नई दिल्ली : मणिपुर के एक छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रमंडल खेलों के पोडियम तक पहुंचने वाले ऋषिकांत सिंह चानंबम की कहानी केवल रजत पदक जीतने की नहीं, बल्कि कठिन संघर्ष, दृढ़ संकल्प और अटूट हौसले की मिसाल है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक जीतने के बाद उन्होंने उन मुश्किल दिनों को याद किया, जिन्होंने उन्हें हर चुनौती का सामना करना सिखाया। ग्लासगो में पदक जीतने के बाद जब ऋषिकांत डिनर के लिए पहुंचे, तो उनकी नजर वहां काम कर रहे रसोई कर्मियों पर ठहर गई। उन लोगों को देखकर उन्हें अपने संघर्ष के दिन याद आ गए, जब जीवनयापन के लिए उन्हें भी छोटे-छोटे काम करने पड़े थे। यही कठिन अनुभव आज उनकी सफलता की सबसे बड़ी ताकत बन गए।
जेब में रखा मेडल उन्हें उस दौर की याद दिला गया, जब वह मणिपुर के एक ढाबे पर 150 रुपये की दिहाड़ी में बर्तन धोते और पानी ढोते थे। गरीबी, भूख और संघर्ष से शुरू हुआ यह सफर अब उन्हें भारत के लिए इतिहास रचने वाले भारोत्तोलकों की कतार में खड़ा कर चुका है। ऋषिकांत सिंह अब उन लाखों युवाओं के लिए भी उम्मीद की मिसाल बन गए जो अभावों के बीच अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं।
ग्लासगो में पदक जीतने की कामयाबी के कुछ घंटों बाद ही भारतीय नौसेना के पेटी ऑफिसर ऋषिकांत सिंह उन महीनों को याद कर रहे थे जिन्होंने उन्हें आज का इंसान बनाया। ऋषिकांत सिंह का बचपन दिन में ढाबे पर बर्तन धोते, पानी ढोते और शाम को कंस्ट्रक्शन साइट्स पर मजदूरी करते हुए बीता है। वह मणिपुर की राजधानी इंफाल में न्गाइहाक्तांग मखा मानिंग लीकाई गांव के पास सड़क किनारे बने एक ढाबे पर काम कर रोजाना 150 रुपये कमाते थे ताकि उनके परिवार को दोनों वक्त का खाना मिल पाए।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऋषिकांत सिंह ने ग्लासगो से बताया, टीनएजर के तौर पर स्पोर्ट्स में आने से पहले मैं परिवार के लिए अतिरिक्त पैसे कमाने के लिए कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने के अलावा, एक लोकल ढाबे पर बर्तन धोने और पानी ढोने का काम करता था। मेरे पिता, इराबोत सिंह चानंबम टैक्सी ड्राइवर थे। हमारे घर के हालात इतने खराब थे कि हम दिन में सिर्फ एक बार ही खाना खा पाते थे। मुझे याद है कि मेरी मां चंद्रजिनी देवी चानंबम चावल या आटे को गूंथकर गोलियां बना देती थीं, जिन्हें हम बिना सब्जी के खाते थे।’’
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऋषिकांत सिंह ने बताया, ‘‘तीन महीने से ज्यादा समय तक मैंने परिवार की मदद के लिए 150 रुपये रोजाना पर काम किया। आज जब मैं अपनी जेब में सिल्वर मेडल रखकर डिनर कर रहा था और किचन स्टाफ को काम करते हुए देख रहा था तो मुझे वे सभी दिन याद आ गए। यह मेडल मेरे जैसे लोगों के लिए है, जिन्हें कोई सपोर्ट नहीं मिला और जिन्हें अपने परिवार का बोझ उठाना पड़ा।’’
इंफाल के एक छोटे से गांव से कॉमनवेल्थ गेम्स के पोडियम तक का सफर लगभग इत्तेफाक से शुरू हुआ। गांव के एक मेले में एक स्पोर्ट्स टीचर की नजर इस दुबले-पतले लड़के पर पड़ी। उस समय 12 साल के ऋषिकांत खुमान लम्पक स्टेडियम की SAI अकादमी में ट्रायल के लिए पहुंचे। उन्हें बॉक्सिंग और वेटलिफ्टिंग दोनों के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था। इसके बाद कोच एस ब्रोजेंद्र सिंह ने फाइनल फैसला लिया।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कोच ब्रोजेंद्र सिंह याद करते हैं, ‘‘जब ऋषिकंत सिंह ट्रायल के लिए आए तो वह बहुत दुबले-पतले थे, लेकिन उनकी मांसपेशियां बहुत मजबूत थीं। मुझे उनकी आंखों जबरदस्त इच्छाशक्ति दिखी और उन्होंने बहुत आसानी से वेटलिफ्टिंग अपना ली।’’ ब्रोजेंद्र सिंह अभी मणिपुर वेटलिफ्टिंग एसोसिएशन के सेक्रेटरी हैं।
जिस स्टेडियम ने मीराबाई चानू जैसे चैंपियन तैयार किए, उसी ने ऋषिकंत को एक ऐसी चीज भी दी जिसे वह कभी हल्के में नहीं लेते थे और वह थी नियमित रूप से खाना। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऋषिकंत ने बताया, ‘‘स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में ट्रेनिंग करने का मतलब था कि मुझे खाने के समय की चिंता नहीं करनी पड़ती थी। मैं बेकार हो चुके बेल्ट या जूतों को सही कराने के लिए स्थानीय स्पोर्ट्स की दुकानों पर जाता था।’’
18 साल की उम्र में पहुंचने के बाद ऋषिकांत सिंह ने लगभग एक वर्ष तक वेटलिफ्टिंग से दूरी बना ली थी। परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था और न तो नौकरी की कोई संभावना थी, न ही भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का भरोसा। ऐसे हालात में उन्होंने घर पर रहकर यह मान लिया कि उनका वेटलिफ्टिंग करियर अब समाप्त हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऋषिकांत ने उन कठिन दिनों को याद करते हुए कहा, “मेरा हौसला पूरी तरह टूट गया था। परिवार में अक्सर आर्थिक परेशानियों की चर्चा होती थी और लोग कहते थे कि जिनके पास पर्याप्त संसाधन हैं, वे भी पदक नहीं जीत पाते। ऐसे माहौल में मुझे लगने लगा था कि शायद मेरा सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा।”
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऋषिकांत ने बताया, “हमें यह भी पता नहीं था कि खेलों के जरिए नौकरी पाने का रास्ता खुल सकता है। तभी मणिपुर वेटलिफ्टिंग एसोसिएशन के तत्कालीन सचिव सुनील इलांगबम का फोन आया। उन्होंने मेरी ट्रेनिंग के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि परिवार की आर्थिक तंगी के कारण मैंने वेटलिफ्टिंग छोड़ दी है और मैं SAI अकादमी के लिए भी पात्र नहीं हूं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ” उन्होंने आगे कहा, “सुनील सर ने मुझे इम्फाल के तक्येल स्थित ‘वेटलिफ्टिंग सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के बारे में बताया। मैंने वहां ट्रायल दिया और मेरा चयन हो गया। वह मेरे जीवन का सबसे बड़ा मोड़ था। ऐसा लगा जैसे मुझे नई जिंदगी मिल गई हो और अपने सपनों को फिर से जीने का मौका मिल गया।”


