रवि शास्त्री की कहानी: नजरअंदाज होने से सम्मानित बनने तक, वानखेड़े में मिली पहचान

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नई दिल्ली : जब मैं पहली बार वानखेड़े स्टेडियम पहुंचा था, तब मेरी उम्र सिर्फ 12 साल थी। मैं बस और ट्रेन से सफर करके नॉर्थ स्टैंड तक पहुंचा और वहीं बैठकर क्रिकेट देखा। यह साल 1974 की बात है। उस समय मैं एक छोटा बच्चा था और पूरे दिन वहां रुक भी नहीं पाया, लेकिन यहीं से मेरे क्रिकेट सफर की शुरुआत हुई। वानखेड़े का मशहूर नॉर्थ स्टैंड, जहां कॉलेज और स्कूल के छात्र, अपने कोच के साथ, एक साथ बैठते थे। यह देश की सबसे ज्यादा जानकारी रखने वाली भीड़ थी। यहीं पर क्रिकेट को सही मायनों में समझा जाता था। यह कहना कि वानखेड़े के अंदर मेरे नाम पर एक स्टैंड होना मेरे लिए एक सपना सच होने जैसा है, शायद काफी नहीं होगा।

मेरी कामयाबी पर सबसे ज्यादा गर्व मां को है

जब मेरी मां ने सुना कि स्टैंड का नाम मेरे नाम पर रखा जाएगा तो उनसे ज्यादा गर्व किसी को नहीं हुआ। वह क्रिकेट की चलती-फिरती इनसाइक्लोपीडिया हैं। वह सब कुछ देखती हैं। मेरा पूरा परिवार वहां मौजूद रहेगा। साथ ही मेरे करीबी दोस्त और वे क्रिकेटर भी जिनके साथ मैं खेला (स्कूल से कॉलेज-यूनिवर्सिटी और रणजी ट्रॉफी तक) हूं।

मुझे पता है कि इसमें कितनी मेहनत और खून-पसीना लगा है। उन्हें भी यह बात पता है। मेरा परिवार वर्षों तक हर मैच में आता रहा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार न्होंने यह सब अपनी आंखों से देखा। फिर वह दौर भी आया जब लोग मेरा मजाक उड़ाते थे। रवि शास्त्री हाय, हाय, हाय। मेरे पिता डॉक्टर थे। उन्होंने कहा, ‘‘अब मैं और नहीं आऊंगा और फिर वह कभी नहीं आए।’’

‘हाय-हाय’ से ‘Hi-Hi’ तक: शास्त्री ने बताया भारतीय पब्लिसिटी का सच

इसके बाद मैं भारतीय टीम का कोच बना और फिर कमेंटेटर के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। जो कभी ‘हाय-हाय’ की आवाजें सुनाई देती थीं, वही समय के साथ ‘Hi-Hi’ में बदल गईं। यही भारतीय पब्लिसिटी का स्वभाव है—जब तक आप इसे समझ नहीं लेते, तब तक इसमें टिक पाना मुश्किल है। आपको मानसिक रूप से बेहद मजबूत बनना पड़ता है, लोहे से भी ज्यादा मजबूत। जो भीड़ एक वक्त आपकी हूटिंग करती है, वही भीड़ टेस्ट मैच में सिर्फ 30 रन बनाने पर आपको स्टैंडिंग ओवेशन भी देती है, बशर्ते वह समझ सके कि उन 30 रनों के पीछे आपने कितनी मेहनत और संघर्ष झेला है।

जब मैं एक टेस्ट मैच में खेल रहा एक युवा था- सिर्फ 30 रनों के लिए वह जोरदार तालियों की गड़गड़ाहट, बस वहीं से मुंबई की जनता के लिए मेरे दिल में प्यार पक्का हो गया। यहां की जनता को खेल की ऐसी समझ है जो आपको हर जगह नहीं मिलती। वानखेड़े मेरे क्रिकेट करियर के कई सुनहरे पलों का गवाह रहा है।

एक बार रणजी ट्रॉफी के एक मैच में मैं 17 रन बनाकर रन आउट हो गया था। मेरी दिली तमन्ना थी कि मैं यहां शतक बनाऊं। फिर 1984 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट शतक लगाया। फिर रणजी ट्रॉफी का फाइनल- जिसे मैंने मुंबई के कप्तान के तौर पर युवा खिलाड़ियों की एक टीम के साथ जीता था।
यहीं पर मैंने बड़ौदा के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच में एक ओवर में छह छक्के लगाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। सच कहूं तो मुझे शायद 10 या 15 साल बाद तक यह समझ ही नहीं आया कि यह कितनी बड़ी उपलब्धि थी।

