फुटबॉल का सपना टूटा तो बॉक्सिंग में चमके यदुमणि सिंह

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नई दिल्ली : कई बार जिंदगी इंसान के सामने ऐसी मुश्किलें खड़ी कर देती है, जिन्हें देखकर लगता है कि अब आगे बढ़ना संभव नहीं है। लेकिन कुछ लोग इन्हीं चुनौतियों को अपनी ताकत और पहचान बना लेते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भारतीय सेना के हवलदार यदुमणि सिंह भी ऐसे ही जुझारू खिलाड़ियों में शामिल हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए जाम्बिया के म्वाले को हराकर सेमीफाइनल में जगह बनाई और भारत के लिए कम से कम एक पदक पक्का कर दिया। इससे पहले यदुमणि ने पाकिस्तान के सुमामा रहमान को 5-0 से हराकर क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया था।

यदुमणि ने सिंह पहले राउंड में स्कॉटलैंड के आरोन कुलेन को भी इसी अंतर से मात दी थी। हालांकि, यदुमणि सिंह की इन जीतों की असली कहानी रिंग में नहीं, बल्कि उस दौर में लिखी गई थी, जब उनका वजन इतना कम था कि वह मुक्केबाजी की सबसे हल्की भार श्रेणी में भी फिट नहीं बैठते थे। यह कहानी सिर्फ एक पदक की नहीं, बल्कि उस युवा की है, जिसने अपने शरीर की कमजोरी को अपने इरादों की ताकत से हरा दिया।

फुटबॉल का सपना टूटा तो बॉक्सिंग में चमके यदुमणि सिंह

मणिपुर के एक छोटे से गांव में पले-बढ़े यदुमणि सिंह का बचपन फुटबॉल के मैदानों में बीता। वह ब्राजील के स्टार फुटबॉलर नेमार के दीवाने थे। परिवार पढ़ाई पर जोर देता था, इसलिए कई बार चुपके से घर से निकलकर फुटबॉल खेलने चले जाते थे। अगर उस समय किसी ने उनसे पूछा होता कि बड़े होकर क्या बनना चाहते हो, तो शायद उनका जवाब फुटबॉलर होता, लेकिन जिंदगी ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।

चाचा ने बदली यदुमणि सिंह की जिंदगी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यदुमणि के चाचा मंडेंगबाम मिलन सिंह को लगता था कि व्यक्तिगत खेल में उनके भतीजे का भविष्य ज्यादा सुरक्षित होगा। वह उन्हें एक दिन बॉक्सिंग अकादमी ले गए। उस समय यदुमणि को मुक्केबाजी के नियम तक नहीं मालूम थे। कभी-कभी जिंदगी के सबसे बड़े फैसले हम नहीं लेते, वक्त हमारे लिए ले लेता है। यदुमणि के जीवन में भी वही हुआ।

28 किलो से पदक तक का सफर, यदुमणि सिंह की प्रेरक कहानी

साल 2016 का जिलास्तरीय टूर्नामेंट। यदुमणि का वजन करीब 28 किलो था, जबकि उन्होंने 36 किलो वर्ग में हिस्सा लिया। यह फैसला किसी भी युवा खिलाड़ी के लिए जोखिम भरा था। हालांकि, यदुमणि ने सिर्फ मैच खेला, बल्कि प्रतियोगिता जीत ली। वह जीत केवल एक पदक नहीं थी। दर्शक दीर्घा में मौजूद भारत की महान मुक्केबाज मैरीकॉम और एल सरिता देवी उनकी जिद और जज्बे से इतनी प्रभावित हुईं कि दोनों ने उन्हें 500-500 रुपये इनाम दिए। एक हजार रुपये की रकम छोटी थी, लेकिन उस दिन यदुमणि को पहली बार महसूस हुआ कि शायद उनकी मंजिल फुटबॉल नहीं, बॉक्सिंग है।

कोई खिलाड़ी नहीं, मुश्किल हालात थे सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी

