा हो पाता, इसलिए फिर गिर पड़ा। फिर एक पत्थर सिर में घुस गया।
- फिर हाथों के बल मैं प्लेटफॉर्म तक पहुंचा। चिल्लाया बचाओ मुझे हॉस्पिटल ले चलो। तभी 3-4 जवान लड़के मेरे पास आये। मुझे लगा कि मेरी मदद करेंगे, लेकिन उन्होंने पर्स, मोबाइल सब कुछ निकाल लिया। जेब खंगाली और जो भी था वह सब लेकर भाग गए।
- उदय कुमार: फिर जैसे तैसे खुद को संभाला, बेहोश हो गया था। होश में आया तो पास एक फैमिली के कुछ लोग थे। उन्होंने पूछा कि कहां रहते हो, क्या करते और सब विस्तार से बताया। फिर उन्होंने मेरे घर पर फोन किया और मेरे ऑफिस में फोन किया।
- उस समय मैं एक निजी कंपनी में कॉन्ट्रैक्चुअल लेबर के तौर पर काम करता था। वहां से फिर एम्बुलेंस और सिक्योरिटी गार्ड आकर रेसक्यू किया और हॉस्पिटल में ले जाकर पैर काट दिया गया। फिर जैसे तैसे खुद को संभाला। अस्पताल से घर आया।
- शरीर से लगभग पूरा खून तो निकल ही चुका था। आप समझ सकते हैं एक दिन में 4-5 अस्पतालों में ले जाया जाना और 6-7 बार ऑपरेशन होना कितना दुखद था। मैं घर पर था एक दिन पत्नी ने बोला कि बिस्तर पर थोड़ा खड़े हो जाइए।
- खाना हो चुका था। मैं शरीर को बैलेंस नहीं कर पाया, क्योंकि मेरे दाहिने पैर में सिर्फ अंगुलियां हैं और उनमें से सिर्फ तीन ही काम करती हैं। एक टेढ़ी हो गई है। …तो बैलेंस नहीं कर पाया अपने शरीर को और अपने बेटे के हाथ पर गिर गया।
- उदय कुमार: मेरे गिरने से बेटे का हाथ बीच से टूट गया। सामने मेरी मां बैठी हुई थी। मां यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई। सोचिए मैं इकलौता लड़का, मेरा इकलौता लड़का। मां को सबकुछ बिखरते हुए लगा। उन्हें हार्ट अटैक आ गया। वह बड़ा हृदयविदारक दृश्य था।
- मेरे बेट का हाथ टूटा हुआ है। मेरा पैर कटा हुआ है। मां को हार्ट अटैक आ गया है। सामान्यतया किसी के भी परिवार में ऐसा हो तो सदम ही लगेगा। जैसे-तैसे मां को उस रात अस्पताल पहुंचाया, बेटे को अस्पताल पहुंचाया। उस दिन मुझे लगा कि लोग सही कहते हैं मुझे जीना नहीं चाहिए।
- मुझे मर जाना चाहिए। मैं परिवार के ऊपर बोझ हूं। ये सारी चीजें देखकर… मतलब मैंने प्लान किया कि मैं अब नहीं जीऊंगा। मैं खुद को खत्म कर लूंगा। दो-चार दिन बाद मम्मी और बेटा अस्पताल से घर आ चुके थे और फिर एक शाम पत्नी बोली कि मैं बाजार जा रही हूं, अपना ख्याल रखिएगा।
- मैंने सोचा कि यही अच्छा टाइम है खुद को खत्म करने का। मैंने घर में नायलोन की रस्सी खोजी और जैसे-तैसे हैंगिंग किया। गर्दन में लगा कर जैसे ही झूलने वाला था। तब तक मेरा तीन साल का बेटा, उसके हाथ में प्लास्टर बंधा हुआ था, मेरे सामने खड़ा था। वह बोला- ‘पापा झूला क्यों लगा रहे हैं?’
