लाल से सफेद गेंद तक का सफर, हॉकी से कैसे जुड़ा है इसका कनेक्शन?

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नई दिल्ली : क्रिकेट में आज तीनों प्रारूपों के अनुसार अलग-अलग रंग की गेंदों का उपयोग किया जाता है। टेस्ट क्रिकेट पारंपरिक लाल गेंद से खेला जाता है, जबकि वनडे और टी20 मुकाबलों में सफेद गेंद का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा डे-नाइट टेस्ट मैचों के लिए गुलाबी गेंद भी प्रचलन में है, हालांकि ऐसे मुकाबले कम होने के कारण इसका उपयोग सीमित है। शुरुआती दौर में क्रिकेट सिर्फ लाल गेंद से खेला जाता था। उस समय खिलाड़ी सफेद जर्सी पहनते थे और सभी मुकाबले दिन के उजाले में आयोजित होते थे। इसलिए लाल गेंद स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी और लंबे समय तक यही क्रिकेट की पहचान बनी रही।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार क्रिकेट में आज तीनों प्रारूपों के अनुसार अलग-अलग रंग की गेंदों का उपयोग किया जाता है। टेस्ट क्रिकेट पारंपरिक लाल गेंद से खेला जाता है, जबकि वनडे और टी20 मुकाबलों में सफेद गेंद का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा डे-नाइट टेस्ट मैचों के लिए गुलाबी गेंद भी प्रचलन में है, हालांकि ऐसे मुकाबले कम होने के कारण इसका उपयोग सीमित है। शुरुआती दौर में क्रिकेट सिर्फ लाल गेंद से खेला जाता था। उस समय खिलाड़ी सफेद जर्सी पहनते थे और सभी मुकाबले दिन के उजाले में आयोजित होते थे। इसलिए लाल गेंद स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी और लंबे समय तक यही क्रिकेट की पहचान बनी रही।

हॉकी से कैसे जुड़ा सफेद गेंद का इतिहास?

ऑस्ट्रेलियाई मीडिया कारोबारी कैरी पेकर की 1977 में वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट (WSC) ने कूकाबुरा से एक ऐसी बॉल बनाने को कहा जो लाइट में दिखे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कूकाबुरा को दूसरे खेल में सफेद गेंद के इस्तेमाल का अनुभव था। 1956 के ओलंपिक मेलबर्न में होने थे। हॉकी में कूकाबुरा बॉल इस्तेमाल की गई थीं और क्रिकेट की लाल गेंद को ही सफेद रंग से रंग दिया गया था।

सफेद गेंद से पहले नारंगी और पीली गेंद का हुआ था ट्रायल

विश्व सीरीज क्रिकेट (डब्ल्यूएससी) के दौरान ऑस्टिन रॉबर्टसन और रिची बेनो ने कूकाबुरा के ब्रूस थॉम्पसन के साथ मिलकर नई गेंद विकसित करने के लिए लगभग दो वर्षों तक लगातार प्रयोग किए। इस दौरान नारंगी, पीली और सफेद रंग की गेंदों का परीक्षण किया गया। विभिन्न परिस्थितियों और फ्लडलाइट्स में किए गए ट्रायल के बाद यह पाया गया कि सफेद गेंद सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। इसी कारण सीमित ओवरों के क्रिकेट के लिए सफेद गेंद को सबसे उपयुक्त माना गया। दिलचस्प बात यह रही कि डब्ल्यूएससी का विरोध कर रहे ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड (एसीबी) के बावजूद कूकाबुरा कंपनी को इस नई गेंद के विकास और परीक्षण में किसी तरह की बाधा का सामना नहीं करना पड़ा।