मैं जमैका पहुंचा तो वहां दूर से ही एक टैक्सी ड्राइवर चिल्लाकर बोला, ‘‘शास्त्री साहब, 6 छक्के! उसने वेस्टइंडीज में मेरे शतकों का जिक्र नहीं किया। बारबाडोस में बनाए शतक का भी नहीं। बस उन 6 छक्कों का। मैंने उससे कहा- मैंने बारबाडोस में शतक भी बनाए हैं। उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा; उसे तो बस वे 6 छक्के ही याद थे।’’

आजकल खिलाड़ी नियमित रूप से सैकड़ों रन बनाते हैं, लेकिन एक ही ओवर में छह छक्के फिर से देखने के लिए- शायद कुछ और साल इंतजार करना पड़े। इस मैदान से जुड़ी यादें एक खास अंदाज में जमा होती हैं। मुझे यह भी बहुत दिलचस्प लगता है कि मेरे नाम वाला स्टैंड प्रेस बॉक्स के बहुत करीब है। उन दिनों अगर अखबारों में आपके स्कूल के स्कोर का जिक्र नहीं होता था तो आपकी कोई पहचान नहीं होती थी।

15 साल की उम्र से ही वानखेड़े का प्रेस बॉक्स मेरे लिए मायने रखने लगा था। एक ऐसा खिलाड़ी जो सामने वाले स्टैंड से मैच देखते हुए बड़ा हुआ और फिर उसी जगह पर अपने नाम का एक स्टैंड होना। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है। मीडिया के बिना मैं कुछ भी नहीं होता। आप अपनी पहचान अपनी काबिलियत के दम पर बनाते हैं। न कोई चमचागिरी, न कोई शॉर्टकट।

क्रिकेट से मेरा जुड़ाव तब शुरू हुआ, जब वानखेड़े से ट्रेनें दिखाई देती थीं। वेस्टर्न लाइन, हार्बर लाइन- हम जिस खेल से प्यार करते थे, उसे खेलने के लिए इन्हीं ट्रेनों से सफर करते थे और बाद में घर लौटने के लिए भी उन्हीं ट्रेनों का इस्तेमाल करते थे। हम इस बारे में सपने देखते थे कि क्या-कुछ मुमकिन हो सकता है।

हाल (इसी मार्च में) ही की बात है। मैं वानखेड़े जा रहा था- जैसाकि मैं पहले भी कई बार कर चुका था। यह इंग्लैंड के खिलाफ वर्ल्ड T20 सेमी-फाइनल से पहले की बात है। मैं अपनी बेटी के साथ कार में था। ट्रैफिक जाम इतना जबरदस्त था कि मैं कार से उतर गया और हम पैदल ही चल पड़े। चर्चगेट स्टेशन से लेकर मैदान तक। मैं टॉस के लिए ठीक समय पर पहुंच गया। टॉस किया, दूसरी तरफ गया और कमेंट्री शुरू कर दी।

कमेंटेटर बॉक्स तक का सफर मुझे बहुत कुछ बता गया। शहर कितना बदल गया था। शहर कितना आगे बढ़ चुका था, लेकिन वह महक, वे सड़कें, वे यादें- सब कुछ एक साथ उमड़ आया, क्योंकि असल में कुछ भी जरूरी नहीं बदला था। स्टेडियम के पास आज भी ए रोड, सी रोड और डी रोड ही हैं। शहर उन चीजों के इर्द-गिर्द बदलता है जो मायने रखती हैं, लेकिन जो चीजें मायने रखती हैं, वे वैसी ही बनी रहती हैं।

इस पल को बयां करने के लिए शब्द कम पड़ गए

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बीसीसीआई, बॉम्बे क्रिकेट एसोसिएशन और मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन को मैंने हमेशा अपने अभिभावक की तरह माना है। वानखेड़े स्टेडियम के साथ मेरा जुड़ाव नॉर्थ स्टैंड से शुरू हुआ, जहां मैं बस और ट्रेन से सफर करके पहुंचता था। टॉस के समय पर पहुंचने के लिए चर्चगेट से पैदल चलकर ट्रैफिक के बीच से गुजरना भी मेरे लिए आम बात थी। अब स्थिति यह है कि शायद इस रविवार को आईपीएल मैच में मैं ही टॉस कराऊं और वानखेड़े में एक स्टैंड मेरे नाम पर होगा। इस पूरे सफर और सम्मान के अहसास को शब्दों में बयां करना मेरे लिए बेहद मुश्किल है।

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