- उदय कुमार: उसके शब्दों ने मुझे इतना तोड़ दिया कि मैंने खुद को रस्सी से अलग किया और बच्चे से लिपटकर रोने लगा। उसी समय अचानक मेरे पापा का चेहरा, मेरे जीजाजी का चेहरा सामने आने लगा, क्योंकि पापा का देहांत 2013 में हो चुका था। मेरे जीजाजी का देहांत 2012 में हो चुका था।
- मैं हर कठिन परिस्थितियों को देख चुका था कि पिता के न होने की वजह से कितनी तकलीफ होती है। मम्मी को कितना दर्द है। दीदी पर क्या बीतती है। भांजे पर क्या गुजरती है। मैंने सोचा कि मैं वही सब चीजें अपने भांजे, अपने बेटे, बेटियों को देने जा रहा हूं, पत्नी को देने जा रहा हूं।
- उस दिन मैंने खुद से वादा किया कि चाहे कितनी भी कठिन परिस्थिति आ जाए, खुद को टूटने नहीं दूंगा, बिखरने नहीं दूंगा। एक ऐसी कहानी लिखूंगा कि कोई भी जनरेशन का शख्स आत्महत्या या कुछ भी गलत कदम उठाने से पहले 10 बार सोचेगा। जो भी मेरी कहानी पढ़ेंगे। वे नई शुरुआत करेंगे।
- उदय कुमार: इसके बाद मैंने एक टूल के सहारे, एक मैराथन के सहारे अपनी जिंदगी की नई शुरुआत की। माउंटेनिंग फील्ड में गया। तब तक कोविड आ चुका था। सारी दुनिया, सब कुछ सन्न, सब कुछ खत्म। बहुत मेहनत से मैंने खुद को दोबारा ‘खड़ा’ किया था।
- कोविड के दौरान प्रधानमंत्रीजी की एक स्पीच आती है कि ‘आपदा में अवसर का विस्तार’ करिए। आप घर में हैं तो यह नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया है। कहीं से भी शुरुआत हो सकती है। इस पंक्ति ने मुझे इतना मोटिवेट किया कि मुझे लगा कि शायद प्रधानमंत्रीजी मुझे ही बोल रहे हैं।
- उदय कुमार: मैंने सोचा कि क्या मैं अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना सकता हूं। …और फिर हिमालय माउंटेन इंस्टीट्यूट के प्रिंसिपल ग्रुप कैप्टन जय किशन सर ई-मेल के माध्यम से संपर्क किया। उन्होंने भरपूर मदद की। मदद करने के पहले उन्होंने बहुत समझाया।
- जय किशन सर ने कहा कि पर्वतारोहण गेम में 100 प्रतिशत फिजिकल, मेंटल और बैक बोन सपोर्ट की जरूरत होती है। तुम्हारा तो कुछ भी नहीं है, तुम नहीं कर पाओगे। लेकिन मेरी जिद के कारण सर बोले ठीक है, एक मौका देते हैं… और मैं उस मौके पर खरा उतरा।
- एक के बाद एक, मतलब ट्रेनिंग 10 दिन, 18 दिन और फिर कंचनजंगा, 16 हजार 500 फीट की ऊंचाई पर 780 वर्ग फीट के राष्ट्रीय तिरंगा को मैंने फहराया और माउंट किलिमंजारो (साउथ अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी, 19 हजार 341 फीट) के 17 घंटे की ट्रैकिंग के दौरान 7800 वर्गफीट का राष्ट्रीय तिरंगा, जिसका वजन लगभग 80 किलो था, उसे फहराया। उसके बाद 13 हजार फीट से स्काई डाइविंग और स्कूबा डाइविंग भी की।
- उदय कुमार: मैं भारत का पहला पुरुष दिव्यांग हूं, जिसने जल, थल और वायु तीनों जगह भारतीय तिरंगा लहराया। मैं पहला दिव्यांग लड़का हूं, जिसे तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया और संघर्ष जारी है।
सम्मान मिला, सुर्खियां मिलीं… लेकिन नौकरी अब भी नहीं
उदय कुमार: कोशिश कर रहा हूं कि मेरी राज्य सरकारें (बिहार और पश्चिम बंगाल) मेरी बातें सुने। कुछ हद तक लग रहा है कि हो सकता है, क्योंकि बिहार की खेल मंत्री श्रेयांसी सिंह हैं। वह भी निशानेबाज हैं। उनसे कई बार मिल चुका हूं। शायद हो सकता है कि कुछ अच्छा हो।
तेनजिंग नोर्गे सम्मान के बाद भी मुश्किलें क्यों खत्म नहीं हुईं?
उदय कुमार: दिक्कत है थोड़ी। हो सकता है कि नियमावली में मेरे गेम को जगह नहीं मिल पाई है। यह प्रोसेसिंग में है। मैं तो सरकार का हिस्सा नहीं हूं। बस प्रयास कर रहा हूं। ताकि मुझे मेरे सम्मान का एक संसाधन मिले। मैं बच्चों को पढ़ा लिखा सकूं। अच्छा मतलब एक छोटी सी जिंदगी गुजार सकूं।
सवाल: नौकरी के लिए कहां-कहां लगाई गुहार?
उदय कुमार: मैं बिहार से हूं तो मैंने अपने राज्य के खेल विभाग में संपर्क किया। खेल विभाग के डीजी और जीएडी (सार्वजनिक प्रशासनिक विभाग) डिपार्टमेंट और खेल मंत्री से मिला। सबसे मिल चुका हूं। अभी मैं फिलहाल पश्चिम बंगाल में रह रहा हूं तो वहां के भी खेल मंत्री से अप्रोच कर चुका हूं।
सवाल: हादसे के बाद रोजी-रोटी का सहारा क्या बना?
उदय कुमार: जब नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाता हूं तो लोगों की नजरें अचीवमेंट पर नहीं और किसी चीज पर नहीं, सीधा पैर पर जाती है। वे सोचते हैं कि इसका पैर नहीं है। पिछली कंपनी में था तो वहां से भी हटा दिया गया। मतलब विकलांग लोगों को कौन लेना चाहेगा। बस किसी तरह स्विगी, जोमैटो की डिलीवरी कर या फिर रैपिडो चलाकर खर्चा चलाता हूं।
सवाल: एक पैर के बावजूद रैपिडो कैसे चलाते हैं?
उदय कुमार: मेरी स्कूटर में दोनों साइड व्हील लगे हुए हैं तो उसमें गिरने का डर नहीं रहता है। किसी तरह चला लेता हूं। मतलब जिंदगी है तो प्रयास तो करना ही पड़ेगा। बेटे और बेटी को पढ़ाना भी है। कभी कुछ लोग मोटिवेशनल स्पीच देने के लिए भी बुला लेते हैं।