विश्व कप 1992: जब क्रिकेट में हुई सफेद गेंद की एंट्री

इसका कारण शायद यह था कि गेंद कोई और बनाने वाला नहीं था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार डब्ल्यूएससी के बाद ऑस्ट्रेलिया में वनडे रंगीन कपड़ों और सफेद गेंद वाले मैच होने लगे और कूकाबुरा की पहुंच न्यूजीलैंड तक हो गई। साल 1992 में कूकाबुरा की सफेद गेंदों का इस्तेमाल पहली बार वर्ल्ड कप में किया गया था। सफेद बॉल के क्रिकेट में आज भी केवल कूकाबुरा की गेंद का इस्तेमाल होता है।

1999 वर्ल्ड कप: जब ड्यूक गेंद से खेले गए मुकाबले

ड्यूक रेड बॉल का इस्तेमाल 1760 से हो रहा है। इनका इस्तेमाल इंग्लैंड में हुए पहले तीन वर्ल्ड कप और 1987 में भारत और पाकिस्तान में हुए चौथे वर्ल्ड कप में किया गया था। ड्यूक ने भी व्हाइट-बॉल मार्केट में अपनी जगह बनाने की कोशिश की। इंग्लैंड में 1999 का वर्ल्ड कप पहला और अब तक का इकलौता वर्ल्ड कप था, जिसमें ड्यूक की बनाई हुई व्हाइट बॉल का इस्तेमाल हुआ था।

कूकाबुरा गेंद का क्या है खास राज? जानिए पूरी कहानी

भारत में सैंसपैरिल्स ग्रीनलैंड्स (SG) ने 1951 में क्रिकेट की गेंद बनानी शुरू की। एसजी 1991 में अपनी टेस्ट गेंद लाया। 1990 के दशक के बीच तक एसजी व्हाइट बॉल भी बनाने लगा। आईसीसी ने अपनी वर्ल्ड कप प्लेइंग कंडीशन में लिखा है कि मुकाबलों में सफेद कूकाबुरा टर्फ क्रिकेट बॉल ही इस्तेमाल की जाएंगी।

कूकाबुरा गेंद का दुनिया भर में दबदबा

इसका मतलब है कि आईसीसी की आधिकारिक गेंद सफेद कूकाबुरा टर्फ है। इसी के कारण सफेद कूकाबुरा का इस्तेमाल पूरी दुनिया में द्विपक्षीय वनडे सीरीज के दौरान भी किया जाता है। इसका इस्तेमाल दुनिया भर में टी20 लीग सहित घरेलू क्रिकेट में भी किया जाता है।

2000 तक वनडे में दिखती थी लाल गेंद की चमक

साल 1992 में सफेद गेंद की शुरुआत के बाद भी वनडे क्रिकेट में तुरंत लाल गेंद का दौर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। सीमित ओवरों के कई मुकाबलों में लाल गेंद और सफेद पोशाक का इस्तेमाल 2000 के दशक की शुरुआत तक जारी रहा। खासकर दिन में खेले जाने वाले वनडे मैचों में लाल गेंद का प्रयोग किया जाता था। धीरे-धीरे रंगीन जर्सी, फ्लडलाइट्स और बेहतर दृश्यता की जरूरतों को देखते हुए सफेद गेंद ने वनडे क्रिकेट में अपनी स्थायी जगह बना ली।

जब वनडे में आखिरी बार दिखी लाल गेंद

14 दिसंबर 2000 को वनडे क्रिकेट में आखिरी बार लाल गेंद और सफेद पोशाक का इस्तेमाल किया गया था। यह मुकाबला राजकोट में भारत और जिम्बाब्वे के बीच खेली गई सीरीज का पांचवां मैच था, जिसमें भारतीय टीम ने 39 रन से जीत दर्ज की। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस मैच में अजीत अगरकर ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सिर्फ 21 गेंदों में अर्धशतक लगाया और भारतीय बल्लेबाज के रूप में सबसे तेज वनडे अर्धशतक का रिकॉर्ड अपने नाम किया। इसके बाद वनडे क्रिकेट में दिन के मुकाबलों में भी सफेद गेंद का नियमित रूप से इस्तेमाल शुरू हो गया और लाल गेंद का दौर समाप्त हो गया।

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