लंदन। दुनिया के खेल मंच पर इन दिनों ‘वंडरकिड्स’ का दौर चल रहा है, जहां कम उम्र के खिलाड़ी बड़े रिकॉर्ड तोड़ते हुए सुर्खियों में छा रहे हैं। फुटबॉल में मैक्स डॉवमैन, क्रिकेट में वैभव सूर्यवंशी, डार्ट्स में ल्यूक लिटलर और टेनिस में एमा राडुकानू जैसे टीनएजर्स कम उम्र में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। वहीं स्केटबोर्डिंग में स्काई ब्राउन और फॉर्मूला-1 में किमी एंटोनेली भी इसी ट्रेंड को आगे बढ़ा रहे हैं।
क्रिकेट में 14 साल के वैभव सूर्यवंशी सबसे युवा खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने आईपीएल और अंडर-19 वर्ल्ड कप जैसे बड़े मंचों पर खेलते हुए शतक भी जड़ा है। इसी तरह फुटबॉल में डॉवमैन ने कम उम्र में गोल कर इतिहास रच दिया, जबकि लिटलर और स्काई ब्राउन ने अपने-अपने खेलों में वर्ल्ड चैंपियन बनकर यह साबित किया कि उम्र अब बड़ी बाधा नहीं रही।
हालांकि दिलचस्प बात यह है कि एक ओर जहां टीनएजर्स तेजी से उभर रहे हैं, वहीं आंकड़े बताते हैं कि खिलाड़ियों की औसत उम्र बढ़ी है। 1992 से 2021 के बीच ओलंपिक खिलाड़ियों की औसत उम्र करीब दो साल बढ़ी है। यानी खिलाड़ी अब लंबे समय तक शीर्ष स्तर पर टिके रह रहे हैं, लेकिन नई प्रतिभाएं पहले से कहीं जल्दी सामने आ रही हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक इस बदलाव के पीछे आधुनिक स्पोर्ट्स साइंस, बेहतर ट्रेनिंग सिस्टम और मानसिक तैयारी अहम भूमिका निभा रहे हैं। आज खिलाड़ियों को फिजिकल, मेडिकल और साइकोलॉजिकल सपोर्ट कम उम्र में ही मिलने लगा है, जिससे वे बड़े मंच के दबाव को आसानी से संभाल पा रहे हैं। हालांकि, इस तेजी से मिल रही सफलता के साथ सावधानी भी जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि 22-23 साल की उम्र तक शरीर और दिमाग पूरी तरह विकसित होते हैं, इसलिए युवा खिलाड़ियों के वर्कलोड और मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना जरूरी है, ताकि वे लंबे समय तक अपने करियर में सफल रह सकें।