प्रतिभा ने उन्हें पुणे स्थित आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट तक पहुंचा दिया। बाद में वह भारतीय सेना की 11 गोरखा राइफल्स में हवलदार बने। सेना ने उन्हें अनुशासन दिया, प्रशिक्षण दिया और बेहतर सुविधाएं भी, लेकिन यह ऐसी लड़ाई थी, जिसमें सामने कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। प्रतिद्वंद्वी था उनका अपना शरीर। साल 2018 में उनका वजन इतना कम था कि वह 46 किलो वर्ग में भी नहीं उतर सकते थे।
करीब दो साल तक वजन 38 किलो के आसपास ही अटका रहा। जब वजन बढ़ा और प्रतियोगिताओं में लौटने की उम्मीद जगी, तभी कोरोना महामारी ने खेलों की दुनिया रोक दी। कम वजन और महामारी…। इन दोनों ने मिलकर उनके करियर के लगभग चार सबसे अहम साल छीन लिए। कई खिलाड़ी शायद यहीं टूट जाते। यदुमणि नहीं टूटे।

55 किलो वर्ग में उतरने की जिद ने बदली यदुमणि की जिंदगी

2022 में वापसी के बाद यदुमणि ने 50 किलो वर्ग में शानदार प्रदर्शन किया और विश्व बॉक्सिंग कप फाइनल्स में भारत के लिए रजत पदक जीता, लेकिन उनका लक्ष्य उससे बड़ा था। वह था ओलंपिक। ओलंपिक में सबसे हल्का भार वर्ग 55 किलो है, इसलिए उन्होंने पांच किलो ऊपर जाने का फैसला किया। यह जोखिम आसान नहीं था। परिवार ने समझाया कि उनकी लंबाई इस वर्ग के लिए पर्याप्त नहीं है। कई लोगों ने कहा कि बड़े और ताकतवर मुक्केबाजों के सामने टिकना मुश्किल होगा। यदुमणि ने बाद में स्वीकार किया कि अगर उन्हें यह मौका नहीं मिलता, तो वह मुक्केबाजी छोड़ने तक का मन बना चुके थे। आखिरकार उन्होंने अपने पहले कोच लीशांगथेम चिंगलेन (पूर्व विश्व पदक विजेता सरिता देवी और सर्विसेज के मुख्य कोच एसके बेरवाल) का भरोसा जीता।

यदुमणि के उस प्रदर्शन ने बदल दी हर किसी की राय

55 किलो भार वर्ग में उतरते ही यदुमणि सिंह ने ओलंपियन अमित पंघाल जैसे दिग्गज को हराया। फिर सीनियर राष्ट्रीय चैंपियन बने और प्रतियोगिता के सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज भी चुने गए। जिस खिलाड़ी को कभी लोग हल्का समझते थे, वही अब अपने से बड़े और अनुभवी मुक्केबाजों पर भारी पड़ रहा था।

पाकिस्तान के खिलाफ यदुमणि की शानदार जीत

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में यदुमणि सिंह ने अपने अभियान की शुरुआत स्कॉटलैंड के आरोन कुलेन को 5-0 से हराकर की। इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान के सुमामा रहमान को भी इसी अंतर से मात देकर शानदार प्रदर्शन जारी रखा। मुकाबले के बाद यदुमणि ने अपनी जीत कारगिल के वीर सैनिकों को समर्पित की। यही वजह है कि यह जीत महज स्कोरलाइन तक सीमित नहीं रह जाती। यह उस भारतीय सैनिक के जज्बे की जीत भी है, जो सीमा की रक्षा करने वाली वर्दी पहनता है और उसी अनुशासन, साहस और समर्पण के साथ रिंग में भी देश के लिए लड़ता है।

सिर्फ यदुमणि की नहीं, यह कहानी है हर उस जज्बे की

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यदुमणि सिंह की कहानी बताती है कि जिंदगी में मौजूद कोई कमी हमेशा आपकी सबसे बड़ी बाधा नहीं बनती। कभी उनका वजन मुक्केबाजी के लिए कम था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। आज वही खिलाड़ी दुनिया के सबसे कठिन भार वर्गों में भारत की उम्मीद बनकर उभरे हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उनकी कहानी यह भी सिखाती है कि प्रतिभा जरूरी है, लेकिन मंजिल तक वही पहुंचता है जो धैर्य रखता है, हार नहीं मानता और सही समय आने तक अपने सपनों को जिंदा रखता है। शायद इसलिए यदुमणि सिंह सिर्फ एक मुक्केबाज नहीं, बल्कि उस विश्वास का नाम हैं जो कहता है—हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो इतिहास रचा जा सकता है।

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